सड़क सुरक्षा को नई मजबूती देने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। अब वाहनों में इस्तेमाल होने वाले ऑटोमोटिव रडार के लिए अलग से लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होगी। इस फैसले से उन आधुनिक सुरक्षा तकनीकों का रास्ता आसान हो जाएगा, जो दुर्घटना होने से पहले ही खतरे का अंदाजा लगाकर ड्राइवर को सतर्क करती हैं या वाहन को खुद नियंत्रित कर लेती हैं। माना जा रहा है कि इससे भविष्य में किफायती कारों और दोपहिया वाहनों में भी उन्नत सेफ्टी फीचर्स देखने को मिलेंगे।
दूरसंचार विभाग (DoT) ने 11 जून 2026 को जारी अधिसूचना में वाहनों में उपयोग होने वाले विशेष रडार उपकरणों को लाइसेंस व्यवस्था से बाहर कर दिया है। पहले इन उपकरणों को वायरलेस संचार उपकरणों की श्रेणी में रखा जाता था, जिसके कारण इनके उपयोग और बिक्री पर नियामकीय प्रक्रियाएं लागू होती थीं।
नए नियम के बाद कार, बस, ट्रक, मोटरसाइकिल, स्कूटर और यहां तक कि रेल परिवहन में इस्तेमाल होने वाले ऐसे रडार उपकरणों को लगाने, रखने और बेचने के लिए अलग लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होगी।
वाहनों में लगा यह रडार लगातार आसपास की गतिविधियों पर नजर रखता है। यह आगे चल रहे वाहन, सड़क पर मौजूद बाधाओं और आसपास के ट्रैफिक की दूरी व गति का विश्लेषण करता है।
इसी तकनीक की मदद से कई आधुनिक फीचर काम करते हैं, जैसे...
टक्कर की आशंका होने पर चेतावनी देना
ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग
ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग
अडैप्टिव क्रूज कंट्रोल
लेन सुरक्षा से जुड़े सिस्टम
इन सुविधाओं के कारण चालक को अतिरिक्त सहायता मिलती है और दुर्घटनाओं की संभावना कम होती है।
अब तक लाइसेंस संबंधी प्रक्रियाओं के कारण ऑटोमोबाइल कंपनियों के लिए इन तकनीकों को भारतीय बाजार में लाना अपेक्षाकृत जटिल और महंगा था। नतीजतन ये सुविधाएं मुख्य रूप से प्रीमियम और लग्जरी वाहनों तक सीमित थीं।
सरकार का मानना है कि लाइसेंस व्यवस्था समाप्त होने से कंपनियों को तकनीक अपनाने में आसानी होगी, उत्पादन लागत घटेगी और सड़क सुरक्षा से जुड़े उन्नत फीचर तेजी से आम वाहनों तक पहुंच सकेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद एडवांस ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ेगा। आने वाले वर्षों में कम कीमत वाली कारों में भी ऐसे फीचर देखने को मिल सकते हैं, जो अभी केवल महंगे मॉडलों में उपलब्ध हैं।
इससे न केवल ड्राइविंग अनुभव बेहतर होगा, बल्कि सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि सरकार ने लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म की है, लेकिन तकनीकी मानकों को लेकर कुछ नियम बनाए रखे हैं। रडार उपकरणों को निर्धारित फ्रीक्वेंसी और शक्ति सीमा के भीतर ही संचालित करना होगा।
यदि किसी उपकरण से अन्य वायरलेस सेवाओं में हस्तक्षेप होता है, तो सरकार उसके संचालन पर रोक लगाने, पावर कम करने या उसे हटाने का निर्देश दे सकती है। इसके अलावा निर्माताओं को अपने उपकरणों के लिए निर्धारित सरकारी पोर्टल पर आवश्यक स्वीकृतियां प्राप्त करनी होंगी।
विशेषज्ञ इस निर्णय को भारत में स्मार्ट और सुरक्षित परिवहन व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मान रहे हैं। इससे न केवल वाहन उद्योग को नई तकनीक अपनाने में मदद मिलेगी, बल्कि भविष्य में सड़क हादसों को कम करने के लक्ष्य को भी बल मिलेगा।