हावड़ा के रंजन की अनूठी दास्तान

दोनों हाथ निष्प्रभावी, फिर भी पैरों के सहारे कैनवास पर उकेरी सपनों की दुनिया
Specially Abled Ranjan Kurmi Paints with Feet in Howrah
हाथ नहीं साथ दे रहें तो क्या पैरों से ही अपनी कला में रंग बिखेरते हैं रंजन कुर्मी
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निधि, सन्मार्ग संवाददाता

हावड़ा: कहते हैं कि हौसले बुलंद हों, तो शारीरिक अपंगता भी इंसान के कदमों को रोक नहीं सकती। हावड़ा के रहने वाले रंजन कुर्मी की जीवन यात्रा संघर्ष, अदम्य आत्मविश्वास और कला के प्रति अनन्य समर्पण की अद्भुत मिसाल है। जन्म से ही दोनों हाथ काम नहीं करने के बावजूद, रंजन पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से अपने पैरों से ब्रश और रंग पकड़कर मंत्रमुग्ध कर देने वाली चित्रकारी कर रहे हैं।

प्रदर्शनी और पुरस्कार मिले, पर रोजी-रोटी की जंग अब भी जारी

देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित चित्र प्रदर्शनियों में सराहना और ट्रॉफियां हासिल करने वाले रंजन के सामने आज जीविका चलाने का गंभीर संकट है। उनका कहना है कि अब केवल ट्रॉफियों और सम्मान-पत्रों से घर की रसोई नहीं चलती। वह बच्चों को चित्रकला सिखाकर होने वाली मामूली आय से ही अपने परिवार का गुजारा करते हैं और पेंटिंग का सामान खरीदते हैं। शुल्क में मामूली बढ़ोतरी करते ही कई बच्चे सीखना छोड़ देते हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और विकट हो जाती है।

ट्रॉफियों के बजाय ठोस रोजगार और कला शिक्षक की नौकरी की आस

रंजन रोज 7 से 8 घंटे अपने पैरों से लगनपूर्वक चित्र उकेरते हैं। उनका मानना है कि लोग उनकी शारीरिक स्थिति के बजाय उनकी कला के हुनर से उन्हें पहचानें। वह किसी से खैरात या केवल सहानुभूति नहीं चाहते, बल्कि सरकार से अपील करते हैं कि उन्हें किसी विद्यालय में चित्रकला शिक्षक (आर्ट टीचर) की नौकरी या कला को आगे बढ़ाने के लिए ठोस आर्थिक आधार दिया जाए।

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