वंदे मातरम्’ सर्कुलर पर मद्रास हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को दी नई याचिका दाखिल करने की अनुमति 
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तमिलनाडु में वंदे मातरम विवाद, नई याचिका दाखिल करने की अनुमति

मद्रास हाईकोर्ट ने गृह मंत्रालय के सर्कुलर पर सीधे संवैधानिक चुनौती का रास्ता खोला, याचिकाकर्ता को नई याचिका दाखिल कर ‘तमिल थाई वाज़्तु’ बनाम ‘वंदे मातरम्’ विवाद को व्यापक कानूनी रूप से उठाने की अनुमति

चेन्नई से जुड़े एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मामले में मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) ने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा जारी सर्कुलर को लेकर दायर याचिका पर अहम टिप्पणी करते हुए याचिकाकर्ता को नई याचिका दाखिल करने की अनुमति दे दी है। यह मामला सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ से करने के निर्देश से जुड़ा हुआ है।

सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ से करने को चुनौती

यह विवाद चेन्नई निवासी अनन्या राधाकृष्णन की याचिका से जुड़ा है। याचिका में केंद्र सरकार के उस सर्कुलर को चुनौती देने की कोशिश की गई थी, जिसमें सभी सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ के गायन से करने की बात कही गई थी।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि तमिलनाडु में पारंपरिक रूप से सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत ‘तमिल थाई वाज़्तु’ से होती रही है, जबकि समापन राष्ट्रगान से किया जाता है।

‘तमिल थाई वाज़्तु’ बनाम ‘वंदे मातरम्’ पर बहस

याचिका में यह भी कहा गया कि ‘तमिल थाई वाज़्तु’, जिसे 1891 में तमिल कवि मनोन्मनीयम सुंदरनार ने लिखा था, राज्य की सांस्कृतिक पहचान और परंपरा का प्रतीक है।

याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध ‘वंदे मातरम्’ या राष्ट्रगान के प्रति नहीं है, बल्कि केवल राज्य की स्थापित सांस्कृतिक परंपरा को बनाए रखने की मांग है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी: सीधे चुनौती जरूरी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति की खंडपीठ ने कहा कि गृह मंत्रालय का सर्कुलर केवल किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में लागू होता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक उस सर्कुलर की वैधता को सीधे चुनौती नहीं दी जाती, तब तक इस तरह की याचिका पर कोई विशेष निर्देश जारी करना उचित नहीं होगा।

याचिका वापस, नई कानूनी लड़ाई की तैयारी

अदालत की टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने मौजूदा याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी ताकि केंद्र सरकार के सर्कुलर को सीधे चुनौती देते हुए नई याचिका दाखिल की जा सके।

मद्रास हाईकोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी और नए सिरे से कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की छूट प्रदान कर दी।

यह मामला अब केवल एक सांस्कृतिक परंपरा बनाम राष्ट्रीय निर्देश का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह संघीय ढांचे, राज्य की सांस्कृतिक पहचान और केंद्र सरकार की नीतियों के बीच संतुलन से जुड़ा अहम कानूनी प्रश्न बन गया है।

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