

आजकल बाजार में औरतों के लिए तरह-तरह की ड्रेसेज दिखाई देंगी लेकिन साड़ी की तो बात ही निराली है। भारतीय नारी और साड़ी एक-दूसरे के अभिन्न अंग हैं। जैसी गरिमामय, साड़ी में कायदे से लिपटी नारी लगती है, उसका कोई मुकाबला नहीं।
साड़ी में जो खास बात है, वह है उसका शारीरिक कमियों को छुपा लेना। फिगर नपा तुला, सुंदर हो, उस पर साड़ी की सजावट तो कहना ही क्या लेकिन अगर शरीर कुछ बेडौल है तो उस बेडौलता को भी साड़ी ढक लेती है।
इसी तरह दुबलेपन को भी साड़ी ढंक लेती है।
साड़ी के चुनाव में बस थोड़ी सूझबूझ और कल्पना की जरूरत होती है। यह जरूरी नहीं कि आप महंगी साड़ियों को पहनकर ही सुंदर दिख सकती हैं इसलिए कम बजट होने पर निराश होने की जरूरत नहीं है। बाजार हर तरह की कम से कम और ज्यादा से ज्यादा मूल्य की साड़ियों से अटा पड़ा है। बजट को देखते हुए मौसम, फिर अपना कॉम्पलेक्शन (वर्ण) ध्यान में रखकर साड़ी खरीदें। कहीं ऐसा न हो, देखादेखी फैशन की होड़ में गलत चुनाव कर बैठें और बाद में जब साड़ी वापस न हो सके तो आप पछताती रह जाएं ।
अगर आपका शरीर स्थूल है तो मोटी साड़ी न पहनें, न ही बारीक साड़ी ही आपको अच्छी लगेगी। सिल्क की साड़ी आप पर फबेगी। पारदर्शी सार्ड़ी तो बिल्कुल भी न पहनें। ज्यादा कलफ लगी साड़ी पहनने पर मोटी औरतें और मोटी लगती हैं। ऑरगंडी या इसी तरह की फूली कलफदार या कुछ मोटी साडि़यां लंबी पतली औरतों पर ही आकर्षक लगती हैं।
किस जगह पर किस तरह की साड़ी पहनी जाए, यह भी ध्यान देने योग्य है।
किस जगह पर किस तरह की साड़ी पहनी जाए, यह भी ध्यान देने योग्य है। यह नहीं कि झट जो साड़ी आगे रखी है, उसे ही पहन लिया जाए। जैसे बाजार बच्चे के स्कूल, सिनेमा, पिकनिक वगैरह में भारी साड़ी बेतुकी भी लगेगी। वैसे ही शादी ब्याह में सादी साड़ी, खासकर जब उम्र जवान हो और आपकी अलमारी भी समृद्ध हो और आप इसे इस्तेमाल न करें, इसमें अक्लमंदी नहीं।
ग्रीष्म ऋतु में तेज धूप में भड़कीले रंग आंखों को चुभते हैं। खासकर काला रंग बहुत जल्द तपने लगता है। सुबह दोपहर में खासकर, हल्के रंग की साड़ी ही ठीक लगेगी।
ग्रीष्म ऋतु में तेज धूप में भड़कीले रंग आंखों को चुभते हैं। खासकर काला रंग बहुत जल्द तपने लगता है। सुबह दोपहर में खासकर, हल्के रंग की साड़ी ही ठीक लगेगी। हां, रात को गहरे रंग की साड़ी पहनी जा सकती है। इस ऋतु में सूती साड़ियां ही बढ़िया रहेंगी। इनमें हवा पास होने से गर्मी कम लगती है। ये पसीने को सोख लेती हैं जबकि सिंथेटिक बदन से चिपकने लगती हैं। उनमें हवा का निकास न हो सकने से वे ज्यादा गर्मी पैदा करती हैं।
जाड़े के मौसम में रेशमी सिंथेटिक और इसी तरह की मिलीजुली साड़ियां पहनी जा सकती हैं। इनमें ठंड से बचाव होता है।
साड़ियां खरीद-खरीदकर ढेर लगाना जितना आसान है उनका रख रखाव उतना आसान नहीं है
एक कहावत है आप कपड़े की इज्जत करेंगी तो कपड़ा आपकी। यही बात साड़ी पर भी लागू होती है। साड़ी की इज्जत से यहां तात्पर्य उसके रखरखाव से है। साड़ियां खरीद-खरीदकर ढेर लगाना जितना आसान है उनका रख रखाव उतना आसान नहीं है। इसके लिए मेहनत के साथ सूझबूझ-अक्लमंदी और नॉलेज चाहिए।
साफ सुथरी, सलीके से बंधी साड़ी में आपको किसी के अचानक आने पर हीनता का बोध नहीं होगा।
रंगीन साड़ी धूप में न सुखाएं। इससे उसका रंग बदरंग हो जायेगा तथा चमक भी जाती रहेगी। जो साड़ियां ड्राइक्लीन होनी चाहिए, उन्हें घर में धोने का लालच न करें। हल्की गीली साड़ी को तहकर अल्मारी में न रखें। इससे उसमें बदबू आने लगेगी। उसे अच्छी तरह सुखाकर प्रेस करके ही अंदर रखें।
साफ सुथरी, सलीके से बंधी साड़ी में आपको किसी के अचानक आने पर हीनता का बोध नहीं होगा। दूसरों से मान और प्रशंसा हर स्त्री चाहती है। उसके लिए सलीके से बोलने के अलावा सलीके से रहना भी अहम् बात है। उषा जैन ’शीरीं‘(उर्वशी)