

पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित आज के एकल परिवारों में जिस असाध्य रोग का सामना कर पड़ रहा है वह है अकेलापन। एक से तीसरे मुंह यही सुनने में आता है कि बड़ा अकेला महसूस करते हैं। सच भी है जहां संयुक्त परिवारों के विघटन से कुछ हितकारी परिणाम हैं तो वहीं एकाकीपन जैसे लाइलाज रोग का भी घर-घर में निवास सा हो गया है।
आज के मशीनीकरण में मानव मन ने दूरियां बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं, क्योंकि पहले संपूर्ण कार्य हाथों द्वारा किया जाता था जिससे एक दूसरे का हाथ बांटने के कारण समीपता लाजमी थी लेकिन आज अधिक से अधिक कार्य मशीनों द्वारा संभव है इसीलिए एक को दूसरे की आवश्यकता की कमी के कारण उपजा है अकेलापन।
इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि यह रोग स्त्रियों में अधिक देखने में आता है। आइये जीवन को सकारात्मक सोच देते हुए कुछ खास बनाने हेतु सूत्र बनाने और एकाकीपन से छुटकारे के विकल्प भी तलाश करें।
सर्वप्रथम तो जीवन में कुछ रचनात्मकता का समावेश करिए। आपको जिस भी क्षेत्र में रुचि हो, थोड़ा प्रशिक्षण प्राप्त कर अपनी लगन, मेहनत और अभ्यास द्वारा उस क्षेत्र में एक मुकाम खड़ा करें कायम करें।
जो भी समाजोपयोगी कार्य आपको आत्मिक संतुष्टि दे, धीरे-धीरे क्षमतानुसार करना प्रारम्भ करें जिससे आपको आत्मसुख के साथ साथ बाहर प्रतिष्ठा भी मिलेगी। इस तरह आपमें आत्मविश्वास बढ़ेगा और समाज में दायरा भी बढ़ेगा तो आप खुद को ’अकेला’ महसूस नहीं करेंगे।
अध्ययन या रुचि अनुसार पठन सामग्री अवश्य एकत्र रखें। जहां तक हो सके, दिन में तीन या चार घंटे जरूर अध्ययन में व्यतीत करें। इससे शुद्ध स्वस्थ विचार तो आपके बनेंगे ही, सोच का दायरा भी विस्तृत होगा। साथ ही व्यर्थ के अंतर्द्वन्द्व से भी सुरक्षित रह सकेंगे।
उक्त बातों पर अमल करेंगे तो अवश्य ही आप कह उठेंगे-मैं अकेला ही चला था जानिबेमंजिल, लोग साथ आते गए और कारवां बनता चला गया। ममता(उर्वशी)