देश के 192 अति-संवेदनशील वन्यजीव गलियारों में अब पेंच-कान्हा मॉडल की तर्ज पर अंडरपास, ओवरपास और इको-डक्ट बनाए जाएंगे
देश के 192 अति-संवेदनशील वन्यजीव गलियारों में अब पेंच-कान्हा मॉडल की तर्ज पर अंडरपास, ओवरपास और इको-डक्ट बनाए जाएंगे

192 संवेदनशील वन्यजीव गलियारों में बनेंगे अंडरपास और इको-डक्ट

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सन्मार्ग एक्सक्लूसिव

अंजलि भाटिया

नई दिल्ली :

देश में तेजी से बढ़ रहे हाईवे नेटवर्क के बीच वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए सरकार ने बड़ा फैसला किया है। देश के 192 अति-संवेदनशील वन्यजीव गलियारों में अब पेंच-कान्हा मॉडल की तर्ज पर अंडरपास, ओवरपास और इको-डक्ट बनाए जाएंगे। इन सुरक्षित रास्तों के बिना भविष्य की सड़क परियोजनाओं को वन मंजूरी मिलना मुश्किल होगा। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और भारतीय वन्यजीव संस्थान की पहल पर तैयार इस मॉडल में सड़क परियोजनाओं की योजना बनाते समय ही वन्यजीवों की आवाजाही का रास्ता तय किया जाएगा। जंगल के बीच सड़क बनाने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि बाघ, हाथी, तेंदुआ, हिरण जैसे वन्यजीव सुरक्षित तरीके से सड़क के दूसरी ओर पहुंच सकें। नई व्यवस्था के तहत सड़क परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) में वन्यजीवों के लिए सुरक्षित मार्ग और ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर का प्रावधान जरूरी होगा।

पेंच में अंडरपास बना वन्यजीवों की नई राह

एनएच-44 के पेंच-कान्हा कॉरिडोर में बनाए गए अंडरपास इस मॉडल की सफलता के उदाहरण हैं। पांच साल के कैमरा ट्रैप अध्ययन में पाया गया कि सुरक्षित मार्ग उपलब्ध होने के बाद बड़ी संख्या में वन्यजीव हाईवे पर आने के बजाय अंडरपास का इस्तेमाल करने लगे।90 फीसदी से ज्यादा वन्यजीव अब इन सुरक्षित रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं। पांच साल में 21 से अधिक प्रजातियों को इन अंडरपास से गुजरते हुए रिकॉर्ड किया गया। इनमें 31 से अधिक बाघ भी शामिल हैं। हिरण, सांभर, चीतल और नीलगाय जैसे शाकाहारी जीवों के साथ बाघ, तेंदुआ और भालू जैसे जानवर भी इन रास्तों का इस्तेमाल करते हैं। पहले हाईवे पर वन्यजीवों के सड़क हादसों की संख्या काफी अधिक थी। अंडरपास के साथ साउंड और लाल रोशनी जैसी व्यवस्थाओं ने वन्यजीवों को सड़क से दूर रखने में मदद की है।

देश के चार बड़े वन्यजीव कॉरिडोर

- राजाजी-कॉर्बेट, उत्तराखंड

शिवालिक क्षेत्र में हाथियों और बाघों की आवाजाही के लिए बेहद महत्वपूर्ण कॉरिडोर।

- दुधवा-कतर्नियाघाट-किशनपुर, उत्तर प्रदेश

नेपाल सीमा से लगे तराई क्षेत्र में बाघ, एक सींग वाले गैंडे और बारहसिंगा के लिए प्रमुख इलाका।

- रणथंभौर-मुकुंदरा हिल्स, राजस्थान

बाघ और तेंदुओं की आवाजाही के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर वन्यजीवों के लिए विशेष ओवरपास भी विकसित किया जा रहा है।

- काजीरंगा-कार्बी आंगलोंग, असम

हाथियों और गैंडों समेत कई वन्यजीवों की आवाजाही के लिए महत्वपूर्ण। यहां करीब 35 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड इको-कॉरिडोर भी विकसित किया जा रहा है।

दुनिया भी अपना रही सुरक्षित रास्ते

कनाडा के बैंफ नेशनल पार्क में ट्रांस-कनाडा हाईवे पर वन्यजीवों के लिए कई ओवरपास और अंडरपास बनाए गए हैं। नीदरलैंड्स में सैकड़ों इकोब्रिज बनाए गए हैं, जिनके जरिए जानवर बिना सड़क पर आए सुरक्षित तरीके से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जा सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया के क्रिसमस आइलैंड पर हर साल होने वाले लाखों लाल केकड़ों के प्रवास को सुरक्षित बनाने के लिए विशेष क्रैब ब्रिज और अंडरपास बनाए गए हैं।
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