

जयनगर : जयनगर क्षेत्र में तेजी से घट रही खजूर के पेड़ों की संख्या ने शियूली समुदाय (जो परंपरागत रूप से खजूर के पेड़ से रस निकालकर गुड़ बनाने का काम करता है) को गहरी चिंता में डाल दिया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और संरक्षण के अभाव में इस समुदाय का परंपरागत पेशा अब विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। जयनगर में सप्ताह में दो दिन सोमवार और शुक्रवार की सुबह हाट लगता है।
शियूली पेशे से जुड़े लोगों ने यह कहा
तीन पीढ़ी से शियूली से जुड़े नाजीर खान ने बताया कि जयनगर इलाके में बड़ी संख्या में खजूर के पेड़ नष्ट हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि 'नए मकान और अन्य निर्माण कार्यों के चलते खजूर के पेड़ों की मनमानी कटाई हो रही है। ऐसे में इस पेशे को बनाए रखना बेहद कठिन होता जा रहा है।' उनके अनुसार खजूर के रस से गुड़ बनाने की प्रक्रिया बेहद मेहनत और धैर्य की मांग करती है, जिसके कारण नयी पीढ़ी इस पेशे से जुड़ने से कतराती है।
शियूली परिवारों का मानना है कि यदि सरकार संरक्षण को बढ़ावा दे और गुड़ की पैकेजिंग की बेहतर व्यवस्था करे तो इस परंपरा को संजोया जा सकता है। पैकेजिंग की सुविधा उपलब्ध होने पर स्थानीय खजूर का गुड़ विदेशों तक भी पहुंचाया जा सकेगा। सियूली पेशे से जुड़े एक अन्य व्यक्ति अब्दुल कहार खान ने बताया कि आठ किलो रस से मात्र एक किलो शुद्ध खजूर का गुड़ तैयार होता है, जिसकी बाजार में कीमत लगभग 700 रुपये है।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग अधिक मुनाफे के लालच में मिलावटी गुड़ बेचने लगे हैं, जिससे असली खजूर गुड़ की साख पर असर पड़ रहा है। मोया व्यवसाय से जुड़े कई व्यापारियों ने कहा कि जयनगर में हर साल 2 करोड़ से अधिक रुपये की व्यवसाय होता है।
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