"निमिया के डार मैया झुलेली झुलनवा, होके झुली झुली न” आज भी देवी आराधना में प्रासंगिक

मंगलगीतों के माध्यम से नौ दिनों तक मां भगवती की आराधना करती हैं महिलाएं, पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपरा आज भी कायम
जामुड़िया : नवरात्र के प्रथम दिन से ही पूजा मंडपों में महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक मंगलगीतों की गूंज सुनाई देने लगती है। दशकों पुरानी यह लोकपरंपरा आज भी कायम है। हालांकि, मंगलगीतों की यह परंपरा मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड सहित हिंदी भाषी राज्यों में प्रचलित रही है, लेकिन समय के साथ इसका विस्तार बंगाल, असम, ओडिशा और दक्षिण भारत के कई राज्यों तक हो गया है।
जामुड़िया की सुशीला देवी  ने बताया कि महिलाएं महालया के दिन से ही मां भगवती के आगमन की तैयारियां शुरू कर देती हैं। देवी पक्ष के प्रथम दिन से महिलाएं मां दुर्गा के आगमन की खुशी में महानवमी तक पूजा मंडपों में एक साथ बैठकर मंगलगीत गाती हैं। इन गीतों के माध्यम से मां भगवती की आराधना की जाती है और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
मंजू देवी ने बताया कि मंगलगीतों में भोजपुरी और अवधी सहित विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं का प्रभाव देखने को मिलता है। आरा, छपरा और बलिया जैसे क्षेत्रों में प्रचलित लोकभाषाओं में गाए जाने वाले इन गीतों में माता के आगमन, श्रृंगार और महिमा का वर्णन किया जाता है।
माता के लोकप्रिय मंगलगीतों में “निमिया के डार मैया डाले ली झुलनवा, होके झुली झुली न हो मैया”, “मोरी गावेली गितिया होके झुली झुली न” तथा “लाल-लाल ही सिंदुरवा से माई के सजइब, मंगलगीत गइब हो, सातो रे बहिनिया झुलेली झुला” जैसे गीत प्रमुख हैं। इन पारंपरिक गीतों के माध्यम से महिलाएं नौ दिनों तक मां भगवती की भक्ति में लीन रहती हैं।
देश के विभिन्न राज्यों में प्रचलित परंपरा
सुरभि अग्रवाल ने बताया कि मंगलगीत केवल बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड या दक्षिण भारत तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि राजस्थान, हरियाणा और गुजरात के शक्ति मंडपों में भी इस तरह के भक्ति गीत गाए जाते हैं। स्थानीय भाषा और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद इन गीतों का मूल भाव मां भगवती की आराधना और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है।
वहीं, भोजपुरी लोकगीतों और भक्ति संगीत की लोकप्रियता ने भी इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सुविख्यात गायिका फाल्गुनी पाठक के डांडिया गीतों में भी माता की आराधना की झलक मिलती है। ऐसे गीतों पर युवा पीढ़ी भी संगीत और भक्ति के माध्यम से मां दुर्गा की उपासना करती है।
आधुनिकता के दौर में भी मंगलगीतों की यह परंपरा भारतीय लोकसंस्कृति और धार्मिक आस्था की जीवंत पहचान बनी हुई है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती यह परंपरा न केवल महिलाओं को सामूहिक रूप से जोड़ती है, बल्कि नवरात्र के दौरान भक्ति, लोकसंगीत और सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजने का कार्य करती है
मंगलगीत गाती महिलाएं फाइल फोटो News
Published on: 

minute

सन्मार्ग को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं →
logo
Sanmarg Hindi daily
sanmarg.in