

नई दिल्ली : दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत के मलबे के नीचे 20 वर्षीय छात्र नीरज घंटों दबा रहा और उसे साहस की मिसाल बताते हुए उसके पिता 67 वर्षीय दर्शन दास अपने बेटे के माथे पर हाथ फेरते हुए कहते हैं ‘तू शेर है, शेर।’
पैरों पर कब खड़ा होगा बेटा
मोतीलाल नेहरू कॉलेज में स्नातक के दूसरे वर्ष के छात्र नीरज जब छात्रवृत्ति कार्यक्रम के तहत जम्मू से दिल्ली आया था, तब उसके पिता को लगा था कि उनका इकलौता बेटा उस जिंदगी की ओर बढ़ रहा है, जिसे उन्होंने उसके लिए बनाने की कोशिश की थी- कॉलेज की पढ़ाई, एक अच्छा करियर और अपने पैरों पर खड़े होने की क्षमता। लेकिन उस इमारत को ढहे 25 दिन हो चुके हैं, जिसमें नीरज पीजी में रह रहा था। हादसे में सात लोगों की मौत हुई थी, जिनमें पांच छात्र थे। अब दर्शन दास को बेटे के करियर की चिंता नहीं है। वह बस इतना चाहते हैं कि उनका बेटा फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो सके। हालांकि नीरज के कूल्हे में फ्रैक्चर, कमर और जांघों के आसपास गहरे घाव तथा पेट और पीठ में चोटों के कारण यह आसान नहीं है।
बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित हैं पिता
छह सितंबर को हुए हादसे के करीब एक महीने बाद भी नीरज एम्स के आईसीयू में भर्ती है और परेशान पिता अब यह आश्वासन चाहते हैं कि उनके बेटे का भविष्य सुरक्षित हो। सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी दर्शन दास ने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि सरकार उसे किसी तरह की नौकरी दे। अगर वह पहले की तरह पढ़ाई या काम करने की स्थिति में नहीं है तो कम से कम उसके पास सहारा तो होना चाहिए। आज वह अस्पताल में है और सरकार मदद कर रही है, लेकिन जब वह बाहर आएगा तो क्या होगा? मैं उसकी फिजियोथेरेपी, दवाओं, उपकरणों और आगे के इलाज का खर्च कैसे उठाऊंगा?’
बेटे की अब तक हुई 6 सर्जरी
दर्शन दास ने बताया कि उनके बेटे की करीब 6 सर्जरी हो चुकी हैं। उन्होंने कहा, ‘उसकी पीठ में एक मशीन लगाई गई है और जल्द ही एक और सर्जरी होनी है। उसका बायां पैर पूरी तरह अकड़ गया है और दाएं पैर के पंजे में ही थोड़ी हरकत है। डॉक्टरों ने यह नहीं बताया कि यह स्थिति कब तक रहेगी या वह कब खड़ा हो पाएगा।’ दर्शन दास अपना ज्यादातर समय आईसीयू के बाहर गलियारे में बिताते हैं। वह अगले मौके का इंतजार करते हैं जब उन्हें बेटे से मिलने दिया जाए या कोई उन्हें बताए कि नीरज को किसी चीज की जरूरत है। अनुमति मिलने पर वह कुछ देर बेटे के पास बैठते हैं और फिर गलियारे में लौट आते हैं। उनके मन में बार-बार यही सवाल आता है- ‘इसके बाद क्या होगा?’
बेटे का खर्च कैसे चलेगा ?
दर्शन दास ने बताया कि फिलहाल नीरज का इलाज नि:शुल्क हो रहा है। दिल्ली सरकार ने परिवार को पांच लाख रुपये की सहायता भी दी है, जो उनके लिए काफी मददगार रही है। लेकिन 35,000 रुपये मासिक पेंशन पाने वाले सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी को चिंता है कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वह बेटे का खर्च कैसे उठाएंगे?
दर्शन दास की पत्नी की 2016 में निमोनिया से मौत हो गई थी। उनके पांच बच्चों में चार बेटियां हैं और नीरज इकलौता बेटा है। उन्होंने कहा, ‘नीरज की मां निमोनिया से चल बसी। मैंने अपने परिवार के लिए जो कुछ कर सकता था, किया, लेकिन अब जब मैं अपने बेटे को इस हालत में देखता हूं तो सोचता हूं कि अगर उसकी मां होती तो शायद उसकी बेहतर देखभाल हो पाती।’ हादसे ने नीरज की पढ़ाई भी रोक दी है।
कैसे पढ़ेगा नीरज
नीरज के कॉलेज के प्राचार्य ने ऑनलाइन कक्षाओं की व्यवस्था करने की पेशकश की है, लेकिन दर्शन दास का कहना है कि उनका बेटा फिलहाल पढ़ाई या परीक्षाओं के बारे में सोचने की स्थिति में नहीं है। पिता ने कहा, ‘वह मुझसे पूछता है, ‘मैं कैसे पढ़ पाऊंगा?’ वह वहां लेटा हुआ है, अपने पैर तक नहीं हिला सकता, ऐसे में वह कैसे पढ़ेगा? वह शायद ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल हो सकता है, लेकिन परीक्षा कैसे देगा? पहले वह हमेशा अपने करियर को लेकर सोचता था, अब उसे नहीं पता कि वह दोबारा कभी चल भी पाएगा या नहीं।’
शांत लड़का है नीरज
दर्शन दास के लिए जम्मू से दिल्ली आए उस बेटे को याद करना मुश्किल है, जिसे उन्होंने बड़ा होते देखा था। नीरज बचपन में शांत और अंतर्मुखी था तथा ज्यादातर समय पढ़ाई में बिताता था। उसने आर्मी स्कूल में पढ़ाई की और उसे फुटबॉल पसंद था। दर्शन दास ने कहा, ‘दिल्ली आने के बाद वह बिल्कुल बदल गया। उसने खुद पर काम किया, आत्मविश्वासी बना और उसके बहुत सारे दोस्त बन गए।’
भूलती नहीं वह भयावह रात
दर्शन दास को वह रात अब भी याद है, जब उन्हें पता चला कि उनका बेटा ढही हुई इमारत के नीचे फंसा है। रक्षाबंधन के लिए 26 अगस्त को जम्मू गया नीरज 29 अगस्त को दिल्ली लौटा था। जब सत्य निकेतन की इमारत गिरने की तस्वीरें टीवी पर आईं तो दर्शन दास की नजर एक पीड़ित की कलाई पर बंधी राखी पर पड़ी, जिसे वह पहचान गए। उन्होंने अपनी एक बेटी से पूछा, ‘बेटा, देखना, यह तेरा भाई तो नहीं है?’ दर्शन दास के मुताबिक, पीजी के प्रभारी ने कई घंटे बाद उन्हें फोन किया। उन्होंने बेटी से पैसे उधार लिए, टैक्सी की और तुरंत दिल्ली के लिए रवाना हो गए।
उन्होंने कहा, ‘रास्ते भर मैं सोचता रहा कि वहां मुझे क्या देखने को मिलेगा। उस पर इमारत गिर गई थी- टन भर पत्थर और मलबा। मैं सोच रहा था कि उसके शरीर का क्या बचा होगा, उसके साथ क्या हुआ होगा? जब मैंने उसे आखिरकार देखा तो उसका चेहरा और शरीर का ऊपरी हिस्सा सुरक्षित था। इससे कुछ राहत मिली। फिर मैंने उसकी चोटें देखीं।’
नीरज ने बरती समझदारी
नीरज अपने दोस्तों के साथ दूसरी मंजिल पर खाना खा रहा था, तभी इमारत ढह गई। कंक्रीट और लोहे की छड़ों के नीचे फंसे नीरज ने अपने फोन की लाइव लोकेशन चालू कर दी और मलबे के बीच से फोन बाहर फेंक दिया। इससे बाहर मौजूद लोगों को उसके फंसे होने की जगह का पता लगाने में मदद मिली। कई घंटे की मशक्कत के बाद बचावकर्मियों ने उसे बाहर निकाला।
दिलासा देते हैं पिता
दर्शन दास अक्सर अपने बेटे के माथे पर हाथ फेरते हैं और उसे उस साहस की याद दिलाते हैं, जो उसने मलबे के नीचे फंसे रहने के दौरान दिखाया था। वह कहते हैं, ‘मैं उससे कहता हूं, ‘तू शेर है, शेर।’ उस हालात में बच जाना.... इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए।’
थोड़ी रहमदिली की जरूरत
अपने बेटे के भविष्य के लिए दर्शन दास की एक ही चिंता है कि नीरज किसी भी प्रकार उठ खड़ा हो सके। इस विषम परिस्थिति में सरकार और समाज का सहयोग अगर दर्शन दास को मिले तो यह मानवीयता का आदर्श उदाहरण होगा।