पटना : राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने मंगलवार को घोषणा की कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन की प्रक्रिया को कथित रूप से बाधित करने को लेकर विपक्षी दलों के खिलाफ राज्य के सभी जिला मुख्यालयों पर विरोध मार्च निकालेगी।
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 17 अप्रैल को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण पारित नहीं हो सका। इस विधेयक में 2011 की जनगणना के आधार पर नए परिसीमन का प्रावधान था और इसका पारित होना नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक माना जा रहा था।
कुशवाहा ने कहा, विपक्षी दलों ने बिहार की जनता के साथ बड़ा अन्याय किया है। बुधवार को हमारी पार्टी राज्य के सभी जिला मुख्यालयों पर विपक्ष के कृत्यों के खिलाफ ‘धिक्कार मार्च’ निकालेगी।
उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी लंबे समय से विधानमंडलों में महिलाओं की भागीदारी और परिसीमन दोनों की पक्षधर रही है, लेकिन जब उनकी मांगें पूरी होने वाली थीं, तब विपक्ष ने बाधा खड़ी कर दी।
कुशवाहा ने कहा, नरेन्द्र मोदी सरकार आधी आबादी को उनका अधिकार देने जा रही थी, लेकिन विपक्षी दलों ने अधिनियम के क्रियान्वयन में रुकावट डाल दी।
RLM अध्यक्ष ने दावा किया कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम में राज्य और केंद्र की विधानसभाओं में महिलाओं, विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान था।
उन्होंने कहा, विपक्ष की मांग के अनुसार अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान इसमें नहीं था, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री ने संसद में आश्वासन दिया था कि भविष्य में अन्य पिछड़ा वर्ग महिलाओं को भी आरक्षण व्यवस्था में शामिल किया जाएगा। हमारा मानना है कि विधेयक पारित होना चाहिए था।
कुशवाहा ने कहा कि इस समय अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण संभव नहीं है, क्योंकि जातीय जनगणना की प्रक्रिया अभी जारी है। उन्होंने नए परिसीमन और विधानमंडलों में सीटों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा, पिछले 50 वर्षों में लोकसभा सीटों की संख्या नहीं बढ़ी है, क्योंकि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने संवैधानिक संशोधन के जरिए इस पर रोक लगा दी थी। हमारी पार्टी लगातार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग करती रही है।
RLM प्रमुख ने कहा कि यदि राष्ट्रीय स्तर पर सीटों की संख्या बढ़ती, तो बिहार में लोकसभा सीटों की संख्या 40 से बढ़कर 60 हो सकती थी।