सुधर गया सोनू

बाल कहानी
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सुधर गया सोनूAi Generated Image
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कक्षा में वह पढ़ाई पर ध्यान नहीं देता था। जब अध्यापक पढ़ा रहे होते तो सोनू ऊंघता रहता।

सोनू स्वभाव से बहुत ही उद्दंड व जिद्दी किस्म का लड़का था। कक्षा में वह हरदम नई- नई शरारतें करता रहता। कभी किसी का लंच बाक्स निकालकर खाना खा जाता तो कभी किसी बच्चे की कापी या पेन चुरा लेता। हर छोटी-छोटी बात पर दूसरे बच्चों से लड़ाई करना उसका शौक था। कक्षा में वह पढ़ाई पर ध्यान नहीं देता था। जब अध्यापक पढ़ा रहे होते तो सोनू ऊंघता रहता। अध्यापक के कक्षा से बाहर जाते ही वह सो जाता। अध्यापकों की डांट का भी उस पर कोई असर नहीं होता था। बच्चे व अध्यापक सभी उसकी आदतों से परेशान थे।

एक दिन सभी छात्रों ने सोनू को सुधारने की एक योजना बनाई

एक दिन सभी छात्रों ने सोनू को सुधारने की एक योजना बनाई। उन्होंने इस योजना में अध्यापकों को भी शामिल कर लिया। अगले दिन सोनू जैसे ही कक्षा में से उठकर बाथरूम के लिए गया तो बच्चों ने जल्दी से उसके बैग से लंच निकाल कर छुपा दिया व खाली टिफिन उसके बस्ते में डाल दिया। जब लंच टाइम में सोनू ने खाना खाने के लिए लंच बॉक्स निकाला तो वह खाली निकला । यह देखकर सोनू हैरान रह गया। उसे बहुत गुस्सा आया। उसने सभी बच्चों से पूछा तो सभी का एक ही जवाब था, ‘हम तेरी तरह भूखे थोड़े ही हैं।‘

सोनू ने अध्यापक से शिकायत की तो उनका भी यही उत्तर था ‘कक्षा में कोई भी बच्चा ऐसा नहीं जो तुम्हारी तरह लंच की चोरी करे।‘ अगले दिन जब उसने कुछ लिखने के लिए बस्ता खोला तो पेन व कापी गायब थी। जो थोड़ा बहुत वह करता था, वह भी न कर पाया। अब वह किसी से शिकायत भी नहीं कर सकता था।

अब तो यह रोज की बात हो गई थी। कभी उसका लंच बॉक्स खाली होता, कभी कापी पेन गायब होते व कभी पानी की बोतल। वह बुरी तरह परेशान हो गया था। इस बीच उसने किसी बच्चे की कोई चीज भी न चुराई। शरारतें करना भी वह जैसे भूल गया था। बस सारा दिन गुमसुम बैठा रहता। वह अभी कुछ समझ ही नहीं पाया था कि एक दिन उसका पूरा बस्ता ही गायब हो गया। उसने इधर-उधर बहुत ढूंढ़ा मगर बस्ता नहीं मिला। अध्यापक जब कक्षा में आए तो सोनू ने कहा, ‘ सर, किसी ने मेरा बैग चुरा लिया है।‘

अध्यापक ने उत्तर दिया, ‘अभी तक तो तुम चोरी ही करते थे, अब दूसरों पर इल्जाम भी लगाने लगे।‘

‘मैं सच कह रहा हूं सर ! मेरा बस्ता मेरी सीट पर नहीं है।‘ वह रो पड़ा।

‘अब मालूम हुआ, अपनी वस्तु चोरी होने पर कितना दुख होता है। तुम तो इतने बच्चों की चीजें चुराते हों, उन्हें कैसा लगता होगा, कभी सोचा है?‘ सोनू कोई उत्तर न दे सका। अब उसे अपनी गलती का अहसास हो चुका था।

अध्यापक के चरणों में गिर पड़ा व बोला, ‘सर ! मुझे माफ कर दीजिए। अब मैं किसी को परेशान नहीं करूंगा।‘

अध्यापक उसे उठाते हुए बोले, ‘शाबास बेटा, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी।

बच्चों ने उसकी सब वस्तुएं, जो अध्यापक के पास रखी थी, लाकर उसे दे दी। सभी सोनू के हृदय परिवर्तन से खुश थे। (उर्वशी)भाषणा गुप्ता

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