

व्यवहार कुशलता नारी की सभ्यता का वह आईना है जिसमें समाज को उस की मनोहारी छवि दिखाई देती है। कुशल महिला ही समाज में सम्मान पाती है जबकि अशिष्ट और अव्यावहारिक महिलाओं की समाज में कोई पूछ परख नहीं होती। शिष्टाचार और व्यवहार कुशलता ऐसा जादू है कि लोग स्वतः आप की ओर खिंचे चले आते हैं क्योंकि आप के व्यवहार की छाप अमिट होती है।
आप का व्यवहार आडम्बरयुक्त न होकर स्वाभाविक होना चाहिए। यदि आप की व्यवहार कुशलता क्षणिक न होकर स्थायी है तो आप की पीठ के पीछे भी लोग आप की तारीफ करेंगे। व्यवहार कुशलता शारीरिक सुन्दरता की कमी को पूरा कर देती है। वही सर्वाधिक सुन्दर है जो अपने शिष्ट व्यवहार से दूसरों के हृदय पर विजय प्राप्त करने में समर्थ हो। बिना व्यवहार कुशलता के शारीरिक सौंदर्य का कोई मूल्य नहीं है। व्यवहार कुशलता का क्षेत्रा असीमित है। इसकी जरूरत तो जीवन के हर क्षेत्रा और मोड़ पर होती है।
बात करना भी एक कला हैः-
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि अपने से छोटे, बड़े और बराबरी वालों से किस शैली में बात की जाये। शिष्टाचार तो यही कहता है कि सामने वाला व्यक्ति आप से उम्र में छोटा है अथवा बड़ा, उसे आप कहकर संबोधित करना चाहिए। बड़ों से आदरपूर्ण ढंग से बोलना एवं व्यवहार किया जाना चाहिए। बातचीत इस प्रकार करनी चाहिए कि जिन्हें आप सुनाना चाहती हैं, वहीं तक आप की आवाज पहुंचे। चीखते चिल्लाते हुए बात करना शिष्टाचार के विरूद्ध है। यदि आप शिष्ट तरीके से बात करेंगी तो आप की बात का सामने वाले के मन पर स्थायी प्रभाव पड़ेगा।
समारोह में आप का व्यवहार:-
समारोह में भी आप को आवश्यक शिष्टाचार का ध्यान रखना चाहिए, किस प्रकार उठना बैठना चाहिए, किस प्रकार से खाना पीना चाहिए, इन सब में आवश्यक शिष्टता बरतनी चाहिए। पार्टी में जाते ही खाद्य सामग्री पर कुछ लोग ऐसे टूट पड़ते हैं मानो कई दिनों से भूखे हों।
यदि भोजन खाने की मेज पर हो रहा है तो शिष्टाचार की आवश्यकता और बढ़ जाती है। जल्दी जल्दी और बड़े-बड़े ग्रास लेकर खाना भी अशिष्टता है। यदि आपने अन्य लोगों से कुछ मिनट पूर्व ही अपना भोजन समाप्त कर लिया है तो उन के उठने तक का इन्तजार कीजिए।
सलीके से रहना और वस्त्र पहनना भी शिष्टता का एक आवश्यक अंग है। कुर्ते के दो तीन बटन खुले रखना अथवा बाहें चढ़ाए रखना क्या शिष्टता है?
बिना अंग प्रदर्शन किये भी शालीनता से रहा जा सकता है। कुछ ऐसी बातें होती हैं कि जिन पर हमारा ध्यान नहीं जाता किन्तु वहां शिष्टता का ध्यान रखा जाना चाहिए। अन्य लोगों के समक्ष मुंह फाड़ कर जम्हाई लेना, जोर से हंसना-छींकना, दांत निकाल कर जोर जोर से हंसना क्या अशिष्टता नहीं है?
यह माना जा सकता है कि जम्हाई, खांसी, छींक अथवा हंसी रोकना अपने बस में नहीं है लेकिन कम से कम शिष्टता का तो ध्यान रखना चाहिए। खांसते, छींकते जम्हाई लेते समय मुंह पर हाथ अथवा रूमाल रख कर शिष्टता का परिचय दिया जा सकता है।
अपने आनन्द के लिए दूसरों को कष्ट पहुंचाना भी शिष्टाचार के विरुद्ध है। अपना रेडियो, टेपरिकार्ड, टी.वी. इतना तेज न बजाएं कि आस पास रहने वालों को इस से तकलीफ पहुंचे। यदि अपने व्यवहार में शालीनता और शिष्टता नहीं है तो वह सीखनी चाहिए और अपने स्वभाव का अभिन्न अंग बनाना चाहिए क्योंकि यह आदत जीवनपर्यन्त काम आती है।
वीर सुरिन्दर डोगरा(उर्वशी)