बहती नदी …

कहानी : एक स्त्री की मार्मिक आत्मगाथा एक उड़ान बंद पिंजरे से खुले आकाश तक
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आठ साल के प्रपौत्र मोक्ष की ओर देखकर लीला ने दूर आकाश में उड़ते हुए पंछियों को देखते हुए मुस्कुरा कर कहा“ मोक्ष, आज तुझे मैं अपनी कहानी सुनाऊँगी।”

आँगन में नीम की छाँव धीरे-धीरे खिसक रही थी। सामने कच्ची दीवार पर टँगा तिरंगा हवा के साथ फड़फड़ा रहा था। उसके तीन रंग मुझे हमेशा तीन रास्तों जैसे लगते थे—त्याग का, शांति का और उम्मीद का।

मोक्ष मेरी चारपाई के पास बैठ गया।

“दादी, आजादी की कहानी ?”

“हाँ,” मैंने मुस्कराकर कहा, “लेकिन मेरी कहानी में अंग्रेज नहीं हैं।”

“तो फिर कौन हैं ?”

मैंने उसकी आँखों में देखा।

“बंधन हैं… और उन्हें तोड़ने का साहस भी।”

बचपन में मेरी दुनिया छोटी थी—घर का आँगन, तुलसी का चौरा, चूल्हे का धुआँ और आँगन के उस पार दिखती हुई पगडंडी। मगर उस छोटी-सी दुनिया में भी दीवारें बहुत थीं।

मेरे बालों की सफेदी में इस गाँव की धूल भी है और जीवन की धूप भी। मैंने इस मिट्टी पर नंगे पाँव चलना सीखा, इसी मिट्टी में गिरकर उठना सीखा और इसी मिट्टी ने मुझे यह समझाया कि जड़ें जमीन में हों तो भी आँखें आकाश में होनी चाहिए।

बचपन में मेरी दुनिया छोटी थी—घर का आँगन, तुलसी का चौरा, चूल्हे का धुआँ और आँगन के उस पार दिखती हुई पगडंडी।

मगर उस छोटी-सी दुनिया में भी दीवारें बहुत थीं।

“यह मत खाओ।”

“वह मत पहनो।”

“लड़कियाँ ऐसे नहीं बैठतीं।”

“लड़कियाँ लड़कों जैसा खाना नहीं खातीं।”

कपड़ों के रंग तक तय थे, खाने की मात्रा तक।

एक दिन मैंने भाई का कुरता पायजामा पहन लिया।

माँ ने देखते ही कहा—“उतारो इसे!” मैंने पूछा—“क्यों?” “क्योंकि तुम लड़की हो।”

मुझे वह बहुत अच्छा लगा था। आईने में खुद को देखकर लगा जैसे मैं भी उतनी ही आजाद हो गई हूँ जितना भाई।

माँ ने देखते ही कहा—“उतारो इसे!”

मैंने पूछा—“क्यों?”

“क्योंकि तुम लड़की हो।”

उस दिन पहली बार मेरे भीतर कोई छोटी-सी चिड़िया पंख फड़फड़ाकर उठी थी।

मैंने सोचा—क्या लड़की होने का अर्थ पंखों का रंग बदल जाना है?

समय बीता। अक्षरों से मेरी दोस्ती हो गई। किताब मेरे लिए ऐसी खिड़की थी, जिसके बाहर कोई पहरा नहीं था। उसके पन्ने पलटते ही मुझे लगता, जैसे मेरे मिट्टी के घर की दीवारों में अचानक एक रोशनदान खुल गया हो।

फिर वह दिन आया जब मुझे गाँव से बाहर पढ़ने जाना था।

घर में बहस छिड़ गई ।

“लड़की अकेली बाहर जाएगी?”

“लोग क्या कहेंगे?”

“गाँव की मर्यादा भी कोई चीज होती है।”

मेरी पढ़ाई जैसे अचानक गाँव की इज्जत से बड़ी समस्या बन गई थी।

मैंने पिता की ओर देखा।

“बाबा, अगर रास्ता गलत है तो रोकिए। लेकिन सिर्फ इसलिए मत रोकिए कि उस रास्ते पर लड़की चल रही है।”

वे चुप रहे।

मैंने कहा—“आपको मेरी चिंता है तो रास्ता तय कर दीजिए, आने-जाने का इंतजाम कर दीजिए। लेकिन किताब मत छीनिए।”

मैंने पहली बार विद्रोह किया था, लेकिन आवाज ऊँची करके नहीं—तर्क को अपना हथियार बनाकर।

उस दिन मैंने पहली बार विद्रोह किया था, लेकिन आवाज ऊँची करके नहीं—तर्क को अपना हथियार बनाकर।

पिता मान गए।

गाँव की वह पगडंडी, जिस पर जाते हुए लोग मुझे घूरते थे, मेरे लिए धीरे-धीरे नदी बन गई। नदी को कौन रोक पाया है? रास्ते में पत्थर आते हैं, मोड़ आते हैं, मगर वह अपना रास्ता बना लेती है।मैं भी बनाती गई।

फिर विवाह हुआ।

पर मेरी नहीं बड़ों की पसंद से।

एक रात मैंने उनसे कहा— “प्रबल, घर आपका है, लेकिन ज़िंदगी मेरी भी है।” वे मेरी ओर देखते रहे। “मैं आपकी पत्नी हूँ,” मैंने कहा, “आपकी संपत्ति नहीं।”

बड़ों ने कहा—“प्रबल सिंह अच्छा लड़का है।”

मैंने पूछा भी नहीं कि मेरे लिए अच्छा कौन है। उस समय लड़कियाँ सवाल नहीं करती थीं, फैसले सुनती थीं।

प्रबल बुरे नहीं थे, मगर उनका स्वभाव दबंग था। घर में उनके शब्द ही अंतिम शब्द माने जाते थे।

“इतनी देर बाहर रहने की जरूरत नहीं।”

“वहाँ मत जाओ।”

“इतना पढ़ने की क्या ज़रूरत है?”

कभी-कभी लगता था, मायके की दीवारें पीछे छूट गईं, मगर उनकी ईंटों से ही ससुराल की दीवारें बना दी गईं हैं।

एक रात मैंने उनसे कहा—

“प्रबल, घर आपका है, लेकिन ज़िंदगी मेरी भी है।” वे मेरी ओर देखते रहे।

“मैं आपकी पत्नी हूँ,” मैंने कहा, “आपकी संपत्ति नहीं।”

कुछ पल ऐसा सन्नाटा रहा जैसे आँधी के पहले पेड़ अचानक स्थिर हो जाते हैं।

उस दिन कोई फैसला नहीं हुआ। मगर मेरे शब्दों ने दरवाजे पर दस्तक दे दी थी।

धीरे-धीरे प्रबल बदले। शायद उन्हें समझ में आया कि मेरा विरोध उनसे नहीं, अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए है।

उन्होंने एक दिन बस इतना कहा—

“तुम्हें जो ठीक लगे, सोच-समझकर करना।”

मैं मुस्करा दी।

यह मेरे जीवन की पहली बड़ी जीत थी।

लेकिन एक और दीवार थी—मेरी सास भक्ति देवी की परंपराओं की दीवार।

वह पूजा-पाठ में डूबी रहतीं। व्रत, उपवास, नियम—उनकी जिंदगी इन्हीं से बुनी थी।

एक दिन उन्होंने कहा—

“बहू, कल करवा चौथ व्रत रखना है।”

मैंने पूछा—“क्यों?”

“घर में होता आया है। हर सुहागिन करती है। तुम्हें भी करना होगा”

मैंने धीरे से कहा—“माँजी, जो अच्छा है वह मैं ज़रूर करूँगी लेकिन सिर्फ इसलिए क्यों करूँ कि होता आया है?”

वे नाराज़ हो गईं।

“आजकल की लड़कियाँ बहुत सवाल करती हैं।”

मैंने उनके पैर छू लिए।

“सवाल श्रद्धा का दुश्मन नहीं, माँजी। वह तो उसे समझने का रास्ता है।”

वे चुप हो गईं।

मैंने उनकी पूजा नहीं छीनी, उनकी आस्था का मजाक नहीं उड़ाया। बस इतना किया कि अपनी बुद्धि को भी पूजा की थाली में जगह दे दी।

समय के साथ भक्ति देवी ने भी मुझे समझ लिया।

आज वे नहीं हैं।

प्रबल नहीं हैं।

मेरे पिता भी नहीं हैं।

लेकिन अजीब बात है मोक्ष—आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो उन सबके चेहरे दिखाई देते हैं। उनकी डाँट भी, उनकी चिंताएँ भी, उनकी गलतियाँ भी और उनका प्रेम भी।

मोक्ष ने पूछा—“दादी, फिर आपने उन्हें माफ कर दिया?” मैं हँसी। “माफ? बेटा, वे मेरे दुश्मन थे ही कब?”

मोक्ष ने पूछा—“दादी, फिर आपने उन्हें माफ कर दिया?”

मैं हँसी।

“माफ? बेटा, वे मेरे दुश्मन थे ही कब?”

मैंने तिरंगे की ओर देखा।

“हर बंधन गुलामी नहीं होता और हर खुला दरवाजा आज़ादी नहीं देता।”

मोक्ष मेरी ओर देखने लगा।

“तो आज़ादी क्या है?”

मैंने सामने नीम पर बैठे एक पक्षी की ओर इशारा किया।

“देख उसे। वह उड़ सकता है लेकिन क्या वह हर समय उड़ता रहता है? नहीं। वह घोंसला बनाता है, बच्चों को पालता है, दाना चुगता है और फिर उड़ता है।”

मैंने कहा— “आजादी पंख फैलाने का नाम है, मगर दिशा भूल जाने का नहीं। आजादी मनमर्जी नहीं, आत्म-अनुशासन है।

मैंने कहा—

“आजादी पंख फैलाने का नाम है, मगर दिशा भूल जाने का नहीं। आजादी मनमर्जी नहीं, आत्म-अनुशासन है। आजादी यह अधिकार है कि हम सही को चुन सकें और गलत के सामने ‘नहीं’ कह सकें।”

“और परंपरा?”

“परंपरा नदी की तरह होनी चाहिए—बहती हुई। जो परंपरा समाज को जीवन दे, उसे आगे ले जाओ। जो रास्ता रोकने लगे, उसमें नया मोड़ बनाओ।”

मोक्ष कुछ सोचने लगा।

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

“अंधभक्ति से बचना, अंधविरोध से भी। हर बात को आँख बंद करके मानना भी गुलामी है और हर बात को बिना समझे नकार देना भी।”

बाहर बच्चों ने नारा लगाया—

“भारत माता की जय!”

तिरंगा हवा में और ऊँचा उठ गया।

मैंने उसे देखा तो लगा जैसे मेरे जीवन का पूरा आकाश उस छोटे-से कपड़े में समा गया हो।

मैंने मोक्ष से कहा—

“मैंने जिंदगी भर छोटी-छोटी आजादियाँ  हासिल की हैं। कभी अपनी थाली की, कभी अपने कपड़ों की, कभी किताबों की, कभी अपने फैसलों की और कभी अपनी सोच की।”

मैं कुछ देर रुकी।

“लेकिन सबसे बड़ी आज़ादी तब मिली, जब मैंने यह समझा कि दूसरों को बाँधकर कोई खुद आजाद नहीं हो सकता।”

मोक्ष ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

“दादी, आपके लिए सबसे बड़ा बंधन क्या था?”

मैंने मुस्कराकर कहा—

“डर।”

“और सबसे बड़ा हथियार?”

“विवेक।”

“और सबसे बड़ी आज़ादी?”

मैंने उसकी हथेली अपनी हथेली में ले ली।

“अपने मन और बुद्धि को सच के सामने स्वतंत्र रखना।”

नीम की पत्तियों से छनकर धूप मेरे चेहरे पर पड़ी। मुझे लगा, जैसे बचपन की वह छोटी-सी चिड़िया आज फिर मेरे भीतर पंख फड़फड़ा रही है।

फ़र्क सिर्फ इतना था कि तब वह पिंजरे से निकलना चाहती थी।

आज वह खुले आकाश को पहचान चुकी थी।

मैंने तिरंगे की ओर देखा और धीरे से कहा—

“मोक्ष, देश को आज़ाद हुए बरसों बीत गए। अब तुम्हारी पीढ़ी को मनुष्य को मनुष्य से बाँधने वाली दीवारों से आज़ादी दिलानी है।”

मोक्ष चुप था।

शायद वह समझ गया था कि स्वाधीनता दिवस केवल झंडा फहराने का दिन नहीं—अपने भीतर की गुलामी पहचानने का दिन भी है।

और मैं ?

मैंने आँखें मूँद लीं।

दूर कहीं राष्ट्रगान बज रहा था।

मेरे भीतर एक नदी बह रही थी। बहुत पुरानी नदी।

जो पगडंडियों, दीवारों, पिंजरों और बंधनों के बीच से अपना रास्ता बनाती हुई आखिरकार खुले आकाश तक पहुँच गई थी। आने वाली पीढ़ी को मीठा जल देने के लिए। (युवराज)

डॉ. घनश्याम बादल 

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