वॉशिंगटन : अमेरिका में एच-1बी वीजा पर 1,00,000 अमेरिकी डॉलर शुल्क लगाने के ट्रंप प्रशासन के फैसले को बड़ा झटका लगा है। बोस्टन स्थित फर्स्ट सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने निचली अदालत के उस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें इस शुल्क को अवैध करार दिया गया था।
अमेरिकी सरकार ने जिला न्यायाधीश लियो टी. सोरोकिन के 8 जून के फैसले के खिलाफ अपील की थी। सोरोकिन ने कहा था कि कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी के बिना कार्यपालिका इस तरह का वित्तीय बोझ नहीं डाल सकती। अपीलीय अदालत ने भी माना कि ट्रंप प्रशासन यह साबित करने में विफल रहा कि कांग्रेस ने उसे इतना बड़ा शुल्क लगाने का स्पष्ट अधिकार दिया था।
एच-1बी एक गैर-आप्रवासी वीजा है, जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां विशेष तकनीकी या सैद्धांतिक विशेषज्ञता रखने वाले विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करती हैं। अमेरिकी तकनीकी कंपनियां भारत और चीन जैसे देशों के कुशल पेशेवरों के लिए इस वीजा पर काफी निर्भर रहती हैं।
अमेरिका हर साल 65,000 सामान्य एच-1बी वीजा और उच्च शैक्षणिक योग्यता वाले पेशेवरों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा जारी करता है। आम तौर पर आवेदन शुल्क 2,000 से 5,000 अमेरिकी डॉलर के बीच होता है।
इस बीच, रिपब्लिकन सीनेटर टिम शीही ने एक विधेयक पेश किया है, जिसमें नए एच-1बी वीजा जारी करने पर तीन साल की रोक लगाने और उसके बाद कार्यक्रम को कड़े नियमों के साथ फिर शुरू करने का प्रस्ताव है। विधेयक में 1,00,000 अमेरिकी डॉलर के शुल्क को कानून का हिस्सा बनाने की भी बात कही गई है। समर्थकों का तर्क है कि एच-1बी कार्यक्रम का इस्तेमाल अमेरिकी कामगारों की जगह कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए नहीं होना चाहिए।