

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के दिग्मा गांव की रहने वाली रत्ना मजूमदार (22) और उनकी सास शांति मजूमदार की जोड़ी ने सास-बहू के रिश्ते को लेकर समाज में व्याप्त रूढ़िवादी धारणाओं को पूरी तरह बदल दिया है। दोनों ने न केवल अपने घर को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है, बल्कि फूलों की खेती के जरिए पूरे गांव के लिए आत्मनिर्भरता की एक नई मिसाल कायम की है।
पारंपरिक खेती से उद्यमिता का सफर
शादी के बाद जब रत्ना ससुराल आईं, तो उन्होंने अपने ससुर से प्रेरित होकर सीमित संसाधनों के साथ फूलों की खेती शुरू की। धीरे-धीरे इस छोटे से प्रयास को उन्होंने एक सफल व्यवसाय में बदल दिया। धान और सब्जियों की पारंपरिक खेती के मुकाबले फूलों की खेती में अधिक मुनाफा देखकर उन्होंने इसका दायरा बढ़ाया। आज वे दो एकड़ भूमि पर फूलों की खेती कर रही हैं, जहाँ से स्थानीय बाजारों के अलावा पड़ोसी जिलों में भी फूलों की भारी आपूर्ति की जाती है। शादियों और त्योहारों के सीजन में उन्हें बड़े ऑर्डर भी मिलते हैं।
रोजगार और आर्थिक सशक्तीकरण
इस खेती ने न केवल मजूमदार परिवार की स्थिति सुधारी है, बल्कि गांव के अन्य लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। फूलों की तुड़ाई, देखभाल और पैकिंग जैसे कार्यों के लिए उन्होंने स्थानीय मजदूरों को काम पर रखा है। उनके इस सफल मॉडल को देखकर अब गांव के अन्य लोग भी पारंपरिक खेती छोड़कर फूलों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं ।
प्रशासनिक सहयोग और भविष्य की राह
जिला प्रशासन भी इस पहल को खूब प्रोत्साहित कर रहा है। सरगुजा कलेक्टर अजीत वसंत के अनुसार, स्थानीय स्तर पर फूलों की मांग अधिक है, लेकिन अभी भी आपूर्ति के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रशासन इस दंपति को गुणवत्तापूर्ण बीज और सब्सिडी जैसी सहायता प्रदान कर रहा है, ताकि फूलों की खेती को एक व्यापक व्यवसाय के रूप में स्थापित किया जा सके । सास शांति मजूमदार कहती हैं कि रत्ना के आने से न केवल परिवार में नई ऊर्जा आई है, बल्कि आधुनिक पद्धतियों से उन्होंने खेती को एक नई दिशा दी है ।