वेतन समझौते की मांग पर सोदपुर एरिया में किया गया प्रदर्शन

वेतन समझौते की मांग पर सोदपुर एरिया में किया गया प्रदर्शन
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सांकतोड़िया : कोयला उद्योग में 12वें जेबीसीसीआई के गठन में हो रही देरी और कोयला कर्मचारियों के लंबित वेतन समझौते को लेकर श्रमिक संगठनों का आक्रोश अब देशव्यापी आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। सोदपुर एरिया कार्यालय पर सोमवार को संयुक्त मोर्चा के आह्वान पर धरना प्रदर्शन किया गया। संगठनों की ओर से संबंधित महाप्रबंधक कोल इंडिया के अध्यक्ष के नाम मांगपत्र सौंपे गए। कार्यक्रम का संचालन इंटक के योगेशपति त्रिपाठी ने किया। मौके पर जैक के कन्वेनर सह एटक नेता अनिल सिंह, जानकी साव, इंटक से पजय मशीह, एचएमएस से शिवकांत पांडेय, जयंतो मित्रा, केएमसी से आरके त्रिपाठी, बोधनारायण सिंह, यूटीयुसी पतिक बनर्जी सहित अन्य श्रमिक संगठन के लोग उपस्थित थे। जैक के कन्वेनर अनिल सिंह का कहना है कि एनसीडब्ल्यूए-11 की अवधि समाप्त होने के बाद भी JBCCI-12 का गठन नहीं होना गंभीर चिंता का विषय है। कोयला उद्योग में लाखों कर्मचारी नए वेतन समझौते की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में प्रबंधन की ओर से जेबीसीसीआई-12 के गठन में हो रही देरी को लेकर श्रमिक संगठनों ने आंदोलन तेज करने का निर्णय लिया है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि कोल इंडिया प्रबंधन ने जल्द ही 12वें जेबीसीसीआई के गठन की दिशा में ठोस पहल नहीं की, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह केवल वेतन समझौते का मुद्दा नहीं है, बल्कि कोयला कर्मचारियों के अधिकार, रोजगार सुरक्षा और श्रमिक हितों से जुड़ा व्यापक सवाल है। प्रदर्शन के दौरान नेताओं ने कर्मचारियों और श्रमिक संगठनों से एकजुट रहने तथा आगामी आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील की।

लंबित वेतन समझौता बना मुख्य मुद्दा

संयुक्त मोर्चा का कहना है कि कोयला कर्मचारियों के वेतन, भत्ते, सुविधाओं और अन्य सेवा शर्तों से जुड़े मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से होना चाहिए। इसके लिए जेबीसीसीआई-12 का गठन तत्काल आवश्यक है। संगठनों ने मांग की है कि कोल इंडिया प्रबंधन बिना और विलंब किए प्रतिनिधि ट्रेड यूनियनों के साथ वार्ता शुरू करे और एनसीडब्ल्यूए-12 के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए। श्रमिक नेताओं ने केंद्र सरकार की श्रम संहिताओं को लेकर भी विरोध जताया। उनका आरोप है कि नए लेबर कोड श्रमिकों के मौजूदा अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए श्रमिक संगठनों ने श्रम संहिताओं को वापस लेने की मांग भी उठाई।

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