जागो तुमी जागो... महालया की वह सुबह, जब मां के आगमन का होता है आभास

वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की अमर वाणी में चंडीपाठ सुनते ही जाग उठती हैं वर्षों पुरानी स्मृतियां। आधुनिकता के बीच ग्रामीण अंचलों में आज भी कायम है महालया की परंपरा।
जागो तुमी जागो... महालया की वह सुबह, जब मां के आगमन का होता है आभास
----वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की अमर वाणी में चंडीपाठ सुनते ही जाग उठती हैं वर्षों पुरानी स्मृतियां। आधुनिकता के बीच ग्रामीण अंचलों में आज भी कायम है महालया की परंपरा।
जामुड़िया : “जागो तुमी जागो...” भोर की निस्तब्धता को चीरती यह आवाज रेडियो से गूंजते ही बंगाल के असंख्य घरों में आध्यात्मिक वातावरण भर देती है। इसके साथ महान वाचक वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की गंभीर और ओजस्वी आवाज में चंडीपाठ शुरू होता है। दुर्गा सप्तशती के मंत्रों और मां दुर्गा की स्तुति के बीच ऐसा लगता है, मानो मां का आगमन धरती पर हो गया हो। महालया की यह सुबह धार्मिक परंपरा के साथ बंगाल की सांस्कृतिक स्मृतियों और आस्था से जुड़ा भावनात्मक अनुभव भी है।
महालया से देवी पक्ष का आरंभ माना जाता है। शारदीय दुर्गोत्सव के आगमन का संदेश देने वाली इस सुबह का इंतजार लोग वर्षभर करते हैं। सूर्योदय से पहले उठकर चंडीपाठ सुनना कभी बंगाल के घर-घर की परंपरा थी। परिवार के सभी सदस्य रेडियो के सामने बैठकर मां दुर्गा के आगमन का स्वागत करते थे।
वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की आवाज महालया के चंडीपाठ का पर्याय बन चुकी है। उनके द्वारा प्रस्तुत “महिषासुर मर्दिनी” दशकों से इस सुबह की पहचान रही है। संस्कृत मंत्रों और स्तोत्रों के उनके उच्चारण से वातावरण में भक्ति, शक्ति और श्रद्धा का संचार होता है। आज भी उनकी रिकॉर्डिंग अनेक घरों में सुनी जाती है।
एक समय गांवों में महालया की सुबह रेडियो की आवाज से होती थी। अंधेरा छंटने से पहले लोग उठते, आंगन में दीप जलाते, शंख बजाते और धूप की सुगंध से वातावरण भर जाता। चंडीपाठ शुरू होते ही बच्चे से बुजुर्ग तक श्रद्धा से सुनते थे। यह पूरे परिवार के साथ जुड़ने का अवसर था।
समय के साथ रेडियो की जगह मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों ने ले ली, लेकिन महालया का आकर्षण कायम है। जामुड़िया सहित ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग सुबह उठकर चंडीपाठ सुनते हैं। माध्यम बदला है, श्रद्धा नहीं।
शरद ऋतु, काश के फूल और दूर से आती चंडीपाठ की ध्वनि प्रकृति को मां के स्वागत के लिए तैयार करती प्रतीत होती है। नई पीढ़ी डिजिटल माध्यमों से इस परंपरा से जुड़ रही है, जबकि बुजुर्गों के लिए यह वही पुरानी सुबह है। महालया मन में भक्ति और उत्साह का पहला दीप जलाती है। “जागो तुमी जागो...” सुनते ही मन कह उठता है—मां आ रही हैं।
रेडियो पर महालया सुनते हुए फाइल फोटो News
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जागो तुमी जागो... महालया की वह सुबह, जब मां के आगमन का होता है आभास

----वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की अमर वाणी में चंडीपाठ सुनते ही जाग उठती हैं वर्षों पुरानी स्मृतियां। आधुनिकता के बीच ग्रामीण अंचलों में आज भी कायम है महालया की परंपरा।

जामुड़िया : “जागो तुमी जागो...” भोर की निस्तब्धता को चीरती यह आवाज रेडियो से गूंजते ही बंगाल के असंख्य घरों में आध्यात्मिक वातावरण भर देती है। इसके साथ महान वाचक वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की गंभीर और ओजस्वी आवाज में चंडीपाठ शुरू होता है। दुर्गा सप्तशती के मंत्रों और मां दुर्गा की स्तुति के बीच ऐसा लगता है, मानो मां का आगमन धरती पर हो गया हो। महालया की यह सुबह धार्मिक परंपरा के साथ बंगाल की सांस्कृतिक स्मृतियों और आस्था से जुड़ा भावनात्मक अनुभव भी है।

महालया से देवी पक्ष का आरंभ माना जाता है। शारदीय दुर्गोत्सव के आगमन का संदेश देने वाली इस सुबह का इंतजार लोग वर्षभर करते हैं। सूर्योदय से पहले उठकर चंडीपाठ सुनना कभी बंगाल के घर-घर की परंपरा थी। परिवार के सभी सदस्य रेडियो के सामने बैठकर मां दुर्गा के आगमन का स्वागत करते थे।

वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की आवाज महालया के चंडीपाठ का पर्याय बन चुकी है। उनके द्वारा प्रस्तुत “महिषासुर मर्दिनी” दशकों से इस सुबह की पहचान रही है। संस्कृत मंत्रों और स्तोत्रों के उनके उच्चारण से वातावरण में भक्ति, शक्ति और श्रद्धा का संचार होता है। आज भी उनकी रिकॉर्डिंग अनेक घरों में सुनी जाती है।

एक समय गांवों में महालया की सुबह रेडियो की आवाज से होती थी। अंधेरा छंटने से पहले लोग उठते, आंगन में दीप जलाते, शंख बजाते और धूप की सुगंध से वातावरण भर जाता। चंडीपाठ शुरू होते ही बच्चे से बुजुर्ग तक श्रद्धा से सुनते थे। यह पूरे परिवार के साथ जुड़ने का अवसर था।

समय के साथ रेडियो की जगह मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों ने ले ली, लेकिन महालया का आकर्षण कायम है। जामुड़िया सहित ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग सुबह उठकर चंडीपाठ सुनते हैं। माध्यम बदला है, श्रद्धा नहीं।

शरद ऋतु, काश के फूल और दूर से आती चंडीपाठ की ध्वनि प्रकृति को मां के स्वागत के लिए तैयार करती प्रतीत होती है। नई पीढ़ी डिजिटल माध्यमों से इस परंपरा से जुड़ रही है, जबकि बुजुर्गों के लिए यह वही पुरानी सुबह है। महालया मन में भक्ति और उत्साह का पहला दीप जलाती है। “जागो तुमी जागो...” सुनते ही मन कह उठता है—मां आ रही हैं।

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