

अमेरिका की जानी-मानी भारतीय-अमेरिकी कैंसर विशेषज्ञ और शोधकर्ता डॉ. रचना श्रॉफ का 47 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह जिस बीमारी के इलाज को बेहतर बनाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुकी थीं, उसी कैंसर से उनकी मृत्यु हुई। उनके निधन से चिकित्सा और कैंसर अनुसंधान जगत में शोक की लहर है।
डॉ. श्रॉफ यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना कैंसर सेंटर में क्लिनिकल रिसर्च की एसोसिएट डायरेक्टर और हेमेटोलॉजी-ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख थीं। वह अग्नाशय और पित्त नली से जुड़े कैंसर के उपचार और नई चिकित्सा पद्धतियों पर काम करने वाली प्रमुख विशेषज्ञों में शामिल थीं।
डॉ. रचना श्रॉफ एक चिकित्सक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक और शोधकर्ता भी थीं। उन्होंने अपने करियर में दुर्लभ और जटिल कैंसर के इलाज को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया। उनके शोध का प्रमुख क्षेत्र अग्नाशय, यकृत और पित्त मार्ग से जुड़े कैंसर थे।
उन्होंने ब्राउन यूनिवर्सिटी से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और थॉमस जेफरसन यूनिवर्सिटी से चिकित्सा की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने टेक्सास स्थित एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर में विशेषज्ञ प्रशिक्षण लिया। वर्ष 2018 में वह यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना से जुड़ीं और वहां कैंसर के इलाज तथा क्लिनिकल रिसर्च कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अपने करियर के दौरान उन्होंने 80 से अधिक शोधपत्र लिखे और कई क्लिनिकल ट्रायल का नेतृत्व किया। इन परीक्षणों का उद्देश्य कैंसर के मरीजों तक नए उपचार पहुंचाना और उनके इलाज के विकल्प बढ़ाना था।
डॉ. श्रॉफ की निजी जिंदगी में बीमारी का कठिन दौर 2026 में शुरू हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक, मई में उनकी एक लिम्फ नोड में सूजन दिखाई दी। आगे की चिकित्सकीय जांच में पता चला कि बीमारी गंभीर रूप ले चुकी थी। उन्हें टर्मिनल एडेनोकार्सिनोमा का पता चला, जो ग्रंथियों की कोशिकाओं से विकसित होने वाला कैंसर है।
यह बीमारी उनके शरीर में कहां से शुरू हुई थी, इसे लेकर शुरुआती रिपोर्टों में पाचन तंत्र को संभावित स्रोत बताया गया। उनकी हालत गंभीर होने के बावजूद उन्होंने कैंसर अनुसंधान और मरीजों के लिए बेहतर उपचार विकल्पों की दिशा में काम जारी रखा।
पित्त नली के कैंसर, जिसे कोलैंजियोकार्सिनोमा भी कहा जाता है, पर उनका काम खास तौर पर उल्लेखनीय रहा। यह एक दुर्लभ बीमारी है, जिसके इलाज के विकल्प लंबे समय तक सीमित रहे। डॉ. श्रॉफ ने क्लिनिकल ट्रायल और नई उपचार पद्धतियों के विकास के जरिए इस क्षेत्र में प्रगति लाने में योगदान दिया।
डॉ. श्रॉफ की विरासत उनके शोध और मरीजों की देखभाल तक सीमित नहीं रही। अपनी बीमारी के दौरान उन्होंने पित्त नली के कैंसर पर काम करने वाले युवा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को सहयोग देने के लिए एक स्थायी कोष बनाने की पहल की।
उनके नाम पर स्थापित किए गए युवा शोधकर्ता पुरस्कार के लिए कुछ ही हफ्तों में 13.5 लाख डॉलर से अधिक की राशि जुटाई गई। इसका उद्देश्य भविष्य में इस क्षेत्र में काम करने वाले शोधकर्ताओं को आर्थिक सहायता देना और कैंसर अनुसंधान को आगे बढ़ाना है।
यह पहल उनके काम के प्रति समर्पण को दिखाती है। जब वह खुद गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं, तब भी उनका ध्यान इस बात पर था कि उनके बाद भी कैंसर के इलाज की खोज जारी रहे और अगली पीढ़ी के वैज्ञानिकों को आगे बढ़ने का अवसर मिले।
डॉ. श्रॉफ को उनके सहयोगियों ने एक कुशल चिकित्सक, समर्पित शोधकर्ता और युवा डॉक्टरों का मार्गदर्शन करने वाली मेंटर के रूप में याद किया। वह मानती थीं कि मरीजों को इलाज के नए और उन्नत विकल्प उपलब्ध कराने के लिए क्लिनिकल ट्रायल की पहुंच बढ़ाना जरूरी है। उनका निधन कैंसर अनुसंधान जगत के लिए बड़ी क्षति है। उनके पति डॉ. पुनीत श्रॉफ, बच्चे सिमरन और सचिन, माता-पिता और बहन उनके परिवार में हैं।
डॉ. रचना श्रॉफ की कहानी एक ऐसे जीवन की कहानी है, जिसने गंभीर बीमारी के बीच भी दूसरों के लिए उम्मीद और शोध के नए रास्ते बनाने की कोशिश नहीं छोड़ी। उनका काम, उनके शोध और उनके नाम पर स्थापित पुरस्कार आने वाले समय में कैंसर के इलाज की दिशा में प्रयासरत नई पीढ़ी को आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं।