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देश की भाषाओं ने राष्ट्र को विभाजित नहीं, एकजुट किया है: उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने भारतीय भाषाओं पर तीसरे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में कहा, भाषाई विविधता को बढ़ावा लोकतंत्र को मजबूत करता है

नयी दिल्ली, सन्मार्ग सम्वाददाता

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शुक्रवार को कहा,भाषा, सभ्यता की अंतरात्मा होती है। जो पीढ़ियों तक सामूहिक स्मृति, ज्ञान प्रणालियों और मूल्यों को संजोए रखती है। प्राचीन शिलालेखों और ताड़ के पत्तों पर लिखी पांडुलिपियों से लेकर आज की डिजिटल लिपियों तक, भाषाओं ने दर्शन, विज्ञान, कविता और नैतिक परंपराओं को संरक्षित किया है जो मानवता को परिभाषित करती हैं। देश की भाषाओं ने राष्ट्र को विभाजित नहीं, एकजुट किया है। भाषाओं की रक्षा करना सभ्यता की रक्षा करना है। भाषाओं के संरक्षण में देश अपनी सभ्यताओं का संरक्षण करता है; भाषाई विविधता को बढ़ावा लोकतंत्र को मजबूत करता है।

उपराष्ट्रपति ने दिल्ली में भारतीय भाषाओं पर तीसरे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में कहा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा मिल रहा है। उन्होंने, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और भारतीय भाषाओं की पांडुलिपियों के संरक्षण और प्रसार के लिए ज्ञान भारतम मिशन की सराहना करते हुए कहा, ज्ञान पवित्र है और इसे साझा किया जाना चाहिए। देश की अनेक भाषाओं ने कभी भी राष्ट्र को विभाजित नहीं किया; बल्कि, उन्होंने एक साझा सभ्यतागत लोकाचार और एक समान धर्म को संरक्षित और मजबूत किया है।

उन्होंने, चेन्नई में पिछले दिनों आयोजित समारोह को याद करते हुए कहा, बड़ी संख्या में वहां ताड़ के पत्तों पर लिखी पांडुलिपियां देखीं, जो देश की विशाल और बहुभाषी ज्ञान परंपराओं की अमिट गवाही देती हैं। प्रत्येक भारतीय भाषा ने दर्शन, चिकित्सा, विज्ञान, शासन और आध्यात्मिकता में गहरा योगदान दिया है। समकालीन चुनौतियों पर उन्होंने चेतावनी दी कि विश्व भर में कई स्वदेशी भाषाएं लुप्तप्राय हैं।

उन्होंने कहा कि भाषा सम्मेलन अनुसंधान को मजबूत करने, अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा देने और प्राचीन लिपियों और पांडुलिपियों, विशेष रूप से लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सम्मेलन वैश्विक हिंदी परिवार, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग द्वारा आयोजित किया गया था।

अब सांसद अपनी मातृभाषा में बोल रहे हैं

उपराष्ट्रपति ने, राज्यसभा अध्यक्ष के रूप में संसद के अपने पहले सत्र के अनुभव को साझा करते हुए कहा, अब अधिकतर सांसद अपनी-अपनी मातृभाषा में बोल रहे हैं। भारत के संविधान का संथाली भाषा में अनुवाद हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा जारी किया गया, जिसे उन्होंने भाषाई समावेशन और सभी भाषा समुदायों के लिए लोकतांत्रिक सम्मान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

राष्ट्रीय एकता एकरूपता पर नहीं, आपसी सम्मान पर टिकी है

उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रीय एकता एकरूपता पर नहीं, बल्कि आपसी सम्मान पर टिकी है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब प्रत्येक नागरिक अपनी भाषा में खुद को व्यक्त कर सके। भारत का संविधान और इसकी आठवीं अनुसूची भाषाई विविधता को मान्यता देकर और उसका सम्मान करके देश के प्राचीन ज्ञान को दर्शाती है।

भाषा संरक्षण मे प्रौद्योगिकी सहयोगी

उपराष्ट्रपति ने भाषा संरक्षण में प्रौद्योगिकी को सहयोगी बनाने का आह्वान किया। उन्होंने डिजिटल अभिलेखागार, एआई-आधारित अनुवाद उपकरणों और बहुभाषी प्लेटफार्मों के उपयोग की वकालत की, ताकि भारतीय भाषाएं वर्तमान में फले-फूले और भविष्य को आकार दें।

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