देवी

कविता
Poem
माता दुर्गाAI Generated Image
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हर साल आती हैं माँ,

अपने बच्चों से मिलने,

कुछ दिन के लिए इस धरती पर,

हमारे सूने आँगन में खुशियाँ भरने।

लाल चुनरी, माथे पर बिंदिया,

चेहरे पर तेज़ हज़ार,

हाथों में शस्त्र लिए माँ,

करती हैं दुष्टों का संहार।

पर माँ, तुम केवल मूर्ति नहीं,

तुम हर नारी की पहचान हो,

कभी ममता, कभी शक्ति,

कभी साहस की उड़ान हो।

जब कोई बेटी चुपचाप सहती है,

जब कोई माँ अपने आँसू पीती है,

जब कोई स्त्री हारकर भी उठती है,

शायद वहीं कहीं माँ दुर्गा दिखती हैं।

ढाक की थाप और शंख की ध्वनि,

हर ओर खुशियों का त्योहार,

पर माँ, एक बात पूछूँ तुमसे,

कब बदलेगा यह संसार ?

जहाँ हर बेटी निडर होकर चले,

जहाँ नारी को सम्मान मिले,

जहाँ शक्ति की पूजा केवल मंदिरों में नहीं,

हर घर में उसका स्थान मिले।

माँ, अगले साल फिर आना,

बस एक छोटी-सी सौगात लाना,

फूलों से सजे हर आँगन के साथ,

हर बेटी के हिस्से में भी सम्मान लाना।

अनन्या झा

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