अंधेरे में मशाल की रोशनी, कंधे पर देवी को लेकर दौड़

कटवा के मुस्थुली की बोलतला काली के विसर्जन में आज भी जीवित है 300 साल पुरानी परंपरा
मां काली को लेकर दौड़ते श्रद्धालु (फाइल फोटो)
मां काली को लेकर दौड़ते श्रद्धालु (फाइल फोटो)
Published on: 

संजय, सन्मार्ग संवाददाता

बर्दवान : रात के अंधेरे में अचानक गांव की सारी बत्तियां बुझ जाती हैं। चारों तरफ सन्नाटा छा जाता है। उस अंधेरे को चीरते हुए जूट की सूखी लकड़ियों (पाटकाठी) की कतारबद्ध मशालें जल उठती हैं। कंधे पर देवी की प्रतिमा उठाकर भक्तों के मुख से ‘जय मां काली’ के जयकारे गूंज उठते हैं। इसके तुरंत बाद शुरू होती है एक अविश्वसनीय दौड़। कोई गाड़ी या वाहन नहीं, भक्तों के कंधों पर सवार होकर ही देवी निकल पड़ती हैं। पूर्व बर्दवान के कटवा स्थित मुस्थुली गांव की लगभग 300 साल पुरानी बोलतला काली पूजा ऐसी ही एक अनूठी विसर्जन परंपरा की गवाह बनती है।

​मुस्थुली की इस पूजा में देवी को ‘मां बोलतला काली’ के नाम से पूजा जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि मां अत्यंत जागृत हैं और वे भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं। सदियों पुरानी इस परंपरा को बनाए रखने के लिए एक पूजा ट्रस्ट का गठन किया गया है। ट्रस्ट के सदस्यों और ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से आज भी प्राचीन रीति-रिवाजों का पूरी निष्ठा के साथ पालन किया जाता है।

​दीपावली अमावस्या के दिन दोपहर में मंदिर परिसर में विशेष सिंदूर खेला का आयोजन होता है। क्षेत्र की विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं देती हैं। आधी रात के बाद लगभग 12 बजे तंत्र विधि से देवी की आराधना शुरू होती है। लगभग 11 फीट ऊंची प्रतिमा सोने और चांदी के आभूषणों से सुसज्जित की जाती है। रंगों के नए लेप से हर साल देवी मानो एक नया रूप धारण कर लेती हैं।

​हालांकि, इस पूजा का सबसे बड़ा आकर्षण देवी का विसर्जन है। रात की पूजा समाप्त होने के बाद मंदिर से प्रतिमा निकालने से पहले गांव की सारी लाइटें बंद कर दी जाती हैं। चारों ओर घना अंधेरा छा जाता है। उस अंधेरे में रोशनी का एकमात्र जरिया ग्रामीणों के हाथों में जलती हुई मशालें होती हैं। मशाल की रोशनी में रास्ते को रोशन करते हुए भक्त देवी को अपने कंधों पर उठा लेते हैं। इसके बाद दौड़ शुरू होती है। पल भर में पूरा इलाका ‘जय मां काली’ के जयकारों से गुंजायमान हो उठता है। मशालों की आग, भक्तों का उत्साह और कंधे पर देवी को लेकर दौड़ने का दृश्य एक अनूठा माहौल तैयार करता है।

​स्थानीय निवासियों की मान्यता है कि मां बोलतला काली को सामान्य रूप से पैदल ले जाना संभव नहीं है। उन्हें कंधे पर उठाकर दौड़ना ही प्राचीन रीति है। उसी नियम का पालन करते हुए देवी को मुस्थुली से पड़ोसी गांव आमडांगा ले जाया जाता है। वहां बूढ़ो शिव विराजते हैं। देवी और शिव के दर्शन का पर्व पूरा होने के बाद, प्रतिमा को उसी तरह दौड़ते हुए मुस्थुली गांव वापस लाया जाता है। इसके बाद मंदिर से सटे तालाब में प्रतिमा विसर्जन की रस्म पूरी की जाती है। ​पूजा समिति के सचिव उज्ज्वल कुमार मुखर्जी बताते हैं, यह हमारे गांव का मुख्य त्योहार है। मां का विसर्जन देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। 300 से भी अधिक वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। समय के साथ गांव का रूप बदल गया है, त्योहार का आयोजन बदल गया है, लेकिन मुस्थुली की बोलतला काली के विसर्जन की यह प्राचीन परंपरा आज भी उसी तरह जारी है। अंधेरे में मशाल की रोशनी में देवी को लेकर भक्तों की वह दौड़ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि सदियों के विश्वास, भक्ति और लोक संस्कृति का एक जीवंत उदाहरण है। बंगाल के ग्रामीण इलाकों की ऐसी ही कुछ परंपराएं आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक गांव की अपनी पहचान और संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं।

सन्मार्ग को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं →
Follow Sanmarg on Google News