

वॉशिंगटन : अंतरिक्ष की अनंत दूरी में करीब 49 वर्षों से सफर कर रहा नासा का वॉयजर-1 एक और ऐतिहासिक उपलब्धि के करीब है। यह मानव निर्मित पहला ऐसा अंतरिक्ष यान बनने जा रहा है, जो पृथ्वी से एक प्रकाश-दिन की दूरी तय करेगा। इस दूरी पर पहुंचने के बाद पृथ्वी से भेजा गया संदेश यान तक पहुंचने में लगभग 24 घंटे लेगा। वहीं, वहां से जवाब आने में भी इतना ही समय लगेगा। यानी एक संदेश भेजने और उसका जवाब पाने में करीब 48 घंटे का इंतजार करना होगा।
नासा के अनुसार, वॉयजर-1 यह दूरी 18 नवंबर 2026 को तय कर सकता है। हालांकि, इस उपलब्धि से कुछ सप्ताह पहले यान ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी थी। 18 और 19 अक्टूबर को नासा का डीप स्पेस नेटवर्क दो बार यान से संपर्क नहीं कर पाया। करीब 48 घंटे बाद 20 अक्टूबर को उसका संकेत फिर मिलने लगा। इसके बाद से संपर्क बना हुआ है। वैज्ञानिक अब भी यह पता लगाने में जुटे हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ।
क्या है एक प्रकाश-दिन की दूरी?
प्रकाश-दिन का अर्थ है वह दूरी, जिसे प्रकाश 24 घंटे में तय करता है। प्रकाश की गति लगभग 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड है। इस हिसाब से एक प्रकाश-दिन करीब 25.9 अरब किलोमीटर या 16.09 अरब मील के बराबर होता है।
नासा के मुताबिक, 18 नवंबर को वॉयजर-1 पृथ्वी से लगभग 25.89 अरब किलोमीटर दूर होगा। इस दूरी पर रेडियो संदेश को पृथ्वी से यान तक पहुंचने में एक दिन लगेगा। यान से भेजा गया जवाब भी एक दिन बाद ही पृथ्वी तक पहुंचेगा। इस तरह वैज्ञानिकों को किसी संदेश का जवाब पाने के लिए दो दिन इंतजार करना होगा।
वॉयजर-1 की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है, क्योंकि अब तक कोई दूसरा मानव निर्मित यान पृथ्वी से इतनी दूर नहीं पहुंचा है। हालांकि, इस दूरी तक पहुंचने से यान या उसके आसपास के वातावरण में कोई बदलाव नहीं होगा। यह उपलब्धि मुख्य रूप से अंतरिक्ष में मानव की पहुंच और वैज्ञानिक प्रयासों की याद दिलाएगी।
दो दिन तक क्यों टूटा था संपर्क?
नासा के अनुसार, 18 और 19 अक्टूबर को वॉयजर-1 से संपर्क के लिए तय दो प्रयास किए गए, लेकिन उसका रेडियो संकेत नहीं मिला। ये दोनों प्रयास 24 घंटे के अंतर पर किए गए थे। 20 अक्टूबर को यान का संकेत अपने आप फिर मिलने लगा। वैज्ञानिकों को पृथ्वी से कोई विशेष आदेश भेजकर संपर्क बहाल नहीं करना पड़ा।
जांच के दौरान पता चला कि यान के थ्रस्टर के एक समूह ने काम करना बंद कर दिया था। इसके बाद यान में लगे दूसरे थ्रस्टर अपने आप चालू हो गए। थ्रस्टर ऐसे उपकरण होते हैं, जो अंतरिक्ष यान की दिशा और स्थिति को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
यान में एक सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है। जब उसके कंप्यूटर किसी उपकरण में गड़बड़ी महसूस करते हैं, तो वे अपने आप दूसरे उपकरण को चालू कर सकते हैं। इस दौरान यान को सुरक्षित स्थिति में रखा जाता है और सामान्य कामकाज रोक दिया जाता है, ताकि पृथ्वी पर मौजूद वैज्ञानिक समस्या को समझ सकें। नासा ने साफ किया है कि संपर्क टूटने की असली वजह अभी पता नहीं चली है।
बिजली बचाने के लिए किया गया खास बदलाव
वॉयजर-1 करीब पांच दशक पुराना यान है। इतने लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने के कारण इसकी बिजली बनाने की क्षमता लगातार कम हो रही है। यह यान परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाता है। इसमें प्लूटोनियम के क्षय से पैदा होने वाली गर्मी का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जाता है। समय के साथ इसकी बिजली उत्पादन क्षमता घटती जाती है।
इस चुनौती से निपटने के लिए नासा के वैज्ञानिकों ने सितंबर में एक खास योजना पूरी की। इसे ‘बिग बैंग’ नाम दिया गया। इसके तहत यान के तीन उपकरण बंद कर उनकी जगह कम बिजली खर्च करने वाले विकल्पों का इस्तेमाल किया गया। इस बदलाव का उद्देश्य उपलब्ध ऊर्जा बचाना और यान के वैज्ञानिक उपकरणों को अधिक समय तक चालू रखना है।
वॉयजर-1 जब 1977 में रवाना हुआ था, तब उसमें वैज्ञानिक अध्ययन के लिए 10 उपकरण लगाए गए थे। बिजली की कमी के कारण समय के साथ कई उपकरण बंद करने पड़े। हाल के वर्षों में इसके दो वैज्ञानिक उपकरण भी बंद किए गए हैं। नासा के मुताबिक, यदि बिजली बचाने का यह नया बदलाव नहीं किया जाता, तो 2027 की गर्मियों तक एक और उपकरण बंद करना पड़ सकता था।
1977 से जारी है ऐतिहासिक सफर
नासा ने वॉयजर-1 को 5 सितंबर 1977 को अंतरिक्ष में भेजा था। इसका शुरुआती उद्देश्य बृहस्पति और शनि ग्रहों का अध्ययन करना था। इन ग्रहों के पास से गुजरने के बाद इसने अपना सफर जारी रखा और सौरमंडल की बाहरी सीमा पार कर अंतरतारकीय अंतरिक्ष में पहुंच गया।
अंतरतारकीय अंतरिक्ष वह क्षेत्र है, जो सूर्य के प्रभाव वाले बड़े क्षेत्र यानी हेलियोस्फीयर के बाहर स्थित है। सूर्य से निकलने वाले कणों और चुंबकीय क्षेत्र से बना यह क्षेत्र सौरमंडल के आसपास एक तरह का घेरा बनाता है। वॉयजर-1 और वॉयजर-2 ऐसे पहले अंतरिक्ष यान हैं, जिन्होंने इस सीमा के बाहर के वातावरण का सीधे अध्ययन किया है।
वॉयजर-1 करीब 61 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। नासा के वैज्ञानिकों के लिए इसकी ओर से मिलने वाली जानकारी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि फिलहाल कोई दूसरा यान इतनी दूर जाकर उस क्षेत्र का अध्ययन नहीं कर रहा है।
करीब आधी सदी पुराने इस यान का लगातार काम करते रहना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। घटती बिजली, पुराने उपकरणों और तकनीकी समस्याओं के बावजूद वॉयजर-1 का सफर जारी है। 18 नवंबर को एक प्रकाश-दिन की दूरी पार करना इसी लंबे और असाधारण सफर का नया पड़ाव होगा।