लव मैरिज के साइड इफेक्ट्स : जल्दबाजी, हीन भावना और मानसिक असमानता कैसे बिगाड़ते हैं वैवाहिक जीवन

लव मैरिज में जल्दबाजी, शारीरिक आकर्षण को लेकर हीन भावना और शक-संदेह रिश्ते में जहर घोल देते हैं, जिससे आर्थिक सुरक्षा, भरोसा और सम्मान के बावजूद दांपत्य जीवन असंतुलित हो जाता है
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लव मैरिज के साइड इफेक्ट्सAi Generated
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भावनाओं में बहकर लड़कियां विवाह बगै़र सोचे समझे कर तो लेती हैं लेकिन फिर निभा नहीं पातीं। जल्दबाजी में लिए गए फैसले पर उन्हें आजीवन पछताना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि माता पिता द्वारा तय किए गए रिश्ते हमेशा सफल ही रहते हैं। तलाक अरेंज्ड मैरिज में भी होते हैं, फिर भी तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो प्रेम विवाह कम ही सफल होते हैं।

लव मैरिज में साइड इफैक्टस के कई कारण हैं-

सुंदरता को लेकर काॅम्पलेक्स

अक्सर यह देखा जाता है कि जब कोई स्त्री केवल आर्थिक सुरक्षा या धन-संपदा को प्राथमिकता देकर ऐसे पुरुष से विवाह कर लेती है जिसके शारीरिक आकर्षण (looks) को वह स्वीकार नहीं कर पाती, तो कालांतर में यह स्थिति हीन भावना (inferiority complex) का रूप ले लेती है। ऐसा पुरुष अपनी पत्नी के संदर्भ में निरंतर असुरक्षा महसूस करने लगता है। परिणामस्वरूप, उसका यह अविश्वास उसके व्यवहार में झलकने लगता है और वह अपनी पत्नी के हर परिचित व्यक्ति, यहाँ तक कि घरेलू सहायकों को भी संदेह की दृष्टि से देखने लगता है। कई बार उसका यह अनियंत्रित शक रिश्ते में इतनी कड़वाहट घोल देता है कि वह यथार्थ में भी बदल सकता है।

वहीं, यदि स्थिति विपरीत हो—अर्थात पति का व्यक्तित्व आकर्षक हो और पत्नी को यह लगे कि उसने स्वयं को आर्थिक रूप से 'खरीद' लिया है—तो महिला के मन में अपने पति को लेकर अत्यधिक अधिकारवादी (over-possessive) सोच विकसित हो जाती है। वह अपने पति के प्रति निरंतर आशंकित रहती है। इस प्रकार की घुटन भरी वैवाहिक स्थिति से पति अक्सर बाहर निकलने के रास्ते खोजने लगता है। यद्यपि कुछ लोग अपनी नैतिक सीमाओं के प्रति सजग बने रहते हैं, परंतु अधिकांश स्थितियों में ऐसा देखने में नहीं आता है।

मानसिक स्तर में असमानता

दोनों के बीच कॉम्पेटिबिल्टी जरूरी है। इसके लिए दोनों की सोच में भी समानता जरूरी है। पहले शिक्षा के स्तर में असमानता इतने मायने नहीं रखती थी लेकिन आज जब महिलाओं में अवेयरनेस बढ़ी है अपनी अस्मिता व अधिकारों को लेकर वे सचेत हो गई हैं। वे पति की गुलाम बनने को तैयार नहीं। अगर वे पढ़ी लिखी हैं तो अपनी बात तार्किक ढंग से समझा सकती है जिसे पति सही होने पर देर सवेर मानेगा ही। पढ़ी लिखी न होने पर अपनी बात समझा न पाने पर वो फ्रस्टेटेड रहेगी। ऐसे में उनका दांपत्य खुशहाल नहीं रह सकता।

प्रेमी-प्रेमिका की गुटरगूं में चहक तभी मिलेगी जब दोनों हमउम्र हों

प्रैक्टिकल होकर न सोचना

माता-पिता जब बेटी के लिए लड़का ढूंढते हैं, वे सबसे पहले इस बात पर ध्यान देते हैं कि लड़का कुछ कमाता धमाता भी है या नहीं। लड़के के मां-बाप भले ही अमीर हों, लड़का अपने पैरों पर खड़ा हो, यह सभी लड़कियों के मां-बाप जरूरी समझते हैं। केवल मन ही न देखें, प्यार में एज बहुत मायने रखती है। प्रेमी-प्रेमिका की गुटरगूं में चहक तभी मिलेगी जब दोनों हमउम्र हों। आज के दौर में आदर्श यही होगा। फादर फिगर या मदर फिगर दिल का एक ही कोना संतुष्ट करेगा। ओवरऑल संतुष्टि के लिए फ्रैंडशिप जरूरी है।

बड़ी उम्र के पुरुषों के पास क्योंकि जिन्दगी का अनुभव होता है, वे युवतियों की पसंद नापसंद अच्छी तरह जानते हैं। बड़ी उम्र में उनमें ठहराव भी होता है जिस पर कई बार लड़कियां निछावर हो जाती हैं। उन्हें उसमें आदर्श पति मटीरियल नज़र आता है लेकिन उनसे शादी के बाद जब उनमें उन्हें उत्साह का अभाव मिलता है तो वे मायूस हो जाती हैं। ये हैं लव मैरिज के कुछ साइड इफैक्ट्स।

आज प्यार करने के बाद में विवाह का झूठा नाटक कर बेवफाई करने वाले न लड़कों की कमी है, न लड़कियों की

प्यार अंधा होता है

इसलिए अच्छा तो यही रहेगा कि मां-बाप द्वारा तय की गई शादी को ही प्रिफरेंस दी जाए। प्यार अंधा होता है। इसमें अच्छा-बुरा कुछ दिखाई नहीं देता। विवाह जीवन का एक अहम फैसला है जिसमें जिन्दगी फिर नए सिरे से शुरू होती है।

शुरुआत बेहतर हो, यह सभी जोड़े चाहते हैं। अगर धोखेबाज़ों की बात छोड़ दी जाए क्योंकि आज प्यार करने के बाद में विवाह का झूठा नाटक कर बेवफाई करने वाले न लड़कों की कमी है, न लड़कियों की। उपर्युक्त सभी पहलुओं पर खूब सोच विचार कर ही सात फेरों के बंधन में बच्चों । आज के वक्त में जांच पड़ताल का कोई बुरा नहीं मानेगा और मानना भी नहीं चाहिए।

उषा जैन शीरीं(उर्वशी)

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