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जयशंकर ने पाकिस्तान को बताया 'बुरा पड़ोसी', कहा- आतंकवाद से अपने नागरिकों को बचाने का हमें अधिकार

पाकिस्तान का नाम लिये बैगर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि आपके पास बुरे पड़ोसी भी हो सकते हैं। दुर्भाग्य से, हमारे पास हैं।

चेन्नई: भारतीय विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं। एक बार फिर से उन्होंने पाकिस्तान को आईना दिखाया और उसे बुरा पड़ोसी कहा है। इतना नहीं, जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत को आतंकवाद से अपने लोगों की रक्षा करना का अधिकार और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की जाएगी।

जयशंकर ने बिना पाकिस्तान का नाम लिये उसे संभलने की चेतावनी दी। दरअसल आज चेन्नई में वह आईआईटी के छात्रों से बात कर रहे थे जहां उन्होंने भारत के पश्चिम में बुरे पड़ोसी शब्द का जिक्र किया।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शुक्रवार को कहा कि भारत के इरादों को गलत तरीके से समझने की स्थिति से बचने के लिए अन्य देशों के साथ प्रभावी संवाद बेहद महत्वपूर्ण है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास में छात्रों के साथ एक संवाद कार्यक्रम में भाग लेते हुए जयशंकर ने कहा, “लोगों को आपको गलत समझने से रोकने का तरीका संवाद है। यदि आप अच्छी तरह, स्पष्ट और ईमानदारी से संवाद करते हैं तो अन्य देश और लोग उसका सम्मान करते हैं और उसे स्वीकार करते हैं।” ’

दुर्भाग्य से हमारे पास बुरे पड़ोसी

पाकिस्तान का नाम लिये बैगर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, "आपके पास बुरे पड़ोसी भी हो सकते हैं। दुर्भाग्य से, हमारे पास हैं। जब आपके पास बुरे पड़ोसी होते हैं, यदि आप पश्चिम की ओर देखते हैं, और पाते हैं कि अगर कोई देश जानबूझकर, लगातार और बिना पछतावे के आतंकवाद जारी रख रहा है, तो हमें आतंकवाद के खिलाफ अपने लोगों की रक्षा करने का अधिकार है। हम उस अधिकार का प्रयोग करेंगे।"

पश्चिम के साथ साझेदारी भी महत्वपूर्ण

जयशंकर ने कहा, “बहुत कम प्राचीन सभ्यताएं हैं जो आज प्रमुख आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के रूप में अस्तित्व में हैं और भारत उनमें से एक है। हमारे पास अपने अतीत की ऐसी समझ है जो बहुत कम देशों के पास है... यह लोकतांत्रिक राजनीतिक मॉडल को अपनाने का हमारा निर्णय ही था, जिसने लोकतंत्र के विचार को एक सार्वभौमिक राजनीतिक अवधारणा बना दिया।” उन्होंने कहा, “यदि हमने यह रास्ता नहीं चुना होता तो लोकतांत्रिक आदर्श क्षेत्रीय और संकीर्ण ही रह जाता।... पश्चिम के साथ साझेदारी भी महत्वपूर्ण है और इसी तरह हम दुनिया को आकार देते हैं।”

वसुधैव कुटुंबकम का आशय

जयशंकर ने कहा कि देशों ने घरेलू स्तर पर विकास करने और उसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ाव के माध्यम से प्रगति की है तथा अंतरराष्ट्रीय परिवेश का इस तरह उपयोग किया है जिससे उन्हें लाभ भी मिला और उनका योगदान भी रहा। उन्होंने कहा, “जब हम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ कहते हैं, तो इसका आशय यह है कि हमने कभी भी दुनिया को शत्रुतापूर्ण या ऐसे प्रतिकूल स्थान के रूप में नहीं देखा, जिससे हमें केवल रक्षात्मक रूप से स्वयं को बचाना पड़े।

हमारे संसाधन सीमित हैं। सीमित संसाधनों के साथ आप अधिकतम प्रभाव कैसे डाल सकते हैं? वास्तव में यही वह समस्या है जिसका समाधान करना आवश्यक है।” जयशंकर ने कहा, ‘‘आज भारतीय विदेश नीति और कूटनीति में हम इसी समस्या का समाधान करने का प्रयास करते हैं। हम अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता और ताकत का उपयोग करते हुए और अन्य संस्थानों व संभावनाओं का लाभ उठाते हुए ऐसा करने की कोशिश करते हैं।’’

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