

गाँव के बाहर से होकर जाने वाला कच्चा रास्ता, जो प्राइमरी स्कूल और सरकारी ट्यूबवेल को जोड़ता था, हर सुबह बच्चों की चहल-पहल से जी उठता था। धूल उड़ती रहती, पाँव मिट्टी से सन जाते, लेकिन बच्चों के मन हल्के और बेफिक्र रहते। उसी रास्ते पर रोज़ एक छोटी-सी लड़की चलती थी-उसका असली नाम लाली था, पर पूरे गाँव में कोई उसे इस नाम से नहीं पुकारता था। सबके लिए वह बस गुड्डन थी।
“अरे गुड्डन! धीरे भागो, गिर जाओगी!” पीछे से बच्चे उसे आवाज़ देते।
गुड्डन हँसते हुए जवाब देती- “मुझे कुछ नहीं होगा! देखो, मैं तो चिड़िया की तरह उड़ रही हूँ।”
सच में वह चिड़िया जैसी ही थी। धूप में खेलना,पेड़ों पर चढ़ना, बरसात की बूँदों को हथेली पर पकड़ना, पेड़ों के नीचे बैठकर मिट्टी के घर बनाना, जैसे दुनिया उसके लिए सिर्फ एक खेल हो लेकिन उसकी दुनिया उतनी आसान भी नहीं थी। गुड्डन का गाँव तीन नदियों से घिरा था, बाढ़ आने पर उसके गाँव तक पानी आ जाता था, उस पल में वो अपनी माँ को याद कर बहुत रोती थी और गर्मी की छुट्टियों का इंतजार करती ।
गुड्डन अपने चाचा-चाची के घर रहती थी। उसके माँ और पापा शहर में रहते थे। उसके पापा शहर में नौकरी करते थे, उन्होंने उसे गाँव में क्यों छोड़ा था वह नहीं जानती थी। बस इतना जानती थी कि वह अपने माँ-पापा से दूर नहीं रह सकती थी।
चाची से उसे थोड़ा डर लगता था।
चाची अक्सर उसे टोक देतीं- “गुड्डन! हाथ धोए कि नहीं?”
“इतनी देर बाहर क्या कर रही थी?”
“घर के काम में हाथ नहीं बटाओगी नहीं क्या?”
गुड्डन चुपचाप सिर झुका देती-“हाँ चाची… अभी करती हूँ।”
उसकी आवाज़ बहुत धीमी होती-जैसे अपने ही शब्दों से डरती हो।
सुबह होते ही वह उठ जाती। आँखें मलते हुए बाहर आती, कुएँ का ठंडा पानी चेहरे पर डालती और फिर चूल्हे के पास बैठकर बर्तन माँजने लगती।
चूल्हे की राख उसे बड़ी अच्छी लगती थी।वह उसे हथेली में लेकर सूँघती, कभी-कभी वह उँगली से उसे छूकर चख भी लेती-जैसे मिट्टी में ही घर का स्वाद छिपा हो।
एक दिन उसने धीरे से पूछा- “चाची… माँ कब आएँगी?”
चाची ने जल्दी में जवाब दिया “जब उन्हें समय मिलेगा तब। अब काम करो।”
गुड्डन चुप हो गई।
स्कूल उसका दूसरा संसार था।
वह टाट पर बैठती-वह अपनी स्लेट पर दुद्धी और धागे की मदद से रेखा खींचती। उसकी लिखावट बहुत सुन्दर थी।
मास्टर साहब पूछते- “गुड्डन, पढ़ाई होती है या नहीं?”
वह हल्की मुस्कान के साथ कहती- “होती है मास्टर जी…”
कुछ बच्चे उसके साथ खेलते, कुछ उसे अनदेखा कर देते लेकिन उसे इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था। शहर में रहने की वजह से वह थोड़ी अलग थी ,उसके बोलचाल के ढंग में थोड़ा फर्क था।
एक दिन घर में खबर आई।
चाची बोलीं- “सुनो गुड्डन! हम लोग शहर जा रहे हैं। तुम भी चलोगी।”
गुड्डन की आँखें चमक उठीं।
“सच चाची? माँ से मिलूँगी?”
“हाँ, मिलोगी।”
उसका दिल ऐसे धड़कने लगा जैसे पिंजरे में बन्द चिड़िया अचानक उड़ने वाली हो।
शहर पहुँचते ही उसने अपनी माँ को देखा।
वह दौड़कर उनसे लिपट गई-“माँ!”
माँ ने उसे कसकर पकड़ लिया- “अरे मेरी बेटी… कितनी दुबली हो गई!”
गुड्डन उनकी गोद में मुँह छिपाकर बोली- “माँ… अब मैं यहीं रहूँगी न?”
माँ कुछ पल चुप रहीं।
फिर उसके बाल सहलाते हुए बोलीं “अभी पढ़ाई पूरी कर लो बेटा… फिर तुम्हें अपने साथ ले जाएँगे।”
“फिर…”
यह शब्द गुड्डन के मन में अटक गया।
उन कुछ दिनों में वह बहुत खुश रही।
माँ उसके बालों में तेल लगातीं। पापा उसे गोद में उठाते।सब साथ बैठकर खाना खाते।
रात को वह माँ के सीने से लगकर सोती और सोचती- “अब मैं कहीं नहीं जाऊँगी।”
लेकिन एक सुबह चाची ने कहा- “चलो, अब गाँव लौटना है।”
गुड्डन का मन बैठ गया।
उसने माँ का आँचल पकड़ लिया- “माँ… मैं यहीं रह जाऊँ?”
माँ की आँखें भर आईं।
उन्होंने बस इतना कहा- “अभी नहीं बेटी…”
स्टेशन पर ट्रेन देर से आने वाली थी।
भोर के चार बजे थे। ठंडी हवा चल रही थी।
गुड्डन प्लेटफॉर्म पर सिकुड़कर बैठी थी।
उसे भूख लग रही थी।
उसने धीरे से कहा- “चाची… भूख लगी है…”
चाची बोलीं- “अभी क्या खाओगी? ट्रेन आने दो।”
गुड्डन चुप हो गई।
उसने मन ही मन सोचा- “अगर माँ होतीं… तो जरूर कुछ खाने को दे देतीं…”
एक पल को उसके मन में आया- “भागकर माँ के पास चली जाऊँ…”
वह उठी भी।
दो कदम चली।
फिर पीछे मुड़ी-चाची वहीं बैठी थीं।
डर ने उसके कदम रोक दिए।
गाँव लौटकर सब पहले जैसा हो गया।
लेकिन गुड्डन अब पहले जैसी नहीं रही।
वह अब भी नदी जाती, खेलती, काम करती-लेकिन उसके भीतर कहीं एक खालीपन बस गया था।
रात को वह आँगन में लेटकर आसमान देखती।
धीरे से कहती- “माँ… मैं पढ़ रही हूँ… आप मुझे अपने पास ले जाएँगी न?”
परीक्षा का आखिरी दिन था।
स्कूल से लौटते समय वही कच्चा रास्ता था।
बाकी बच्चे आगे निकल गए थे।
गुड्डन धीरे-धीरे चल रही थी।
उसकी कॉपी के पहले पन्ने पर पेंसिल से लिखा था—
“माँ”
अचानक दूर सड़क पर एक जीप दिखाई दी।
उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
“शायद पापा…”
जीप पास आई… और बिना रुके निकल गई।
धूल का बादल उठकर फिर बैठ गया।
गुड्डन बहुत देर तक उसे देखती रही।
फिर उसने धीरे से कॉपी खोली।
“माँ” शब्द को उँगली से छुआ और धीरे से बोली- “माँ… मैं पास हो गई अब पापा मुझे शहर ले जाएंगे …”
उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।
कुछ देर बाद उसने आसमान की ओर देखा—
“माँ… अगर आप आ जातीं… तो मैं आज आपको अपनी गोद में बैठकर बता देती…
हवा धीरे से चली।
पेड़ की पत्तियाँ हिलने लगीं।
गुड्डन ने बहुत धीरे से कहा— काश इस पल आप मेरे पास होतीं , और मेरे लिए खीर बनातीं ।
यह कहकर वह धीरे-धीरे घर की ओर चल दी।
उस दिन उसे पहली बार समझ आया— कुछ बच्चे इसलिए बड़े नहीं होते कि समय बीत जाता है,
वे इसलिए बड़े हो जाते हैं क्योंकि उनका इन्तज़ार बहुत लम्बा हो जाता है।
और गुड्डन के मन में वही सवाल अब भी धीरे-धीरे धड़क रहा था— क्या माँ – पापा मुझे यहाँ से ले जाएंगे , या इस साल भी मुझे सबके बीच रहते हुए भी अकेला छोड़ देंगे ।
-रागिनी मिश्रा (अदिति)