

विवाह के बाद साथ-साथ कुछ साल रहने के बाद खुद ही पति-पत्नी एक दूसरे से काफी हद तक अलग हो जाते हैं। एक-दो बच्चों के मां-बाप बनने के बाद तो स्थिति और भी अधिक नाजुक हो जाती है। पत्नी घरेलू कार्यों और बच्चों में इस कदर उलझ कर रह जाती है कि वह यह भी भूल जाती है कि घर में उसका पति भी है। कुछ ऐसी ही मानसिकता पति की भी हो जाती है। वह भी घर खर्च के लिए पैसे जुटाने और बाहर के कार्यों को करने में इतना रम जाता है कि उसे अपनी पत्नी की इच्छा-अनिच्छा का भी कोई ध्यान नहीं रह जाता।
पति-पत्नी दोनों में से किसी एक को यह महसूस हो कि हमारे संबंधों में बासीपन भरता जा रहा है, हम घरेलू जिम्मेदारियों में सिमटते जा रहे हैं और हमारे प्यार का दायरा दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है तो अपने संबंधों में फिर से ताजगी लाने का कोई सुन्दर सा उपाय ढूंढने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि यह रिश्ता सिर्फ मूक बनकर जीने भर तक ही सीमित नहीं होता।
प्यार की अभिव्यक्ति हमेशा शब्दों से ही होनी चाहिए। मन ही मन किसी से प्यार करना उतना प्रभावशाली नहीं होता जितना खुले शब्दों में कुछ इस तरह कह कर होता है कि "तुम वाकई गजब की सुन्दर हो। तुम्हारे हाथ के बने परांठे तो मेरी भूख और अधिक बढ़ा देते हैं।" ऐसे ही पत्नी को भी पति के लिए लाजवाब शब्द ढूंढने चाहिए ।
इस विषय में मनोवैज्ञानिकों का भी यही कहना है कि जिस आकांक्षा को मन में संजोये हुए स्त्री-पुरुष दाम्पत्य जीवन में प्रवेश करते हैं, उस आकांक्षा का जीवन भर बने रहना बहुत जरूरी है क्योंकि आने वाली पीढ़ी को वे दोनों अपने आपस के प्यार से ही एक अच्छा इंसान बना सकते हैं। बच्चों के आदर्श माता-पिता ही तो होते हैं । अगर वे एक दूसरे के बहुत करीब हैं, एक दूसरे के कार्यों में अपनी भागीदारी निभाते हैं तो फिर बच्चे भी तो उनकी तरह ही बनेंगे न।
कहने का तात्पर्य यह है कि एक दूसरे को प्रशंसा भरे शब्दों में एक दूसरे के सामने जरूर कहना चाहिए। अगर पत्नी-पति के स्पर्श और परिहास को पसंद करती है तो पति को ऐसा करना चाहिए। अगर पति भी पत्नी के नाज नखरे को पसंद करता है तो उसे भी चूकना नहीं चाहिए। एक दूसरे की इच्छाओं के अनुरूप अपने आप को ढाल कर ही दांपत्य को सजीवता दी जा सकती है। अपने जीवन साथी के सामने अपनी बातों को कहने का ढंग सीखें और उसे कभी नर्वस न होने दें। पति-पत्नी साथ रहकर भी हमेशा उदास रहें तो फिर यह कैसा दाम्पत्य जीवन है, इतना तो आप जरूर ही सोचें । फिर शायद ही आप एक दूसरे के क्रियाकलापों से बोर हो पायें। (उर्वशी)ओंकार सिंह