‘मणिहारों का रास्ता’ में गुलाल गोटा बना रहे कारीगर -
राजस्थान

जयुपर के ‘गुलाल गोटा’ की देश-विदेश में धूम, बढ़ी बिक्री

‘गुलाल गोटे’ की मांग अब ना केवल भारत बल्कि दुनियाभर में बढ़ी

जयपुर : जयपुर की पूर्व रियासत में होली की राजसी परंपरा के प्रतीक रहे लाख निर्मित ‘गुलाल गोटे’ की मांग अब ना केवल भारत बल्कि दुनियाभर में बढ़ गई है। इन दिनों गुलाल गोटों की खूब बिक्री हो रही है। पर्यावरण के अनुकूल और त्वचा के लिए सुरक्षित माने जाने के कारण इसे लोग खरीद रहे हैं।

‘गुलाल गोटा’ लाख से बना गेंद जैसा पतला और हल्का गोला होता है। ऐसे हर गोले में खुशबूदार और अलग-अलग रंग का करीब 30 से 40 ग्राम गुलाल भरा जाता है और फिर उसे सावधानी से बंद किया जाता है।

जब इस गोले (गुलाल गोटा) को किसी पर फेंका जाता है, तो यह टकराते ही टूट जाता है और वह व्यक्ति बगैर चोट लगे गुलाल से रंग जाता है। गुलाल गोटे का एक पैकेट 300 रुपये में मिलता है जिसमें छह गोले होते हैं।

‘गुलाल’ सीधे चेहरे पर मल दिया जाता है या हाथ से फेंका जाता है, इसके विपरीत ‘गुलाल गोटा’ को व्यक्ति पर प्यार से फेंका जाता है। टकराने पर गुलाल गोटा का लाख से बना नाजुक आवरण टूट जाता है और अचानक रंगों की धारा फूट पड़ती है, जिससे एक अधिक उल्लासपूर्ण प्रभाव पैदा होता है।

लाख प्राकृतिक तौर पर पाया जाने वाला रेसिन (राल) युक्त पदार्थ है जो मादा लाख कीट (केर्रिया लाक्का) द्वारा स्रावित होता है। यह कीट पलाश, बेर और कुसुम जैसे विशिष्ट वृक्षों पर परजीवी के रूप में आश्रित रहता है।

जयपुर में ‘मणिहारों का रास्ता’ नामक गली में 10 से 15 परिवार गुलाल गोटा बनाने का काम कर रहे हैं। गुलाल गोटा बनाने वाले कारीगरों ने बताया कि लोग अब रसायनयुक्त रंगों से परहेज कर रहे हैं और यही वजह है कि गुलाल गोटा को पसंद किया जा रहा है।

‘मणिहारों का रास्ता’ में गुलाल गोटा बनाने के कारीगर मोहम्मद अमजद ने बताया कि गुलाल गोटों से होली खेलने की परंपरा लगभग 300 साल पुरानी मानी जाती है। लाख से बनाए गए इन गुलाल गोटों में आरारोट की प्राकृतिक गुलाल डाली जाती है, जिससे त्वचा को नुकसान नहीं पहुंचता है।

अमजद ने बताया कि इस बार बाजार में फूलों से भरे गुलाल गोटों की भी मांग है जिनमें गुलाब, चमेली, मोगरे की पत्तियां भरी जाती हैं। जब यह गुलाल गोटा किसी पर मारते हैं तो उस पर फूलों की ‘बारिश’ होने जैसा आनंददायक प्रभाव उत्पन्न होता है।

उन्होंने बताया कि गुलाल गोटा की बिक्री सिर्फ होली तक ही सीमित नहीं है, बल्कि शादी में हल्दी की रस्म के लिए इसकी मांग होने लगी है। अमजद ने बताया कि मंदिरों में होने वाले कार्यक्रमों में भी इसका उपयोग होने लगा है। उन्होंने बताया कि जयपुर के अलावा दूसरे राज्यों के लोग भी गुलाल गोटा मंगवा रहे हैं खासतौर पर बेंगलूरु, हैदराबाद, सूरत, मुंबई, दिल्ली के लोग गुलाल गोटे का ऑर्डर दे रहे हैं।

उन्होंने कहा कि कई युवा उद्यमी बेहतर पैकेजिंग के साथ इन्हें ई-कॉमर्स मंच पर भी बेच रहे हैं।कारीगर अकरम खान और अंजुम ने बताया कि जयपुर के इस गुलाल गोटे की मांग राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों से भी मांग की जा रही है। उन्होंने कहा कि इसकी मांग मथुरा-वृंदावन से लेकर जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, लंदन, सिंगापुर और इंग्लैंड तक है।

उन्होंने बताया कि जयपुर घूमने आने वाले विदेशी पर्यटक अपने साथ गुलाल गोटा ले जा रहे हैं। अंजुम ने बताया कि स्वदेश लौटने के बाद पर्यटक खुद की पसंद के भारतीय गाइड के जरिये फिर से गुलाल गोटा अपने देश में मंगवा रहे हैं।

कारीगर रेहाना खान ने बताया कि गुलाल गोटा की मांग बढ़ने से इसे बनाने का काम दिन-रात चल रहा है। अंजुम ने कहा, ‘‘पहले एक परिवार त्योहार के लिए कम से कम 500 पैकेट तैयार करता था, लेकिन मांग में तेज वृद्धि के कारण अब हर परिवार 5,000 से 10,000 पैकेट तैयार कर रहा है।

इतिहासकार जितेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि यह कला सीधे तौर पर रियासत काल से जुड़ी है जब होली पर सवाई जयसिंह द्वितीय हाथी पर सवार होकर होली खेलने निकलते थे।

उन्होंने कहा कि राजा हाथी पर से गुलाल से भरे गोटे (गुलाल गोटा) प्रजा पर फेंका करते थे। इस तरह वह पूरे नगर के साथ रंगों की होली खेलते थे। धीरे-धीरे यह परंपरा आम लोगों तक पहुंची और आज जयपुर के बाजारों में होली से महीनों पहले ही इनकी मांग बढ़ जाती है।

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