

वहीं उसने पहली बार जाना कि लड़कियां सिर्फ घर संभालने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने सपनों के लिए भी जी सकती हैं। वह पढ़ाई में अच्छी थी और कॉलेज की बहसों में भी हिस्सा लेती थी,लेकिन पढ़ाई पूरी होते ही परिवार की प्राथमिकता बदल गई-अब राधिका की शादी करनी थी।
राधिका एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी लड़की थी, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। उसके पिता सेना में कैप्टन थे-अनुशासनप्रिय, कर्तव्यनिष्ठ और कम बोलने वाले। घर में एक भाई और दो बड़ी बहनें थीं। गांव का छोटा सा घर, मिट्टी की खुशबू और सीमित साधनों के बीच राधिका का बचपन बीता।गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए ही राधिका को किताबों से प्यार हो गया था। अक्सर वह अपनी कॉपी के आख़िरी पन्नों पर कुछ न कुछ लिखती रहती-कभी कविता, कभी कहानी। उसकी अध्यापिका कहती थीं, 'राधिका, तुम आगे चलकर बहुत अच्छा लिखोगी।' यह सुनकर उसके मन में एक छोटी-सी लौ जल उठती-कुछ बनने की, कुछ करने की।
करीब बीस साल पहले उसकी शादी एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में कर दी गई। श्वसुर किसान थे और सास एक शांत स्वभाव की गृहिणी। घर का माहौल बुरा नहीं था, लेकिन यहां राधिका के सपनों के लिए कोई जगह नहीं थी।
आगे की पढ़ाई के लिए उसे शहर के कॉलेज में भेजा गया। हॉस्टल का जीवन उसके लिए नया था-नए लोग, नए विचार, नई दुनिया। वहीं उसने पहली बार जाना कि लड़कियां सिर्फ घर संभालने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने सपनों के लिए भी जी सकती हैं। वह पढ़ाई में अच्छी थी और कॉलेज की बहसों में भी हिस्सा लेती थी।लेकिन पढ़ाई पूरी होते ही परिवार की प्राथमिकता बदल गई-अब राधिका की शादी करनी थी।करीब बीस साल पहले उसकी शादी एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में कर दी गई। श्वसुर किसान थे और सास एक शांत स्वभाव की गृहिणी। घर का माहौल बुरा नहीं था, लेकिन यहां राधिका के सपनों के लिए कोई जगह नहीं थी।
एक दिन उसकी बेटी ने उससे पूछा, 'मां, आप क्या बनना चाहती थीं?'यह सवाल सुनकर राधिका कुछ पल चुप रही। फिर धीमे से बोली, 'मैं लिखना चाहती थी… शायद एक लेखिका बनना।'बेटी ने सहजता से कहा, 'तो अब क्यों नहीं लिखती?'राधिका के लिए यह सवाल जैसे आईना था।
शादी के बाद उसका संसार रसोई, आंगन और परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित हो गया।उसका पति भी शुरू में बेरोजगार था। आठ साल बाद जाकर उसे पैरामिलिट्री में ऑफिसर की नौकरी मिली। परिवार खुश था कि अब घर की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी। राधिका भी खुश थी, लेकिन उसके भीतर कहीं एक खालीपन था-जैसे उसने अपने किसी हिस्से को धीरे-धीरे खो दिया हो। समय बीतता गया। दो बच्चे हुए-एक बेटा और एक बेटी। बच्चों की पढ़ाई, श्वसुर-सास की देखभाल और घर की जिम्मेदारियों के बीच राधिका का दिन कब शुरू होता और कब खत्म, उसे खुद पता नहीं चलता।लेकिन कभी-कभी रात को जब सब सो जाते, तब वह अपनी पुरानी डायरी निकालती। उसमें कुछ अधूरी कविताएं, कुछ पुराने सपने और कुछ दबे हुए सवाल लिखे होते।
एक दिन उसकी बेटी ने उससे पूछा, 'मां, आप क्या बनना चाहती थीं?'यह सवाल सुनकर राधिका कुछ पल चुप रही। फिर धीमे से बोली, 'मैं लिखना चाहती थी… शायद एक लेखिका बनना।'बेटी ने सहजता से कहा, 'तो अब क्यों नहीं लिखती?'राधिका के लिए यह सवाल जैसे आईना था। क्या सचमुच अब भी देर हो चुकी थी? या वह खुद ही मान बैठी थी कि उसका समय निकल गया है? उस रात उसने बहुत देर तक सोचा। उसे एहसास हुआ कि उसने हमेशा दूसरों के लिए जीया-पिता की उम्मीदों के लिए, पति के संघर्ष के लिए, बच्चों के भविष्य के लिए। लेकिन खुद के लिए उसने क्या किया?
अगले दिन उसने अपनी पुरानी डायरी फिर से खोली और एक नई कहानी लिखनी शुरू की-एक ऐसी स्त्री की कहानी, जो अपने सपनों को उम्र की कैद में नहीं रखती।
धीरे-धीरे उसकी कहानियां स्थानीय पत्रिकाओं में छपने लगीं। शुरुआत छोटी थी, लेकिन उसके लिए वह बहुत बड़ी थी। अब जब वह लिखती, तो उसे लगता जैसे वह खुद को फिर से पा रही है।राधिका ने तब समझा कि स्त्री का जीवन सिर्फ त्याग और जिम्मेदारियों की कहानी नहीं होना चाहिए। उसके अपने सपने, अपनी पहचान और अपनी आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।आज भी वह वही साधारण गृहिणी है-सुबह रसोई में काम करती है, बच्चों की चिंता करती है, परिवार की देखभाल करती है। लेकिन अब एक फर्क है।अब वह सिर्फ किसी की पत्नी, बहू या मां नहीं है।अब वह राधिका भी है-अपने सपनों के साथ, अपनी पहचान के साथ।
-सुनील कुमार महला