

बर्दवान : खान (माइन) श्रमिकों की सुरक्षा में क्रांतिकारी आविष्कार करके पूर्व बर्दवान के वरिष्ठ इंजीनियर और उनकी पत्नी ने पेटेंट हासिल किया है। खदान की गहराई में केज (Mine Cage) के टूटकर गिर जाने जैसी भयानक दुर्घटनाओं को रोकने के लिए एक स्वचालित सुरक्षा प्रणाली (ऑटोमैटिक सेफ्टी सिस्टम) का आविष्कार कर पूर्व बर्दवान जिले के राधानगर षष्ठीतला के निवासी प्रशांत कुमार भट्टाचार्य और उनकी पत्नी प्रतिमा भट्टाचार्य ने पेटेंट प्राप्त किया है।
भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय द्वारा "An Automatic Mine Cage Free-Fall Arresting Safety System" नामक इस आविष्कार को मान्यता प्रदान की गई है (पेटेंट संख्या: 602061)। इस पेटेंट के लिए 2 फरवरी 2026 को आवेदन किया गया था और 9 सितंबर को इसे औपचारिक रूप से स्वीकृत किया गया।
प्रशांत कुमार भट्टाचार्य पेशे से एक अनुभवी माइनिंग इंजीनियर हैं, जिन्होंने ''इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स'' (ISM) से बी.टेक किया है और ''डायरेक्टरेट जनरल ऑफ माइन्स सेफ्टी'' (DGMS) से फर्स्ट क्लास सर्टिफिकेट प्राप्त किया है। अपने सेवा काल के दौरान उन्होंने अमलाबाद, मधुबन, कोलिहान और जामाडोबा जैसी खदानों में काम किया और अक्टूबर 1996 में सेवानिवृत्त हुए।
अपने करियर के दौरान आंखों के सामने घटी कई खदान दुर्घटनाओं और कई सहयोगियों की दर्दनाक मौत ने उन्हें अंदर से झकझोर दिया था। उसी दुखद अनुभव से प्रेरित होकर, खदान श्रमिकों की जान बचाने के उद्देश्य से उन्होंने 2015 में इस सुरक्षा प्रणाली पर विचार और शोध शुरू किया।
रविवार को एक पत्रकार वार्ता में उन्होंने बताया कि जमीन के नीचे 1000 से 2000 फीट या उससे भी अधिक गहराई में श्रमिकों की आवाजाही के लिए ''माइन केज'' का उपयोग किया जाता है। इस स्वचालित आविष्कार की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
किसी भी कारण से केज के अपने सस्पेंशन से अलग होकर फ्री-फॉल (अनियंत्रित रूप से नीचे गिरने) शुरू करते ही यह सेफ्टी मैकेनिज्म स्वचालित रूप से सक्रिय (एक्टिव) हो जाता है।
यह केज के गाइड से जुड़कर उसके अनियंत्रित पतन को रोक देता है।
दुर्घटना के क्षण ही सतह (सरफेस) पर मौजूद कर्मचारियों के पास एक ऑडियो-विजुअल चेतावनी संकेत (ऑडियो-विजुअल वार्निंग सिग्नल) अपने आप पहुंच जाता है।
इसके परिणामस्वरूप, बिना किसी मैन्युअल हस्तक्षेप के प्रतीक्षा किए, बचाव दल (रेस्क्यू टीम) को तुरंत सतर्क कर आवश्यक कदम उठाना संभव हो जाता है।
उन्होंने बताया कि कोविड महामारी के कारण फिजिकल मॉडल तैयार करने में काफी रुकावटें आईं, लेकिन 2020 में शुरू हुआ यह काम रुका नहीं। उनकी पत्नी व सह-पेटेंट धारक प्रतिमा भट्टाचार्य, दो बेटों देवज्योति व शुभज्योति, बहुओं काकली व पल्लवी और पोते ऋभु के निरंतर प्रोत्साहन ने उनके काम में बड़ी प्रेरणा का काम किया।
तकनीकी और संरचनात्मक रूप से सीएडी (CAD) डिजाइनर बेनू, नरूगोपाल मिस्त्री, झूलन मिस्त्री, ड्राइवर उज्ज्वल व उत्तम और बुबाई व चीनी ने उनकी मदद की। गलिग्राम और पामरा फैक्टरी तथा जलसा रेस्तरां में बैठकर लंबी चर्चाओं, डिजाइन तैयार करने और पार्ट्स को असेंबल करने के बाद इस मॉडल ने व्यावहारिक रूप लिया।
पेटेंट मिलने के बाद भावुक हुए प्रशांत जी ने कहा कि उनकी वर्षों की कड़ी मेहनत और मानव सुरक्षा के लिए कुछ करने का प्रयास आज रंग लाया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में खनन उद्योग में इस उपकरण के व्यावहारिक उपयोग से यदि एक भी श्रमिक की जान बचती है, तो उनका यह प्रयास पूरी तरह से सार्थक होगा।