

सन्मार्ग संवाददाता
पुरुलिया : डॉक्टर और मरीज का रिश्ता केवल अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं होता। कभी-कभी डॉक्टर का एक मानवीय कदम इलाज से भी बड़ी उम्मीद बन जाता है। पुरुलिया में सामने आई ऐसी ही एक घटना ने चिकित्सा जगत के साथ-साथ आम लोगों का भी दिल जीत लिया है।
अग्न्याशय के बेहद जटिल कैंसर से जूझ रहे 58 वर्षीय गरीब मरीज की लगातार 9 घंटे 3 मिनट तक चली जटिल सर्जरी के बाद चिकित्सकों ने उसकी जान बचा ली। सर्जरी सफल रही और लंबे इलाज के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ हुआ। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। मरीज के घर लौटने की बारी आई तो शल्य चिकित्सक डॉ. पवन मंडल स्वयं आगे आए और अपनी कार से करीब 70 किलोमीटर दूर झालदा के बुरुड़ी गांव स्थित मरीज के घर तक उसे पहुंचाया।
मरीज झालदा के सुदूर बुरुड़ी गांव का रहने वाला है। पेशे से मामूली जूता विक्रेता और बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले इस 58 वर्षीय व्यक्ति के अग्न्याशय में एक विशाल न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर पाया गया था। मामला बेहद जटिल था और ऑपरेशन में काफी जोखिम था।
पुरुलिया सरकारी मेडिकल कॉलेज के हातुआड़ा कैंपस में शुरू हुई जिंदगी की वह जंग करीब 9 घंटे 3 मिनट तक चली ऑपरेशन। चिकित्सकों ने पूरी सावधानी और विशेषज्ञता के साथ जटिल ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा किया। चिकित्सा विज्ञान में इस तरह की सर्जरी को ‘व्हिपल प्रक्रिया’ (Whipple Procedure) कहा जाता है।
इस ऑपरेशन के दौरान अग्न्याशय के करीब दो-तिहाई हिस्से, ग्रहणी के पूरे हिस्से, पेट के कुछ हिस्से, पित्ताशय, पित्तनली और आसपास की लसीका ग्रंथियों को हटाया जाता है। इसके बाद शरीर के भीतर कई महत्वपूर्ण अंगों को बेहद सावधानी से दोबारा जोड़ा जाता है। मरीज के मामले में अग्न्याशय को छोटी आंत से, पित्तनली को छोटी आंत से तथा पेट को छोटी आंत से सफलतापूर्वक जोड़ा गया।
ऑपरेशन के बाद मरीज को हातुआड़ा से एंबुलेंस के जरिए सदर अस्पताल के सीसीयू में लाया गया। चिकित्सकों की लगातार निगरानी और इलाज के बाद उसकी हालत में धीरे-धीरे सुधार हुआ और आखिरकार वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया।
इस जटिल ऑपरेशन को सफल बनाने में शल्य चिकित्सकों की पूरी टीम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टीम में सोमनाथ विश्वास, पवन मंडल, मनीरुल इस्लाम, अर्चना मीना, गौरव मित्र और मेघा तमांग शामिल थे। वहीं एनेस्थीसिया टीम में सोमा सान्याल, शांतनु हाजरा, संदेश राठौड़ और अयन मुखर्जी ने जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा सिस्टर सुनंदा बिशई और ललिता मांडी का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
इलाज के बाद शुरू हुई इंसानियत की दूसरी कहानी
ऑपरेशन सफल होने के बाद जब मरीज के घर लौटने का समय आया, तब एक और सवाल सामने था। गरीब परिवार का यह मरीज करीब 70 किलोमीटर दूर अपने गांव तक कैसे पहुंचेगा? यहीं से इस कहानी ने चिकित्सा से आगे बढ़कर इंसानियत की मिसाल कायम की। डॉ. पवन मंडल ने मरीज को अपनी कार में बैठाया और स्वयं उसे उसके गांव तक छोड़ने निकल पड़े। यह घटना सिर्फ एक सफल ऑपरेशन की कहानी नहीं है। यह उस विश्वास की कहानी है, जो मरीज अपने डॉक्टर पर करता है।