

नई दिल्ली : कांग्रेस ने समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि सरकार के लिए UCC महज कानूनी सुधार का विषय नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है। कांग्रेस का यह बयान महाराष्ट्र में UCC के लिए गठित समिति के सदस्य और बॉम्बे हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आर.सी. चव्हाण के इस्तीफे के बाद आया है।
महाराष्ट्र UCC समिति में इस्तीफे से उठे सवाल
महाराष्ट्र सरकार ने UCC के क्रियान्वयन के लिए जुलाई 2026 में सात सदस्यीय समिति गठित की थी, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं। समिति की दूसरी बैठक के बाद जस्टिस आर.सी. चव्हाण ने 19 सितंबर को इस्तीफा दे दिया। चव्हाण ने सार्वजनिक प्रतिक्रिया जुटाने की प्रक्रिया और समिति के कामकाज को लेकर आपत्ति जताई। उनके अनुसार, जिन सामाजिक मुद्दों पर जनता की राय मांगी जानी थी, उनसे जुड़े प्रश्नों को मुख्य रूप से ‘हां या नहीं’ के प्रारूप में रखा जा रहा था। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि समिति की बैठक में एक ऐसे व्यक्ति की मौजूदगी और भूमिका क्या थी, जो समिति का औपचारिक सदस्य नहीं था।
सार्वजनिक राय लेने के तरीके पर विवाद
जस्टिस चव्हाण की आपत्ति का एक प्रमुख बिंदु प्रश्नावली को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उनका कहना था कि समिति की बैठक में प्रश्नावली पर चर्चा होनी थी, लेकिन अध्यक्ष की ओर से प्रश्न पहले ही अंतिम रूप में प्रसारित किए जा चुके थे। उनका मत था कि इतने जटिल सामाजिक विषयों पर केवल ‘हां’ या ‘नहीं’ में जवाब मांगना व्यापक विचार-विमर्श और सहमति निर्माण की प्रक्रिया को सीमित कर सकता है। इस्तीफे के बाद महाराष्ट्र में UCC तैयार करने की प्रक्रिया की पारदर्शिता और समिति के भीतर निर्णय लेने के तौर-तरीकों पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
कांग्रेस ने पूछा- क्या अलग-अलग राज्यों के अलग UCC होंगे?
जयराम रमेश ने इसी घटनाक्रम को आधार बनाकर एक व्यापक संवैधानिक सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या संविधान सभा ने कभी ऐसी व्यवस्था की कल्पना की थी, जिसमें देश का प्रत्येक राज्य अपनी अलग समान नागरिक संहिता तैयार करे। रमेश का तर्क है कि यदि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग UCC बनाए जाते हैं तो ‘समान’ नागरिक संहिता की मूल अवधारणा पर ही सवाल खड़ा होता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या संविधान निर्माताओं ने ऐसी स्थिति की कल्पना की थी जिसमें अलग-अलग राज्य अपनी राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप अलग UCC बनाने की दिशा में आगे बढ़ें।
2018 के विधि आयोग की रिपोर्ट का हवाला
कांग्रेस ने अपने तर्क के समर्थन में 21वें विधि आयोग के 2018 के परामर्श पत्र का भी उल्लेख किया है। जयराम रमेश के अनुसार, मोदी सरकार ने 17 जून 2016 को UCC के मुद्दे को विस्तृत अध्ययन के लिए विधि आयोग के पास भेजा था। विधि आयोग ने व्यापक विचार-विमर्श के बाद 31 अगस्त 2018 को ‘Reform of Family Law’ विषय पर परामर्श पत्र जारी किया था। कांग्रेस का कहना है कि उस दस्तावेज में आयोग ने उस समय देश में UCC लागू करना आवश्यक या वांछनीय नहीं माना था। विधि आयोग के पुराने UCC संबंधी दस्तावेज और परामर्श प्रक्रिया उसके आधिकारिक अभिलेखों में उपलब्ध हैं।
कांग्रेस का आरोप -सरकार ने विधि आयोग की राय नजरअंदाज की
रमेश ने आरोप लगाया कि जिस संस्था को केंद्र सरकार ने UCC के मुद्दे का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी थी, उसी के निष्कर्षों को बाद में सरकार ने नजरअंदाज कर दिया। कांग्रेस के मुताबिक, विधि आयोग ने व्यापक UCC की बजाय विभिन्न समुदायों के पारिवारिक कानूनों में मौजूद भेदभाव को दूर करने और कानूनों में सुधार करने पर जोर दिया था। यह कांग्रेस द्वारा 2018 के विधि आयोग के निष्कर्षों की प्रस्तुत व्याख्या है।
कई भाजपा-शासित राज्यों में अलग-अलग UCC
कांग्रेस ने पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न भाजपा या NDA-शासित राज्यों द्वारा UCC की दिशा में उठाए गए कदमों को भी अपने तर्क का आधार बनाया है। उत्तराखंड में UCC लागू हो चुका है और राज्य सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर इसके तहत जारी आदेश और संशोधन उपलब्ध हैं। कांग्रेस ने अपने बयान में गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में भी UCC संबंधी विधायी कदमों का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्यों में तैयार किए जा रहे कानून पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। पार्टी के अनुसार, इनके प्रावधानों, प्रक्रियाओं, दंड और छूटों में अंतर है।
उत्तराखंड मॉडल पर भी कांग्रेस के सवाल
जयराम रमेश ने उत्तराखंड के UCC को भी आलोचना के दायरे में रखा। कांग्रेस का आरोप है कि कानून में कुछ पितृसत्तात्मक परंपराएं अभी भी बनी हुई हैं और इसके अनुपालन से नागरिकों के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो रही हैं। दूसरी ओर, उत्तराखंड सरकार अपने UCC को व्यक्तिगत नागरिक मामलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा और समान अधिकारों की दिशा में कदम के रूप में प्रस्तुत करती है। राज्य के आधिकारिक UCC पोर्टल पर इसे सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत नागरिक मामलों में एकीकृत कानूनी ढांचे के रूप में वर्णित किया गया है।
2029 तक NDA शासित राज्यों में UCC का लक्ष्य
कांग्रेस ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की उस घोषणा को भी मुद्दा बनाया है, जिसके अनुसार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। हालिया रिपोर्टों में शाह के इस लक्ष्य का उल्लेख किया गया है। कांग्रेस का आरोप है कि NDA के अन्य घटक दलों की असहमति या अलग-अलग दृष्टिकोण को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। हालांकि, यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है; इसे एक स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कांग्रेस ने UCC को बताया ‘विभाजन और ध्यान भटकाने का हथियार’
अपने बयान में जयराम रमेश ने UCC को लेकर कांग्रेस की सबसे तीखी राजनीतिक आपत्ति सामने रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इसे व्यापक कानूनी सुधार और सर्वसम्मति बनाने की प्रक्रिया के बजाय राजनीतिक मुद्दे के रूप में इस्तेमाल कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि इतने संवेदनशील विषय पर कानून बनाने से पहले व्यापक सार्वजनिक विमर्श, विभिन्न समुदायों की भागीदारी और अधिकतम संभव सहमति जरूरी है। पार्टी ने आरोप लगाया कि मौजूदा प्रक्रिया इसके बजाय समाज में विभाजन और ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रही है।
UCC की बहस अब राज्य बनाम केंद्र से आगे
मौजूदा विवाद से UCC पर बहस के कई अलग-अलग पहलू सामने आते हैं- एक ओर समान नागरिक कानून की संवैधानिक अवधारणा, दूसरी ओर राज्यों द्वारा अपने-अपने कानून बनाने का सवाल; एक ओर व्यक्तिगत कानूनों में सुधार, तो दूसरी ओर धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता; और तीसरी ओर कानून बनाने की प्रक्रिया में सार्वजनिक भागीदारी और सहमति का प्रश्न। महाराष्ट्र समिति में जस्टिस आर.सी. चव्हाण का इस्तीफा इस बहस को एक नई दिशा देता है, क्योंकि विवाद अब केवल UCC लागू करने के पक्ष या विपक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सवाल बन गया है कि ऐसे कानून तैयार करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, सहभागी और व्यापक विचार-विमर्श पर आधारित होनी चाहिए।