

समय के साथ हमारे रहन-सहन व विचारधारा में बहुत अन्तर आया है। नारी शिक्षा से जहां स्त्री में जागरूकता आई, वहीं उसके अपनी अस्मिता के लिए जूझते रहने के कारण घर, परिवार की शांति में भी बाधाएं उत्पन्न होने लगी। दांपत्य बंधन कमजोर पड़ने लगे। तलाक की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी। दहेज को लेकर लड़कियों को प्रताड़ित करने एवं उन्हें जलाये जाने का सिलसिला कानूनी खौफ होने के बावजूद रुका नहीं।
इन्हीं कारणों को मद्देनजर रखते हुए आज यह जरूरी हो गया है कि लड़कियों की शादी तब की जाए, जब वे अपनी पढ़ाई पूरी कर कोई कैरियर चुन लें। नौकरी न भी करना चाहें तो कभी जरूरत पड़ने पर वे आत्मनिर्भर बन सकें। किसी की मोहताज रहकर जिल्लत की जिंदगी न जीएं। पढ़ाई पूरी करने में समय लगता है। तब तक लड़की भी इतनी परिपक्व तो हो ही जाती है कि अपना भला-बुरा समझकर अन्याय का प्रतिकार कर सके। बाईस से पच्चीस वर्ष की उम्र तक लड़की का विवाह आज के समयानुसार सही होगा। यही वह समय है वह समायोजन के लिए ज्यादा काबिल होती है अर्थात् अब न वह एक अल्हड़ अपरिपक्व किशोरी रह जाती है, न ही इतनी परिपक्व होती है कि आदतों को बदल ही न सके।
ससुराल में दो दिन भी नहीं गुजार सकी
अरुणा की शादी उसके दादाजी के कहने पर अठारह वर्ष की उम्र में ही कर देनी पड़ी। अमीर घर की नाजों पली लड़की के आगे, पीछे नौकर घूमते, खर्च को बेहिसाब पैसा मिलता, एक शोफर ड्रिवन कार हर समय उसके घूमने, शॉपिंग व तफरीह के लिए तैयार रहती। जिस घर में वह ब्याह कर गई, वे लोग हीरे जवाहरात के करोड़पति व्यापारी थे लेकिन घर का वातावरण काफी परंपरावादी था। वहां के कडे़ अनुशासन नियम कायदे में अल्हड़ किशोरी अरुणा दो दिन भी नहीं गुजार सकी।
ससुराल में दोबारा पैर न रखा
शामली डॉक्टर थी। डिग्रियां लेते लेते वे पैंतीस पार कर गई थी। अब तक उसके व्यक्तित्व में परिपक्वता आ चुकी थी। उसकी आदतें उसकी फितरत बन चुकी थी। जीवन जीने का अपना नजरिया, अपने तौर तरीके बन गए थे। उसका सोचने का ढंग, उसके उसूल व विचारधारा ऐसी बन गई थी जिसे बदल पाना उसके लिये अब संभव न था। फिर शिक्षित होकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो चुकी थी। वह भला किसी के आगे क्यों झुके। वह एडजस्ट नहीं कर पाई। पति को अपने परिवार से अत्यधिक लगाव था। वे भला पारिवारिक लोगों की अवहेलना कैसे बर्दाश्त करते। नतीजन शामली लौटकर ऐसी आई कि फिर उन्होंने ससुराल में दोबारा पैर न रखा।
मध्य परिवार की सुषमा साढे़ बाईस वर्षीय विवाह करा कर जब परिवार में गई, उस समय न तो वह अधिक परिपक्व थी, न ही अल्हड़ जबकि वह गवर्नमेंट जॉब में थी। उसने ससुराल के कहने पर नौकरी छोड़ दी और ओवर आल उसकी एडजस्टमेंट परिवार में प्रारम्भ के एक दो वर्ष को छोड़कर अच्छी रही क्योंकि वो बड़ों की बात को आसानी से मान जाती थी।
कैरियर और विवाह बहुत एडजस्टमेंट मांगते हैं
स्पष्ट है कि ज्यादा कम एवं अधिक उम्र होने की स्थितियों में लड़की के लिए नए परिवेश में तालमेल बिठा पाना कठिन होता है। इसलिए उचित यही है कि अगर पारिवारिक जिम्मेदारियों की मजबूरी या कोई और समस्या न हो तो लड़की को चाहिए कि वह महत्वाकांक्षाओं के फेर में पड़कर विवाह को बड़ी उम्र तक न टाले। कैरियर और विवाह बहुत एडजस्टमेंट मांगते हैं। इसीलिए आजकल अधिकतर कामकाजी लड़कियां विवाह से कतरा रही हैं। शादीशुदा जिन्दगी से मिलने वाले सुख संतोष और तृप्ति के लिए सही वक्त में रिश्ता हर प्रकार से उचित रहता है।एडजस्टमेंट में भी समस्याएं कम आती हैं। (उर्वशी)