चीन-उत्तर कोरिया संबंधों को नई मजबूती देने की कोशिश, आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर होगी अहम बातचीत 
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7 साल बाद शी जिनपिंग का उत्तर कोरिया दौरा, किम जोंग उन से मुलाकात पर दुनिया की नजर

बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच चीन-उत्तर कोरिया संबंधों को नई मजबूती देने की कोशिश, आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर होगी अहम बातचीत

वैश्विक राजनीति के तेजी से बदलते परिदृश्य के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद उत्तर कोरिया की यात्रा पर जा रहे हैं। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब रूस, अमेरिका और चीन के बीच नई रणनीतिक धुरी बन रही है और उत्तर कोरिया अपनी भूमिका को संतुलित करने की कोशिश में जुटा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यह सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि एशिया की भू-राजनीति में बड़ा संकेत है। प्योंगयांग में शी जिनपिंग और किम जोंग उन की मुलाकात को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी उत्सुकता बनी हुई है।

रूस के बढ़ते प्रभाव के बीच चीन की वापसी की कोशिश

हाल के वर्षों में उत्तर कोरिया और रूस के बीच रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस को सैन्य समर्थन देने के आरोपों के बीच दोनों देशों की नजदीकियां बढ़ी हैं। हालांकि, आर्थिक जरूरतों को देखते हुए किम जोंग उन एक बार फिर चीन की ओर रुख कर रहे हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि यह दौरा चीन के लिए भी बेहद अहम है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि उसका पारंपरिक सहयोगी पूरी तरह रूस के प्रभाव में चला जाए।

आर्थिक सहयोग बनेगा बातचीत का केंद्र

इस मुलाकात में आर्थिक सहयोग प्रमुख मुद्दा रहने की संभावना है। उत्तर कोरिया की कमजोर अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए चीन की मदद बेहद जरूरी मानी जा रही है।

संभावना जताई जा रही है कि दोनों देश पर्यटन, सीमा व्यापार और बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर चर्चा कर सकते हैं। यालू नदी पर बने अधूरे पुल और सीमावर्ती क्षेत्रों में संयुक्त विकास परियोजनाएं भी एजेंडे में शामिल हो सकती हैं।

अमेरिका के साथ समीकरण पर भी नजर

यह दौरा अमेरिका के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। किम जोंग उन पहले अमेरिका के साथ बातचीत की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन परमाणु मुद्दे पर सहमति न बनने के कारण वार्ता रुक गई थी।

विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के साथ मजबूत संबंध उत्तर कोरिया को भविष्य में अमेरिका के साथ बातचीत में बेहतर स्थिति दे सकते हैं।

न्यूक्लियर नीति पर बदलता चीन का रुख?

हाल के घटनाक्रमों से संकेत मिल रहे हैं कि चीन का उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर रुख पहले जैसा सख्त नहीं रहा। अगर इस दौरे के बाद जारी बयान में ‘डीन्यूक्लियराइजेशन’ का जिक्र नहीं होता है, तो इसे एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जाएगा।

रणनीतिक संदेश देने की तैयारी

शी जिनपिंग का यह दौरा 2026 की उनकी पहली विदेश यात्रा भी है, जो इस बात का संकेत देता है कि चीन कोरियाई प्रायद्वीप में अपनी रणनीतिक मौजूदगी को और मजबूत करना चाहता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह यात्रा दुनिया को साफ संदेश देगी कि एशिया की सुरक्षा और राजनीति में चीन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कुल मिलाकर कहा जाए, तो शी जिनपिंग का उत्तर कोरिया दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, आर्थिक सहयोग और भविष्य की रणनीतिक दिशा को प्रभावित करने वाला कदम साबित हो सकता है।

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