सरेंडर के लिए आरोपी के निर्दोष परिजनों को हिरासत में लेना अवैध : कोर्ट

पीठ ने कहा कि इस तरह की हिरासत किसी व्यक्ति को गैरकानूनी रूप से उसकी स्वतंत्रता से वंचित करने के समान
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय
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प्रयागराज : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि पुलिस किसी आरोपी पर आत्मसमर्पण का दबाव बनाने के लिए उसके परिवार के किसी निर्दोष सदस्य को अवैध रूप से हिरासत में नहीं रख सकती।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की पीठ ने कहा कि इस तरह की हिरासत किसी व्यक्ति को गैरकानूनी रूप से उसकी स्वतंत्रता से वंचित करने के समान है और हिरासत में रखा गया व्यक्ति मुआवजा पाने का पात्र है।

अदालत ने याचिकाकर्ता अरविंद कुमार यादव की कथित अवैध हिरासत के संबंध में उसकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली। उसे प्रयागराज के जॉर्ज टाउन थाने में हिरासत में रखा गया था।

अदालत ने याचिकाकर्ता को अवैध रूप से हिरासत में रखने के लिए उसे 40,000 रुपये का मुआवजा दिए जाने का आदेश दिया। पीठ ने निर्देश दिया कि यह राशि याचिकाकर्ता को अवैध हिरासत में रखने के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूली जाए।

मामले के तथ्यों के मुताबिक, प्रयागराज के जॉर्ज टाउन थाने में याचिकाकर्ता के भाई सुरेश कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी और जांच के बाद उसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 109 (हत्या का प्रयास) जोड़ी गई।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि हालांकि उसका उसके भाई के मामले से कोई संबंध नहीं था, लेकिन उसे 23 जून 2026 को जौनपुर में उसके घर से उठाया गया और जॉर्ज टाउन थाने ले जाया गया।

याचिकाकर्ता के मुताबिक, उसे 26 जून 2026 को शाम सात बजे छोड़ा गया। अपने दावे के समर्थन में याचिकाकर्ता ने रिहाई के समय तैयार किए गए सुपुर्दगीनामे को आधार बनाया, जिसमें यह दर्ज था कि उसे 26 जून को छोड़ा गया।

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष पेश हुए जांच अधिकारी अश्वनी सविता ने बताया कि थाना प्रभारी (एसएचओ) योगेंद्र कुमार सिंह के निर्देश पर वह और अन्य पुलिसकर्मी याचिकाकर्ता के घर गए थे और 23 जून को उसे पूछताछ के लिए साथ ले आए थे।

राज्य सरकार के वकील ने भी इस बात से इनकार नहीं किया कि याचिकाकर्ता 26 जून को शाम सात बजे रिहा किए जाने तक थाने में रहा। इससे पहले अदालत ने जांच अधिकारी को कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था, ताकि यह पता चल सके कि 23 से 26 जून के बीच याचिकाकर्ता कहां था।

अदालत ने कहा कि इस बात में कोई विवाद नहीं है कि याचिकाकर्ता कम से कम चार दिन तक पुलिसकर्मियों की अवैध हिरासत में रहा। अदालत ने नौ सितंबर के अपने निर्णय में निर्देश दिया कि इस मामले पर अदालत की नाराजगी जांच अधिकारी और एसएचओ के सेवा अभिलेख में उचित रूप से दर्ज की जाए।

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