नारी सशक्तीकरण और जिम्मेदारियों की मिसाल हैं रायहाट की महिला ढाकी

राज्य के अलग-अलग हिस्सों में नाम कमा चुकी हैं ये महिला ढाकी
अभ्यास करतीं रायहाट की महिला ढाकी
अभ्यास करतीं रायहाट की महिला ढाकी
Published on: 

मुर्शिदाबाद : पितृपक्ष खत्म होने के साथ ही देवी मां का पक्ष शुरू हो गया है। इस दौरान पूरा बंगाल ढाक की आवाज, धुनुची के धुएं और त्योहार की खुशी से भर उठा है। ऐसे में बड़ंचा के रायहाट गांव की महिला ढाकी दुर्गोत्सव के स्वागत के लिए दिन-रात अपनी तैयारियों में लगी हुई हैं। घर के काम-काज खत्म करने के बाद वे शाम होने से पहले अपने ढाक को कंधों पर लेकर निकल जाती हैं। कभी वे प्रशिक्षक के घर पर रिहर्सल करती हैं, तो कभी गांव के खाली मैदान में। उनका अभ्यास पुरुष ढाकियों के साथ तालमेल बिठाती है। ढाक की हर थाप और ताल महिलाओं के आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की अदम्य इच्छाशक्ति को दिखाती है। रायहाट गांव में इन्हीं महिलाओं को लेकर 'रायहाट सरस्वती माता उन्नयन ढाक समिति' बनाई गई है। इस ग्रुप के मुखिया गांव के ही रहने वाले निमाई दास हैं। लॉकडाउन के बाद से ही उन्होंने अपने घर और घर के बगल वाले खेत में महिलाओं को हाथ से ढाक बजाना सिखाना शुरू कर दिया। शुरुआत में यह एक छोटे ग्रुप से शुरू हुआ। फिर धीरे-धीरे उनकी यह पहल महिलाओं की ढाक मंडली के रूप में सामने आई। आज इस मंडली की सदस्याएं न सिर्फ अपने गांवों में बल्कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में भी ढाक बजाकर अपना नाम कमा चुकी हैं। परिवार की जिम्मेदारियां उठाना, ढाक की ट्रेनिंग लेना और फिर उस हुनर ​​का इस्तेमाल अलग-अलग जगहों पर परफॉर्म करने के लिए करना - ये सब वे अपने-अपने तरीके से कर रही हैं। उनके लिए ढाक सिर्फ पूजा का एक वाद्य यंत्र नहीं है, बल्कि अपनी पहचान बनाने और आत्मनिर्भर बनने का एक जरिया है। बस कुछ दिन का और इंतजार है। फिर पूजा मंडप में उनके ढाक वादन के साथ त्योहार का उत्साह शुरू हो जाएगा। रायहाट की महिला ढाकियों की यह तैयारी सिर्फ दुर्गा पूजा के आने की नहीं है, यह ग्रामीण बंगाल की जमीन पर महिला शक्ति के जागने की एक अनोखी कहानी है।

सन्मार्ग को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं →
logo
Sanmarg Hindi daily
sanmarg.in