

पुरुषों में अक्सर यह गलत धारणा होती है कि नौकरी न करने वाली पत्नियाँ घर में सारा दिन निठल्ली बैठकर मौज करती हैं और पति का पैसा उड़ाती हैं। उनकी नजर में घर का काम कोई काम नहीं होता और वे हमेशा यही सवाल करते रहते हैं कि उनकी पत्नी सारा दिन करती ही क्या है? वे केवल नौकरी करने वाली महिलाओं को ही कामकाजी मानते हैं और घरेलू स्त्रियों के श्रम को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं।
एक गृहिणी की अदृश्य और थका देने वाली दिनचर्या
एक गृहिणी सुबह मुंह अँधेरे उठकर रात को सबसे अंत में सोती है। वह बच्चों की देखरेख, बुजुर्गों की सेवा, घर की सफाई और मेहमानों के स्वागत जैसे तमाम अनगिनत काम बिना किसी वेतन और शिकायत के खुशी-खुशी करती है। उसी की बदौलत पति दफ्तर में चिंतामुक्त होकर काम कर पाता है। इसके बावजूद पुरुषों को लगता है कि ये सारे काम चुटकी बजाते ही अपने आप हो जाते हैं।
भगवान से शिकायत और जीवन अदला-बदली की अनूठी शर्त
एक बार एक व्यक्ति ने भगवान से शिकायत की कि वह दिन-रात मेहनत करके कमाता है, जबकि उसकी पत्नी घर पर आराम करती है और मजे उड़ाती है। भगवान ने उसकी यह शिकायत दूर करने के लिए उसे दो दिन तक अपनी पत्नी के साथ भूमिका बदलकर उसकी जिंदगी जीने का सुझाव दिया, जिसे उस आदमी ने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया।
जब पति को हुआ गृहस्थी के संघर्षों का असली अहसास
अगले दिन सुबह पाँच बजे से ही उस आदमी की व्यस्तता शुरू हो गई। बच्चों का लंच बनाना, उन्हें स्कूल भेजना, पत्नी का नाश्ता तैयार करना, घर की सफाई करना, कामवाली को संभालना, बच्चों को खाना खिलाकर होमवर्क कराना, ट्यूशन ले जाना और शाम को थके होने पर भी पत्नी को खाना परोसकर उसकी नुक्ताचीनी चुपचाप सहना-यह सब उसके लिए बेहद कठिन था। इस दो दिन के अनुभव ने उसकी आँखें खोल दीं और उसे अपनी पत्नी के योगदान की असल कीमत समझ आ गई।
अहंकार का त्याग और महिलाओं के प्रति सहृदयता
अंततः अपनी गलती का अहसास होने पर उस आदमी ने भगवान से प्रार्थना की कि उसे वापस पुरुष बना दें, क्योंकि वह पत्नी के जितने काम नहीं संभाल सकता था। यह कहानी हर उस पुरुष के लिए एक सीख है जो गृहिणियों के श्रम को कम आंकता है। पुरुषों को अपने मिथ्या अहंकार का त्याग करके पत्नियों के प्रति सहृदयता दिखानी चाहिए, उनके स्वाभिमान का सम्मान करना चाहिए और घर के कामों में उनका हाथ बंटाना चाहिए। चन्द्र प्रभा सूद (उर्वशी)