भारत खेलों में अभी भी कुछ यादगार पलों तक ही सीमित

कभी ओलंपिक पदक, कभी ऐतिहासिक विश्व खिताब, कभी किसी दूर के मैदान में जोश भरा राष्ट्रगान कुछ पलों के लिए लाखों लोगों को एकजुट कर देता है, लेकिन जल्द ही तालियां थम जाती हैं।
सांकेतिक तस्वीर
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नयी दिल्ली : भारत खेलों के क्षेत्र में वर्षों से कुछ यादगार पलों का जश्न मनाने तक ही सीमित रहा है और यहां खेल संस्कृति का विकास होना अभी दूर की कौड़ी बनी हुई है। कभी ओलंपिक पदक, कभी ऐतिहासिक विश्व खिताब, कभी किसी दूर के मैदान में जोश भरा राष्ट्रगान कुछ पलों के लिए लाखों लोगों को एकजुट कर देता है, लेकिन जल्द ही तालियां थम जाती हैं। इसके बाद क्रिकेट पर फिर से सबकी नजरें टिक जाती हैं। IPL की नीलामी और प्रायोजन की होड़ सुर्खियों में छा जाती है। अन्य खेलों के खिलाड़ी चुपचाप मान्यता, सम्मान और अमूमन बुनियादी वित्तीय सुरक्षा के लिए अपना संघर्ष फिर से शुरू कर देते हैं।

यह कड़वी सच्चाई हाल ही में फिर से सामने आई। सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी की भारत की स्टार बैडमिंटन जोड़ी ने वैश्विक स्तर पर वर्षों तक सफलता हासिल करने के बावजूद देश में बैडमिंटन की उपलब्धियों का पर्याप्त रूप से जश्न न मनाए जाने पर निराशा व्यक्त की। इसके कुछ ही समय बाद शतरंज ग्रैंडमास्टर अभिजीत गुप्ता ने खुलासा किया कि एक आयोजक ने उनकी पुरस्कार राशि के भुगतान में देरी की। यहां तक ​​कि राष्ट्रीय महासंघ ने भी शुरू में हस्तक्षेप नहीं किया। इस साल जनवरी में ग्रेटर नोएडा में राष्ट्रीय बैडमिंटन प्रतियोगिता के दौरान, खिलाड़ियों को फर्श पर सोने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि महासंघ ने शुल्क का भुगतान नहीं किया था।

यहां तक ​​कि राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता के दौरान भी गोंडा में व्यवस्थाएं वैसी नहीं थीं जैसी होनी चाहिए थीं। यह अलग-अलग खेलों की अलग-अलग कहानियां हैं। यह कोई छिटपुट घटनाएं नहीं हैं। यह व्यापक खेल संस्कृति के अभाव के लक्षण हैं जिसमें अभी भी क्रिकेट से इतर अन्य खेलों की खिलाड़ियों को अस्थायी नायक माना जाता है। यह सच है कि भारत ने खेलों के क्षेत्र में प्रगति की है। सरकार समर्थित योजनाएं जैसे कि टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS), टारगेट एशियाई खेल ग्रुप और एसीटीसी कोष से खिलाड़ियों की तैयारी में क्रांतिकारी बदलाव आया है। वर्तमान समय में शीर्ष खिलाड़ी फिजियोथेरेपिस्ट, पोषण विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक और विदेशी कोच के साथ यात्रा करते हैं। एक दशक पहले ऐसी सुविधा नहीं थी।

लेकिन हम कुछ मुट्ठी भर खिलाड़ियों से खेल महाशक्ति नहीं बन सकते हैं। इसके लिए एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र तैयार करना होगा जिसमें प्रत्येक खेल में खिलाड़ियों की पहचान करना, उन्हें आगे बढ़ाना तथा चैंपियन बनने से काफी पहले और पदक जीतने के बाद काफी समय तक मदद करना शामिल हो। भारत में अभी इस तरह के पारिस्थितिकी तंत्र का अभाव है। चीन और अमेरिका के ओलंपिक में उत्कृष्ट प्रदर्शन का कारण यह है कि वहां एक ऐसी प्रणाली है जो खेल और खिलाड़ियों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। भारत में क्रिकेट के प्रति दीवानगी को समझना मुश्किल नहीं है। क्रिकेट ने टेलीविजन पर जल्द ही अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

उसने इस खेल में कई हस्तियों को जन्म दिया और व्यावसायिक रूप से बेहद आकर्षक बन गया। इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) ने क्रिकेटरों को हस्तियां बना दिया और खेल को मनोरंजन के ऐसे स्तर पर पहुंचा दिया जिसकी बराबरी कोई अन्य भारतीय महासंघ नहीं कर सका। क्रिकेट भारत का प्रमुख खेल इसलिए बन गया क्योंकि इसने एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाया जो कोई अन्य खेल नहीं बना सका। अब एक मध्यमवर्गीय भारतीय अभिभावक क्रिकेट से आजीविका की कल्पना कर सकता है लेकिन अन्य खेलों के मामले में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। एक बैडमिंटन खिलाड़ी सुपर 1000 का खिताब जीत सकता है, एक पहलवान विश्व चैंपियन बन सकता है, एक शतरंज खिलाड़ी कुलीन ग्रैंडमास्टर्स को हरा सकता है, लेकिन बड़े टूर्नामेंटों के बाहर वे चर्चा का विषय नहीं बन पाते हैं।

कई खेल महासंघ की मार्केटिंग सही तरह से नहीं हो पाती है। वे प्रशंसकों को जोड़ने में असमर्थ रहते हैं। कई संघ मुकदमों में उलझे रहते हैं और उनका संचालन अदालत द्वारा नियुक्त तदर्थ पैनल करते हैं। भारत की कॉर्पोरेट जगत की कंपनियां भी अब ज्यादातर ओलंपिक खेलों को दीर्घकालिक निवेश के अवसरों के बजाय दान के रूप में देखती हैं। ऐसे में परिवार खेल के जरिए अपने बच्चों के भविष्य को दांव पर लगाने के लिए व्यवस्था पर पर्याप्त भरोसा नहीं करते। सच कहें तो व्यवस्था ने उन्हें ऐसा न करने के कई कारण दिए हैं। अगर भारत सचमुच एक खेल महाशक्ति बनना चाहता है, तो देश को केवल बड़े बजट की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक बदलाव की जरूरत है। सबसे पहले भारत को खेल साक्षरता की जरूरत है। स्कूलों में शारीरिक शिक्षा को गणित या विज्ञान के समान ही गंभीरता से लिया जाना चाहिए। दूसरा भारत को जमीनी स्तर पर अच्छी प्रतियोगिताओं की जरूरत है। तीसरा खेल संघों को पेशेवर और जवाबदेह बनना होगा। चौथा भारत को बेहतर खेल मीडिया संस्कृति की भी जरूरत है।

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