सरकार अब नरम भाषा समझती ही नहीं है
भारत
हड़ताल क्यों?
पिछले एक सप्ताह से हल्ला है कि बैंक कर्मचारी 28 सितंबर से तीन दिन की हड़ताल करने वाले हैं। बैंक अपने ग्राहकों को लगातार मैसेज भेज रहे हैं कि हड़ताल के दौरान परेशानी न हो, इसलिए 27 सितंबर रविवार को भी बैंक खुले रहेंगे, अपने काम निपटा लें। सोशल मीडिया पर इसके पक्ष और विपक्ष में बहस चल रही है कि बैंक कर्मचारियों की हड़ताल ठीक है या गलत। मोटे तौर पर आम आदमी को एक ही बात समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि बैंक कर्मचारी 5 दिन का कार्य-सप्ताह मांग रहे हैं और हर शनिवार व रविवार को छुट्टी की मांग है। लेकिन यह अधूरा सच है। इस हड़ताल की जड़ 1300 दिन से भी पुराने एक समझौते में है। 8 मार्च, 2023 को इंडियन बैंक्स एसोसिएशन और कर्मचारी यूनियनों के बीच समझौता हुआ था कि बैंकों में सप्ताह में 5 दिन काम होगा, इसके बदले में बैंक कर्मचारी कम वेतन पर काम करने को तैयार हुए। बैंकों ने वह समझौता सरकार के पास भेज दिया ताकि उससे लागू कराया जा सके, लेकिन लगभग 1300 दिन बीत जाने के बाद भी सरकार ने उसे लागू नहीं किया। हर तिमाही खबरें आती हैं कि हर बैंक का मुनाफा इतना बढ़ गया, लेकिन इसके पीछे की हकीकत की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। वर्ष 2021 में मार्च तक बैंक खातों की संख्या लगभग 144 करोड़ थी और तब बैंक कर्मचारियों की संख्या 7 लाख 84 हजार के आसपास थी। तीन साल बाद खाते बढ़कर 160 करोड़ से अधिक हो गए। जब खाते बढ़े हैं तो बैंक कर्मचारियों की संख्या भी बढ़नी चाहिए थी ताकि सेवा सुचारू रहे, लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। बैंक कर्मचारियों की संख्या घटकर 7 लाख 57 हजार के आसपास आ गई यानी लगभग 27 हजार कर्मचारी घट गए। अर्थात् काम बढ़ गया और काम करने वाले घट गए, तो उन पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। एक और बात, केंद्र सरकार के सभी कार्यालयों, अधिकांश सार्वजनिक उपक्रमों और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट आदि में भी 5 दिन ही काम होता है। बैंक कर्मचारियों को भी केंद्रीय कर्मचारी माना जाता है तो उनकी 5 दिन के कार्य-सप्ताह की मांग गलत कैसे हुई? हड़ताल कर रहे कर्मचारियों की एक और मांग है - पीएलआई में भेदभाव खत्म करना। मोदी सरकार परफॉर्मेंस बेस्ट इन्सेंटिव यानी पीएलआई योजना लेकर आई थी, जिसके तहत प्रदर्शन के आधार पर प्रोत्साहन दिया जाना था। बैंक कर्मचारियों का आरोप है कि इसमें भारी भेदभाव हो रहा है। बैंक भारी मुनाफा कर्मचारियों की मेहनत के कारण कमा रहे हैं, लेकिन पीएलआई का लाभ उनकी बजाय अधिकारियों को दिया जा रहा है। कर्मचारियों को एक महीने का वेतन भी पीएलआई में नहीं मिलता, अधिकारियों को छह से बारह महीने का पैसा पीएलआई में दिया जाता है, कर्मचारी इसे समान करवाना चाहते हैं। जब बेरोजगारी चरम पर है, बैंकों का मुनाफा कुछ हजार करोड़ से बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है, तब भी बैंकों में कर्मचारियों की कमी क्यों है, इसका जवाब तो शायद वित्तमंत्री भी न दे पाएं। बैंकों ने कम बैलेंस से लेकर एसएमएस चार्ज, एटीएम चार्ज, स्टेटमेंट चार्ज, एनईएफटी चार्ज जैसी जो लूट मचा रखी है, इसका पूरा गुस्सा भी कर्मचारियों को झेलना पड़ता है, जबकि खून चूसने वाले ये सारे चार्ज लगाने वाले अधिकारी तो आराम से मुख्यालयों या वित्त मंत्रालय में आराम से एसी की हवा खाते हैं। दूसरा पहलू यह भी है कि लोगों की नजर में बैंक कर्मचारी पहले ही कामचोर हैं, ईमानदारी से काम नहीं करते। एक जमाना था जब रेलवे और बैकों में जब-तब हड़ताल देखने को मिलती थी, अब वैसा हाल नहीं है। लेकिन यदि आज भी कर्मचारियों को हड़ताल के लिए विवश होना पड़ रहा है तो कारण एक ही है कि सरकार अब नरम भाषा समझती ही नहीं है, उसे धमकी वाली भाषा ही समझ आ रही है। मोबाइल फोन पर जन्मी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की हिंसा की भाषा से डरकर सरकार मंत्री को हटा देती है, लेकिन ब्लैकमेलिंग और अत्याचार की जड़ बन रहे एससी-एसटी एक्ट में सुधार, जात-पात आधारित यूजीसी गाइडलाइन्स में सुधार की सामान्य वर्ग की बात सुनने की बजाय मनमानी कर रही है। महान क्रांतिकारी भगत सिंह ने यूं ही नहीं कहा था कि ‘बहरे कानों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत पड़ती है।’

