देशबंधु चितरंजन : त्याग, स्वराज और राष्ट्रसेवा की अमर विरासत

(जन्मदिन 5 नवंबर पर विशेष)
Chittranjan Das
देशबंधु चित्तरंजन दास
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल उन नेताओं की कहानी नहीं है, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष किया। यह उन व्यक्तित्वों की गाथा भी है, जिन्होंने अपनी प्रतिभा, प्रतिष्ठा, संपत्ति और निजी सुख-सुविधाओं को देश के व्यापक हितों के लिए समर्पित कर दिया। देशबंधु चितरंजन दास ऐसे ही विरल व्यक्तित्व थे। वे सफल वकील, कुशल राजनीतिज्ञ, विचारक, साहित्यकार और राष्ट्रवादी नेता थे। उनके जीवन में त्याग केवल भाषण का विषय नहीं, बल्कि व्यवहार का हिस्सा था। पांच नवंबर 1870 को जन्मे चितरंजन दास की जयंती हमें यह विचार करने का अवसर देती है कि राजनीति का वास्तविक उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना है या समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभाना।

उनके सामने एक सुरक्षित और सुविधाजनक जीवन का रास्ता खुला था, लेकिन देश की राजनीतिक परिस्थितियों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

चितरंजन दास का जन्म कलकत्ता में एक शिक्षित और प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता भुवन मोहन दास वकालत से जुड़े थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में अध्ययन किया और आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा में सफलता प्राप्त करने का प्रयास किया, लेकिन इस दिशा में आगे नहीं बढ़ सके। बाद में उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और भारत लौटकर कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। अपनी प्रतिभा, मेहनत और कानूनी समझ के बल पर वे शीघ्र ही प्रतिष्ठित बैरिस्टर बन गए। उनकी आय और सामाजिक प्रतिष्ठा लगातार बढ़ रही थी। उनके सामने एक सुरक्षित और सुविधाजनक जीवन का रास्ता खुला था, लेकिन देश की राजनीतिक परिस्थितियों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

1908 के अलीपुर बम कांड में अरविंद घोष का बचाव उनकी कानूनी प्रतिभा और राष्ट्रवादी प्रतिबद्धता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। उन्होंने इस मुकदमे में प्रभावशाली पैरवी की और अरविंद घोष को दोषमुक्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह मुकदमा उनके सार्वजनिक जीवन का निर्णायक पड़ाव साबित हुआ।

बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने राष्ट्रीय चेतना को नई ऊर्जा दी। चितरंजन दास इस आंदोलन से गहराई से जुड़े। उन्होंने अपनी वकालत के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध उन्होंने निर्भीक आवाज उठाई। 1908 के अलीपुर बम कांड में अरविंद घोष का बचाव उनकी कानूनी प्रतिभा और राष्ट्रवादी प्रतिबद्धता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। उन्होंने इस मुकदमे में प्रभावशाली पैरवी की और अरविंद घोष को दोषमुक्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह मुकदमा उनके सार्वजनिक जीवन का निर्णायक पड़ाव साबित हुआ।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू होने पर चितरंजन दास ने अपनी सफल वकालत छोड़ने का निर्णय लिया। यह सामान्य राजनीतिक फैसला नहीं था।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू होने पर चितरंजन दास ने अपनी सफल वकालत छोड़ने का निर्णय लिया। यह सामान्य राजनीतिक फैसला नहीं था। उस समय उनकी कानूनी आय काफी अच्छी थी और बैरिस्टर के रूप में उनका भविष्य उज्ज्वल था। इसके बावजूद उन्होंने पेशे से मिलने वाली आर्थिक सुरक्षा का त्याग कर स्वतंत्रता आंदोलन को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके इस निर्णय ने अनेक लोगों को प्रभावित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए केवल राजनीतिक नारे पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी त्याग और प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है।

चित्तरंजन दास के लिए स्वतंत्रता संघर्ष केवल पुरुषों की राजनीतिक गतिविधि नहीं था। वे चाहते थे कि महिलाएं भी राष्ट्रीय जीवन में समान भागीदारी निभाएं। उनके परिवार का सार्वजनिक जीवन में योगदान उनके विचारों की व्यावहारिक अभिव्यक्ति था।

उनके परिवार ने भी इस संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पत्नी बसंती देवी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुईं। उन्होंने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय संघर्ष से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आंदोलन में उनकी गिरफ्तारी ने बंगाल की महिलाओं में नई राजनीतिक चेतना पैदा की। चित्तरंजन दास के लिए स्वतंत्रता संघर्ष केवल पुरुषों की राजनीतिक गतिविधि नहीं था। वे चाहते थे कि महिलाएं भी राष्ट्रीय जीवन में समान भागीदारी निभाएं। उनके परिवार का सार्वजनिक जीवन में योगदान उनके विचारों की व्यावहारिक अभिव्यक्ति था।चित्तरंजन दास के त्याग की चर्चा करते समय उनके निजी संसाधनों के सार्वजनिक उपयोग का उल्लेख भी आवश्यक है। उन्होंने अपनी संपत्ति और साधनों को केवल परिवार की सुख-सुविधाओं तक सीमित नहीं रखा। कलकत्ता स्थित उनका आवास सार्वजनिक उद्देश्य के लिए ट्रस्ट को सौंपा गया। यह निर्णय उनके सामाजिक सरोकार और सार्वजनिक जीवन के प्रति समर्पण को दर्शाता है। उनके निधन के बाद महात्मा गांधी ने देशबंधु स्मारक कोष के लिए अपील की, ताकि उनके अधूरे सार्वजनिक कार्यों और आदर्शों को आगे बढ़ाया जा सके। हालांकि उनके अंतिम दिनों की आर्थिक स्थिति को लेकर अनेक भावनात्मक किस्से प्रचलित हैं, लेकिन बिना प्रमाण के यह कहना उचित नहीं होगा कि उनके परिवार के पास अंतिम संस्कार के लिए कपड़ा या भोजन तक नहीं था। उनके जीवन का वास्तविक महत्व प्रमाणित तथ्यों में दिखाई देने वाले त्याग और सार्वजनिक प्रतिबद्धता में है।

वे समझते थे कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के साथ-साथ भारतीयों को शासन व्यवस्था में अपनी भूमिका भी सुनिश्चित करनी होगी।

चित्तरंजन दास का राजनीतिक चिंतन केवल अंग्रेजी शासन का विरोध करने तक सीमित नहीं था। वे समझते थे कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के साथ-साथ भारतीयों को शासन व्यवस्था में अपनी भूमिका भी सुनिश्चित करनी होगी। असहयोग आंदोलन के बाद कांग्रेस के भीतर इस प्रश्न पर मतभेद उभरा कि विधान परिषदों का बहिष्कार जारी रखा जाए या उनके भीतर प्रवेश करके औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी जाए। चित्तरंजन दास परिषदों में प्रवेश के पक्षधर थे। उनका तर्क था कि अंग्रेजी शासन की संस्थाओं के भीतर जाकर भी उसके कामकाज को बाधित किया जा सकता है और जनता के प्रश्नों को प्रभावी ढंग से उठाया जा सकता है।

यह चित्तरंजन दास की राजनीतिक दूरदृष्टि का प्रमाण था कि वे स्वतंत्रता संघर्ष के लिए एक से अधिक रणनीतियों की आवश्यकता समझते थे।

1922 के गया कांग्रेस अधिवेशन में इस मुद्दे पर तीखी बहस हुई। परिषद प्रवेश के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने पर चित्तरंजन दास ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1923 में उन्होंने पंडित मोतीलाल नेहरू के साथ स्वराज पार्टी की स्थापना की। स्वराज पार्टी का उद्देश्य विधान परिषदों में प्रवेश करके औपनिवेशिक शासन की नीतियों का विरोध करना और स्वशासन की मांग को मजबूत करना था। पार्टी ने चुनावों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की और परिषदों के भीतर सरकार को लगातार चुनौती दी। यह चित्तरंजन दास की राजनीतिक दूरदृष्टि का प्रमाण था कि वे स्वतंत्रता संघर्ष के लिए एक से अधिक रणनीतियों की आवश्यकता समझते थे।

चित्तरंजन दास समझते थे कि भारत की स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब विभिन्न समुदाय परस्पर विश्वास और सहयोग के साथ आगे बढ़ेंगे।

उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक सद्भाव और सांप्रदायिक एकता था। 1923 में प्रस्तुत बंगाल पैक्ट इसी सोच का परिणाम था। इसका उद्देश्य बंगाल में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा अन्य विवादित प्रश्नों पर सहमति कायम करना था। उस दौर में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहे थे। चित्तरंजन दास समझते थे कि भारत की स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब विभिन्न समुदाय परस्पर विश्वास और सहयोग के साथ आगे बढ़ेंगे। बंगाल पैक्ट पर मतभेद भी हुए, लेकिन इससे उनके सद्भाव संबंधी प्रयासों का महत्व कम नहीं होता।

उनका विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब गांवों की स्थिति सुधरेगी और आम लोगों को आर्थिक अवसर प्राप्त होंगे।

चित्तरंजन दास का दृष्टिकोण सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों तक भी विस्तृत था। वे शिक्षा, ग्रामीण विकास, स्वदेशी उद्योग और स्थानीय स्वशासन को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के आवश्यक आधार मानते थे। उनका विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब गांवों की स्थिति सुधरेगी और आम लोगों को आर्थिक अवसर प्राप्त होंगे। वे चाहते थे कि भारतीय समाज अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आत्मनिर्भर बने। स्वदेशी उनके लिए केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का नारा नहीं था, बल्कि देश की उत्पादन क्षमता, स्थानीय कौशल और आर्थिक आत्मसम्मान को मजबूत करने का माध्यम था।

उनके लिए साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि समाज को जागरूक करने और विचारों को दिशा देने का माध्यम भी था।

वे साहित्य और पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। उनकी साहित्यिक अभिरुचि ने उनके व्यक्तित्व को व्यापक बनाया। राजनीतिक संघर्ष के बीच भी वे लेखन और विचार-विमर्श को महत्व देते थे। उनके लेखन में राष्ट्रीय चेतना, मानवीय संवेदना और सामाजिक जीवन की जटिलताओं की झलक मिलती है। उनके लिए साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि समाज को जागरूक करने और विचारों को दिशा देने का माध्यम भी था।

1924 में चित्तरंजन दास कलकत्ता नगर निगम के महापौर बने। नगर प्रशासन को भारतीयों के हाथों में अधिक प्रभावी ढंग से संचालित करने की उनकी कोशिश स्वशासन की अवधारणा का स्थानीय स्तर पर विस्तार थी। उन्होंने सुभाषचंद्र बोस को नगर निगम का मुख्य कार्यपालक अधिकारी नियुक्त किया। इस निर्णय ने युवा सुभाष को प्रशासनिक अनुभव प्राप्त करने का अवसर दिया। दोनों के बीच राजनीतिक और वैचारिक संबंधों ने बंगाल के राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। चित्तरंजन दास सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक जीवन के महत्वपूर्ण मार्गदर्शकों में थे। सुभाष ने भी उन्हें गहरे सम्मान और श्रद्धा के साथ याद किया।

निधन

देशबंधु का जीवन बहुत लंबा नहीं रहा। लगातार राजनीतिक गतिविधियों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बीच 16 जून 1925 को दार्जिलिंग में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी आयु केवल 55 वर्ष थी। उनके निधन से राष्ट्रीय आंदोलन ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जो संघर्ष, संगठन, वैचारिक बहस और सामाजिक सद्भाव को एक साथ लेकर चलने की क्षमता रखता था। महात्मा गांधी सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्हें ‘देशबंधु’ की उपाधि केवल सम्मान के तौर पर नहीं मिली थी; यह उनके प्रति जनता के विश्वास और आत्मीयता का प्रतीक थी।

उन्होंने दिखाया कि राजनीति का नैतिक आधार निजी त्याग, सार्वजनिक उत्तरदायित्व और जनता के प्रति संवेदनशीलता में निहित होता है।

आज जब राजनीति में सार्वजनिक जीवन की नैतिकता, व्यक्तिगत स्वार्थ, सत्ता की आकांक्षा और सामाजिक विभाजन को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं, तब चित्तरंजन दास का जीवन प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने दिखाया कि राजनीति का नैतिक आधार निजी त्याग, सार्वजनिक उत्तरदायित्व और जनता के प्रति संवेदनशीलता में निहित होता है। वे विचारों से असहमत लोगों के साथ भी संवाद और राजनीतिक सहयोग की संभावना तलाशते थे। उनका जीवन यह भी सिखाता है कि लोकतंत्र में रणनीति को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र और समाज के व्यापक हित को सर्वोपरि रखना आवश्यक है।

उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि सार्वजनिक जीवन की विश्वसनीयता पद और प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण और समाज के प्रति उसके योगदान से बनती है।

देशबंधु चित्तरंजन दास की विरासत को केवल जयंती समारोहों और श्रद्धांजलियों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके विचारों को आज की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों के संदर्भ में समझने की जरूरत है। स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि नागरिकों को सम्मान, समान अवसर, न्याय और आत्मनिर्भरता उपलब्ध कराना भी है। उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि सार्वजनिक जीवन की विश्वसनीयता पद और प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण और समाज के प्रति उसके योगदान से बनती है। देशबंधु का यही आदर्श आज भी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नैतिक कसौटी बना हुआ है।

(युवराज)कुमार कृष्णन

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