

सन्मार्ग संवाददाता
नयी दिल्ली : तृणमूल सांसद डेरेक ओब्रायन ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर में मनमानी और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की है। याचिका में दावा किया गया है कि निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों के बूथ-स्तरीय एजेंट (बीएलए) को सुनवाई के दौरान मतदाताओं की मदद करने से प्रतिबंधित कर दिया है। इसमें कहा गया है, “एसआईआर से जुड़ी सुनवाई का खास तौर पर परेशान करने वाला पहलू यह है कि कई बुजुर्ग, दिव्यांग और बीमार मतदाताओं को स्वास्थ्य, आवाजाही और उम्र संबंधी बाधाओं के बावजूद शारीरिक रूप से पेश होने के लिए मजबूर किया जा रहा है।”
डेरेक ओब्रायन ने अपनी अर्जी में कहा कि पश्चिम बंगाल के लिए मसौदा मतदाता सूची 16 दिसंबर 2025 को प्रकाशित की गई थी, “जिसने पात्र और वास्तविक मतदाताओं के सामने पेश आने वाली कठिनाइयां काफी बढ़ा दी हैं और इसके लिए प्रतिवादी संख्या 1 (निर्वाचन आयोग) की ओर से लगातार की गई मनमानी और प्रक्रियात्मक अनियमितताएं जिम्मेदार हैं।”अर्जी में कहा गया है कि पिछले साल 30 नवंबर को निर्वाचन आयोग ने संशोधन के लिए सीमित अवधि बढ़ाई थी और दावे एवं आपत्तियां पेश करने की अंतिम तिथि 15 जनवरी 2026 तय की थी। इसमें शीर्ष अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह निर्वाचन आयोग को दावे और आपत्तियां पेश करने की समय सीमा बढ़ाने का निर्देश दे। अर्जी में निर्वाचन आयोग को यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है कि वह “व्हाट्सएप या ऐसे अन्य अनौपचारिक माध्यमों के जरिये बीएलओ (बूथ स्तर के अधिकारियों) और अन्य अधिकारियों के लिए एसआईआर अभ्यास से जुड़े निर्देश जारी करना फौरन बंद करे।” इसमें शीर्ष अदालत से “अब तक जारी किए गए ऐसे सभी निर्देशों को अवैध घोषित करने” का भी आग्रह किया गया है। याचिका में कहा गया है, “निर्वाचन आयोग ने वैधानिक संचार की अपनी औपचारिक प्रणाली को प्रभावी रूप से एक ऐसी प्रणाली से बदल दिया है, जिसे जमीनी स्तर पर अनौपचारिक रूप से ‘व्हाट्सएप आयोग’ के रूप में वर्णित किया जा रहा है। इसमें महत्वपूर्ण निर्देश, चेतावनियां और कथित गैर-अनुपालन के परिणाम संबंध संचार केवल मैसेजिंग मंच के माध्यम से संप्रेषित किए जाते हैं।” याचिका में कहा गया है कि आजादी के बाद इस तरह के अहम अभ्यास के लिए ऐसे अनौपचारिक संचार माध्यमों के इस्तेमाल के बारे में देश में पहले कभी नहीं सुना गया और वास्तव में इसका असर यह होगा कि “निर्णय लेने वाले जवाबदेही से मुक्त हो जाएंगे।”
आरोप : बिना सूचना या व्यक्तिगत सुनवाई के 58,20,898 नाम हटा दिए गए थे
याचिका में आरोप लगाया गया है कि पश्चिम बंगाल में 16 दिसंबर 2025 को मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित की गई थी और इसमें बिना किसी सूचना या व्यक्तिगत सुनवाई के 58,20,898 नाम हटा दिए गए थे। इसमें कहा गया है, “मसौदा मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद शुरू में यह बताया गया था कि अनुमानित 31,68,424 मतदाताओं को 2002 की मतदाता सूची के साथ ‘मैप’ नहीं किया जा सका और इसलिए उन्हें सुनवाई के नोटिस प्राप्त होंगे।” याचिका में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान निर्वाचन आयोग ने बिना किसी लिखित आदेश या दिशा-निर्देश के “तार्किक विसंगतियां” नामक एक नयी श्रेणी बनाई और उसका इस्तेमाल किया, ताकि “बिना किसी वैधानिक आधार के 1.36 करोड़ मतदाताओं को नोटिस जारी किया जा सके या जारी करने का निर्णय लिया जा सके।”इसमें कहा गया है कि कई मतदाताओं ने बिना वजह लंबी कतारों में लगने के लिए मजबूर होने, दस्तावेजी आवश्यकताओं को लेकर भ्रम की स्थिति होने और निर्वाचन आयोग की ओर से जारी नोटिस में स्पष्टता का अभाव होने जैसी शिकायतें की हैं।
अंतिम सूची 14 फरवरी को प्रकाशित होने वाली है, लेकिन...याचिका में कहा गया है कि अंतिम सूची 14 फरवरी को प्रकाशित होने वाली है, लेकिन निर्वाचन आयोग की प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के कारण दस्तावेज सत्यापन का पूरा चरण “अस्त-व्यस्त हो गया है।”इसमें कहा गया है, “मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त एक वैधानिक अधिकार है। इसे नियंत्रित करने वाली प्रक्रिया को निष्पक्षता, तर्कसंगतता और उचित प्रक्रिया के मानकों पर खरा उतरना चाहिए।” याचिका में शीर्ष अदालत से निर्वाचन आयोग को यह सुनिश्चत करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि उसकी ओर से “मैपिंग” संबंधी त्रुटियों के कारण कोई भी मतदाता मताधिकार से वंचित न हो जाए। इसमें न्यायालय से आयोग को यह निर्देश देने का भी आग्रह किया गया है कि सभी दावों, आपत्तियों और सुनवाई के निपटारे के बाद ही अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाए।