

भारत के विवाह उत्सवों में पारंपरिक परिधान लहंगा या घाघरा अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। विशेषकर उत्तर भारत में जयमाला के समय दुल्हन के परिधान का अहम् हिस्सा है लहंगा। लाल-गुलाबी कपड़े पर सोने और चांदी की जरी से सजा लहंगा दुल्हन की खूबसूरती में चार चांद लगाता है। लहंगा ऊपर से तो कसावट लिए होता है लेकिन जैसे-जैसे यह नीचे की ओर बढ़ता है, गोल बड़े घेरे में अपनी खूबसूरती बिखेरता जाता है।
भारत में लहंगे का जन्म पांचवीं - छठी सदी में माना जाता है और मुगलों के आगमन के बाद तो यह परिधान दिन पर दिन निखरता गया। उस काल में लहंगा चीन से आयात किये गये सिल्क के कपड़े से बनता था परंतु सिल्क महंगा होने के कारण यह लहंगा सिर्फ उच्च वर्ग तक ही सीमित था। आज आप सिल्क, जारजेट, नेट, क्रेप, चंदेरी, साटन, सूती कपड़ों से निर्मित लहंगों को बाजार में देख सकते हैं जो हर वर्ग के लिए बाजार में उपलब्ध हैं।
वैसे तो लहंगे हर जगह बनते हैं फिर भी बाजार में लखनऊ, जयपुर, फर्रुखाबाद, कोलकाता और दिल्ली में बनने वाले लहंगों की मांग ज्यादा रहती है। लगभग 10 किलो तक के और सात मीटर घेरे वाले चटकीले सुंदर डिजाइनों से सजे लहंगों की कीमत पांच हजार रूपए से लाखों रुपयों के बीच हो सकती है।
ब्राइडल लहंगे तैयार करने के लिए सोने व चांदी की तारों, सितारों, गोटे व जरी आदि की जरूरत होती है। इन लहंगों पर बारीक कढ़ाई की जाती है जिसे जरदोजी वर्क के नाम से जाना जाता है। लहंगे पर जरदोजी का काम करने वाले कारीगरों को जरदौज कहा जाता है।
आजकल लहंगों में पुरानी कढ़ाई की शैली की झलक और आधुनिक रंगों का समन्वय देखने को मिलता है। पहले संगी का लहंगा चलता था जिसे वरपक्ष के लोग चढ़ावे में साथ ले जाते थे जो प्रायः लाल रंग का होता था। इसे पहनकर ही लड़की की विदाई होती थी। अब तो तरह-तरह के जड़ाऊ कामदार लहंगों का प्रचलन बढ़ गया है। विवाह के लिए दुल्हन की पोशाक को और खूबसूरत व आकर्षक बनाने के लिए डिजाइनर चटख रंग के कपड़ों का प्रयोग करते हैं। विवाह के मौके पर पहने जाने वाले शुभ रंगों में पीला, गुलाबी, लाल, मजेंटा आदि हैं। सिल्क, क्रेपनेट या शिफॉन इत्यादि कपड़ों पर कली काट के या आड़ा कटिंग करके लहंगे को बेहतरीन आकार देते हुए भारी कढ़ाई की जाती है। चोली और ओढ़नी पर भी बहुत बारीक काम किया जाता है जिससे दुल्हन को जो भी देखे, बस उसे ही निहारता रह जाए। परंपरागत लहंगों की तुलना में आजकल के लहंगे काफी हल्के होते हैं। ब्राइडल लहंगों में परंपरागत रंगों की अपेक्षा नए रंग दिखने लगे हैं। संतरी, रॉयल ब्लू, सी-ग्रीन, टरक्वाइश आदि रंगों को नयी दुल्हनें व उनके परिवार के सदस्य आजकल खूब पसंद कर रहे हैं।
आजकल 80 प्रतिशत दुल्हनें लहंगा-चुन्नी ही पसंद करती हैं। रोका या सगाई, संगीत, मेंहदी की रात, काकटेल, शादी के दिन और रिसेप्शन पर लहंगा चुन्नी पहनने का फैशन है। वैसे भी हर स्त्री की चाहत होती है कि उसके वार्ड रोब में एक झिलमिलाता और सबसे सुंदर लहंगा जरूर हो जो उसे दूसरों से अलग पहचान दे सके। (उर्वशी)सर्वेश कुमार ’सुयश‘