

ऋतुचक्र की सुई फिर से उस मुकाम पर है जिसे कभी हम 'ऋतुराज' कहते थे। कैलेंडर की तारीखें गवाही दे रही हैं कि वसंत पंचमी दस्तक दे रही है लेकिन खिड़की के बाहर पसरी कंक्रीट की उन ऊँची दीवारों और धूल भरे आसमान को देख मन ठिठक जाता है। क्या वाकई वसंत आया है? या बसंत ने अब हमारे शहरों और संवेदनाओं की बंजर जमीं पर उतरना ही छोड़ दिया है?
स्मृतियों के कोहरे में खोती वो पीली छुवन
वो भी क्या दिन थे, जब वसंत आने की सूचना अखबार या मोबाइल नोटिफिकेशन नहीं देते थे। वसंत की खबर तो उन हवाओं से मिलती थी, जो माघ की ठिठुरन को आहिस्ते से विदा कर, धूप में एक अनजानी मिठास घोल देती थीं। उन दिनों सरसों के खेतों का 'पीलापन' केवल एक रंग नहीं, बल्कि प्रकृति का अट्टहास था। धरती जैसे खुशी में पीली चुनर ओढ़कर नाच उठती थी।
आज की नई पीढ़ी के लिए 'पीला' महज एक 'कलर कोड' है, जिसे वे किसी मॉल के ब्रांडेड कपड़ों में ढूंढते हैं। उन्हें क्या पता कि उस पीलेपन की तासीर क्या होती है? उन्होंने सरसों के फूलों पर मंडराती तितलियों के पंखों की थरथराहट नहीं सुनी, उन्होंने पलाश के उन दहकते फूलों को नहीं देखा जो दूर जंगलों में किसी साधु की जलती धूनी जैसे लगते थे। आज प्रकृति का सौंदर्य 'हाई-डेफिनिशन' स्क्रीन्स पर तो है लेकिन उस छुअन का क्या जो आत्मा को सहला जाती थी?
डिजिटल शोर में दबी कोयल की कूक
नई पीढ़ी 'स्मार्ट' तो हो गई पर 'संवेदनशील' होने का अवसर खो चुकी है। जो बच्चे 'नेचर साउंड' को इयरफोन पर सुनते हैं, उन्हें उस असली कोयल की कूक में छिपा विरह और आनंद कहाँ समझ आएगा? उनके लिए वसंत महज एक 'थीम' है, इंस्टाग्राम की रील बनाने के लिए एक सुंदर बैकग्राउंड। संवेदनाओं के इस मरुस्थल में, प्रकृति के साथ जो हमारा आदिम रिश्ता था, वह अब पूरी तरह से टूट चुका है।
हमने विकास के नाम पर उन गलियों को मार दिया जहाँ से वसंती हवा गुजरती थी। हमने उन बागों को सीमेंट के कब्रिस्तानों में बदल दिया जहाँ फागुन का जादू चलता था। अब वसंत आता है, तो केवल एक रस्म बनकर। सरस्वती पूजा के पंडालों में बजते लाउडस्पीकर के शोर में हम उस मौन संगीत को भूल चुके हैं, जो प्रकृति हर साल हमारे कानों में फूँकती थी।
खो गया है सौंदर्यबोध, बाकी है बस प्रदर्शन
बसंत पंचमी का अर्थ था - साधना, सृजन और सौंदर्य का संगम। लेकिन आज 'सौंदर्य' केवल दिखावे की वस्तु बन गया है। जब मन की मिट्टी ही सूख गई हो तो उसमें अनुभूतियों के फूल कैसे खिलेंगे? नई पीढ़ी के पास सूचनाओं का अंबार है लेकिन उनके पास वो फुर्सत नहीं कि वे एक खिलते हुए फूल के पास दो पल बैठ सकें। उनके पास 'अनुभूति' के बजाय 'एल्गोरिदम' है।
प्रकृति में व्याप्त वह अलौकिक सौंदर्य, जो मन को भीतर तक भिगो देता था, अब खो गया है। वह पीलापन, जो कभी समृद्धि और संतोष का प्रतीक था, अब केवल विज्ञापनों तक सीमित है। हमने प्रकृति को 'उपभोग' की वस्तु मान लिया है, 'वंदना' की नहीं। और यही कारण है कि अब बसंत हमें छू नहीं पाता।
एक पुकार : क्या हम फिर से महसूस कर पाएंगे?
यह लेख केवल एक विलाप नहीं बल्कि एक चेतना का आह्वान है। बसंत पंचमी आने वाली है, पर क्या हम तैयार हैं उसे अपने भीतर उतारने के लिए? क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को किताबों से बाहर ले जाकर उस 'मिट्टी की सोंधी महक' और 'पीलेपन के अहसास' से मिलवाएंगे?
जरूरत है कि हम अपनी व्यस्तताओं से कुछ क्षण चुराएं। उस पुरानी यादों वाली सरसों की छुवन को फिर से तलाशें। अपने बच्चों का हाथ पकड़कर उन्हें बताएं कि बसंत किसी मॉल में नहीं, बल्कि उन झरते हुए पत्तों और खिलती हुई कलियों के संगीत में बसता है।
अगर हम आज भी न चेते तो यकीन मानिए, बसंत महज एक पौराणिक कथा बनकर रह जाएगा। ऋतुराज तो आएँगे, पर हमारे घर के दरवाजे और मन के झरोखे बंद मिलेंगे। इस बसंत, चलिए कोशिश करते हैं कि हम 'देखें' नहीं, बल्कि 'महसूस' करें, क्योंकि बसंत आँखों का नहीं, आत्मा का उत्सव है।
उमेश कुमार साहू