पिंटू दास के बनाये शोला के गहने से निखर उठती है मूर्तियों की सुंदरता

दुर्गा पूजा के समय खाने तक का नहीं मिलता है समय
शोला से माता दुर्गा का मुकुट गढ़ते पिंटू दास
शोला से माता दुर्गा का मुकुट गढ़ते पिंटू दास
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मुर्शिदाबाद : दुर्गा पूजा बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार है। मूर्ति, गहने, थीम, आर्टिस्ट से लेकर मंडप, लाइटिंग वगैरह कई तरह के व्यवसाय के लोग दुर्गा पूजा में शामिल होते हैं। पूजा से कुछ महीने पहले तक उनके पास खाने का भी टाइम नहीं होता। चूंकि पूजा के मौसम में एक्स्ट्रा इनकम का मौका होता है, इसलिए विभिन्न कलाकार से लेकर अलग-अलग प्रोफेशन के लोग इस समय का बेसब्री से इंतजार करते हैं। वे दिन-रात काम करते हैं, खाने का ख्याल तक भूल जाते हैं। बहरमपुर के सैदाबाद नीमतला के रहने वाले गहना कलाकार पिंटू दास पांच दशकों से भी ज्यादा समय से मूर्तियों के लिए बुलेन ज्वेलरी बना रहे हैं। पिंटू दास के बनाये गहने की तारीफ राज्य की सीमाओं के बाहर और दूसरे राज्यों में भी होती है। वैसे तो वह साल भर थोड़ा-थोड़ा काम करते हैं, लेकिन पूजा के दौरान वह चार महीने दिन-रात काम करते हैं। इससे भी अच्छी इनकम हो जाती है। पिंटू दास की पत्नी लगभग चालीस सालों से अपने पति की मूर्तियों के गहने बनाने में उनकी मदद कर रही हैं। इसके अलावा, परिवार के दूसरे सदस्य भी जितना हो सके मदद करते हैं। पिंटू दास ने कहा कि इस साल बुलेन ज्वेलरी की अच्छी डिमांड है। कई काम इसलिए छोड़ने पड़े कारण उन्हें समय पर पूरा कर पाना संभव नहीं था। हालांकि, समय के साथ, मूर्ति के गहने का काम बदल गया है। उन्होंने अफसोस के साथ कहा कि पहले शोला का काम होता था। अब, वेटलैंड्स को भरकर बड़े-बड़े घर और मार्केट कॉम्प्लेक्स बनाए जा रहे हैं। इसीलिए शोला कम मिलता है। वहीं जब मिलता भी है, तो बहुत महंगा होता है। इसीलिए इसकी डिमांड कम है। अब, लेस, चुमकी, रेशम के धागे वगैरह से बोलेन का काम होता है। पिंटू दास चाहते हैं कि उनके वंशज इस प्रोफेशन में मूर्तियों के गहने बनाने की कला और परंपरा को आगे बढ़ाएं।

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