नई दिल्ली : दवाओं के समान या मिलते-जुलते ब्रांड नामों से होने वाली गलतियों को रोकने और मरीजों की सुरक्षा मजबूत करने के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने ‘वन ब्रांड–वन फॉर्मूलेशन’ नीति का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत एक ब्रांड नाम को केवल एक स्वीकृत दवा फॉर्मूलेशन से जोड़ा जाएगा।
CDSCO ने 6 जुलाई 2026 को मसौदा अधिसूचना जारी कर इस पर सार्वजनिक सुझाव मांगे हैं। प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसी स्थिति को रोकना है, जिसमें एक ही ब्रांड नाम से अलग-अलग सक्रिय घटकों वाली दवाएं बाजार में बेची जाती हैं। इससे डॉक्टरों द्वारा दवा लिखने, फार्मासिस्ट द्वारा दवा देने और मरीजों द्वारा सही दवा लेने में भ्रम पैदा हो सकता है।
हालांकि, यह समस्या नई नहीं है। 2012 में सरकार को सौंपी गई 59वीं संसदीय समिति की रिपोर्ट में भी एक ही ब्रांड नाम के तहत अलग-अलग दवाओं की बिक्री से जुड़े जोखिमों पर चिंता जताई गई थी।
CDSCO के अनुसार, ऐसे ब्रांड नाम मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों को यह गलत धारणा दे सकते हैं कि एक ही नाम वाली दवाओं में समान सक्रिय घटक मौजूद हैं। उदाहरण के तौर पर ‘AZ’ नाम अलग-अलग निर्माताओं द्वारा सेटिरिजिन, एल्बेंडाजोल और एजीथ्रोमाइसिन जैसी अलग-अलग दवाओं के लिए इस्तेमाल किया गया है।
इसी तरह ‘Linamac’ नाम मधुमेह की दवा के लिए, जबकि ‘Linamac 5’ कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवा के लिए सामने आया। ऐसे मामलों में गलत दवा दिए जाने, उपचार विफल होने और प्रतिकूल दवा प्रतिक्रिया का जोखिम बढ़ सकता है।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत दवा कंपनियों को अपने स्वीकृत ब्रांड नाम और संबंधित फॉर्मूलेशन की जानकारी सुगम पोर्टल पर दर्ज करनी होगी। किसी नए ब्रांड नाम को मंजूरी देने से पहले राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण राष्ट्रीय डेटाबेस में उसकी जांच करेंगे।
यह डेटाबेस सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने का भी प्रस्ताव है, ताकि डॉक्टर, फार्मासिस्ट और मरीज किसी ब्रांड नाम से जुड़ी दवा के फॉर्मूलेशन की पुष्टि कर सकें।
पहले से मौजूद समान ब्रांड नामों के मामले में, ड्रग्स रूल्स, 1945 के तहत सबसे पहले वैध रूप से पंजीकृत नाम को प्राथमिकता दी जाएगी। बाद में उसी या भ्रम पैदा करने वाले नाम का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को अपना ब्रांड बदलना या उत्पाद बंद करना पड़ सकता है।
दवा उद्योग में एक अन्य प्रचलन ‘मिरर ब्रांड’ का है, जिसमें एक ही सक्रिय घटक वाली दवा को एक ही कंपनी कई अलग-अलग ब्रांड नामों से बेचती है। इससे दवाओं की पहचान और कीमतों को लेकर पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है और डॉक्टरों के लिए तर्कसंगत दवा लिखना कठिन हो सकता है।
मौजूदा प्रस्ताव का मुख्य फोकस अलग-अलग दवाओं के लिए एक ही ब्रांड नाम के इस्तेमाल पर है, लेकिन भविष्य में मिरर ब्रांड जैसी प्रथाओं की भी नियामकीय समीक्षा की संभावना बन सकती है।
यह प्रस्ताव CDSCO की पिछली कार्रवाइयों की कड़ी में आया है। 2024-25 के दौरान नियामक ने 35 अस्वीकृत कफ और कोल्ड फिक्स्ड-डोज कॉम्बिनेशन दवाओं को वापस लिया था। इनमें कुछ ऐसे उत्पाद भी शामिल थे, जो पहले से लोकप्रिय ब्रांड नामों के तहत बेचे जा रहे थे, जबकि उनके फॉर्मूलेशन में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए थे।
नई व्यवस्था लागू होने पर दवा कंपनियों को अपने मौजूदा ब्रांड पोर्टफोलियो की समीक्षा करनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि नए ब्रांड नाम किसी मौजूदा दवा से भ्रम पैदा न करें।
CDSCO का मानना है कि ‘वन ब्रांड–वन फॉर्मूलेशन’ से दवा के नाम को लेकर भ्रम कम होगा, गलत दवा दिए जाने की घटनाओं पर अंकुश लगेगा और दवा बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी। हालांकि, इसकी सफलता डेटाबेस को लगातार अपडेट करने और CDSCO तथा राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरणों द्वारा नियमों के प्रभावी अनुपालन पर निर्भर करेगी।
दवा के ब्रांड नाम से अधिक महत्वपूर्ण उसका जेनेरिक नाम, सक्रिय घटक और उसकी मात्रा है। ऐसे में प्रस्तावित सुधार मरीजों की सुरक्षा और भारत की दवा नियामकीय व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।