द बोस फाइल्स — सच या साज़िश

राजेश गुप्ता की ऐतिहासिक फीचर फ़िल्म
द बोस फाइल्स — सच या साज़िश
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कोलकाता : भारत की आज़ादी के लगभग आठ दशक बीत जाने के बाद भी, स्वतंत्रता संग्राम का एक अध्याय आज तक देश की सामूहिक चेतना में जीवित है— नेताजी सुभाष चंद्र बोस का रहस्यमय लापता होना ।

क्या इतिहास ने हमें सब कुछ बताया है? या फिर कुछ ऐसे सवाल आज भी अनुत्तरित हैं, जो किसी के दोबारा पूछने की प्रतीक्षा कर रहे हैं?

भारतीय इतिहास के इसी सबसे चर्चित और रहस्यमय प्रसंग को केंद्र में रखकर निर्देशक राजेश गुप्ता (आईआईटीयन) लेकर आ रहे हैं ऐतिहासिक फीचर फ़िल्म ‘द बोस फाइल्स — सच या साज़िश’ । यह फ़िल्म सशक्त कथा-वाचन और समकालीन पड़ताल के माध्यम से नेताजी के लापता होने से जुड़े उन सवालों की तह तक जाने का प्रयास करती है, जिन्होंने पीढ़ियों से देश को उद्वेलित किया है।

दस्तावेज़ों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और विभिन्न ऐतिहासिक मान्यताओं व दावों के आधार पर फ़िल्म वर्ष 1945 में एक विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की प्रचलित धारणा से जुड़े प्रश्नों की पड़ताल करती है। साथ ही, सूचनाएँ छिपाए जाने के आरोपों तथा विभिन्न सरकारों और ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका से जुड़े सवालों को भी सामने लाती है।

इस यात्रा का उद्देश्य केवल एक ऐतिहासिक रहस्य को फिर से खोलना नहीं, बल्कि नेताजी के असाधारण व्यक्तित्व, उनके अदम्य साहस, उनके स्वप्नों और उनकी विरासत के प्रति जनमानस की रुचि को पुनः जागृत करना है। यह उन अनुत्तरित सवालों को भी नए सिरे से देखने का आमंत्रण है, जो आज तक नेताजी के नाम के साथ जुड़े हुए हैं।

फ़िल्म में प्रख्यात अभिनेता यतीन कार्येकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भूमिका में और अमित बहल एक ख़ुफ़िया ब्यूरो (आईबी) अधिकारी की भूमिका में नज़र आएँगे। वीरेंद्र सक्सेना, अखिलेंद्र मिश्रा, अपूर्वा अरोड़ा, आकाशदीप अरोड़ा, राजीव कुमार और काश्वी ग्रोवर भी फ़िल्म में प्रभावशाली चरित्र भूमिकाओं में दिखाई देंगे।

अनेक लेखकों के गहन शोध और अध्ययन से प्रेरित इस फ़िल्म को विस्तृत प्रमाणन प्रक्रिया के बाद केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाण-पत्र प्राप्त हुआ है। यह उपलब्धि फ़िल्म की बड़े पर्दे तक पहुँचने की यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।

इस परियोजना से पूर्व सिविल सेवक प्रशांत सिंघानिया रचनात्मक सलाहकार के रूप में जुड़े हैं। सार्वजनिक संस्थानों, ऐतिहासिक पड़ताल और नेताजी की विरासत के स्थायी महत्त्व से जुड़े विषयों पर उनका अनुभव फ़िल्म को एक विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान करता है।

फ़िल्म के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रशांत सिंघानिया कहते हैं:

“यह फ़िल्म एक ऐसे आदर्श को सामने लाने का सच्चा प्रयास है, जिसकी परिकल्पना एक स्वतंत्र भारत को अगले हज़ार वर्षों तक गौरवशाली देखने की थी। नेताजी को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाना, मानो उनकी आत्मा और उनके विचारों को पुनः जागृत करना है, ताकि देश का युवा उनसे प्रेरणा लेकर राष्ट्रहित के मार्ग पर आगे बढ़े। उन्हें योजनाबद्ध ढंग से विस्मृत करने के प्रयासों ने उस स्थान को जानबूझकर पैदा की गई औसतता से भर दिया है।”

दो पीढ़ियाँ, एक तलाश और सत्य तक पहुँचने का अदम्य संकल्प।

इस कहानी के केंद्र में हैं सत्य की खोज में जुटे दो दृढ़निश्चयी पात्र।

एक शोधकर्ता, जिसने दो दशकों से भी अधिक समय नेताजी के रहस्य की पड़ताल में लगा दिए हैं। वर्षों से लगभग अकेले ही वह उन सवालों के जवाब खोजने में जुटा है, जिनके उत्तर आज भी धुँधले हैं।

दूसरी ओर है एक युवा लड़की, जिसके भीतर सच को जानने की अदम्य जिज्ञासा है। वह नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है—एक ऐसी पीढ़ी, जो इतिहास को केवल स्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके अनकहे पहलुओं को समझना भी चाहती है।

दोनों की यात्राएँ एक ऐसे मोड़ पर आकर मिलती हैं, जहाँ जिज्ञासा संघर्ष बन जाती है, सवाल संकल्प में बदल जाते हैं और सत्य की तलाश साहस, धैर्य तथा न्याय की खोज की एक मार्मिक कहानी बन जाती है।

निर्देशक राजेश गुप्ता के लिए यह फ़िल्म उनके सिनेमाई सफ़र का एक और महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। उनकी पुरस्कार-विजेता लघु फ़िल्में ‘चड्डी बडीज़’ और ‘द फ्लैट’ को संयुक्त रूप से 12 पुरस्कार मिल चुके हैं। वहीं, उनकी हिंदी फीचर फ़िल्म ‘अनलॉक ज़िंदगी’ (2022) का चयन 13 अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में हुआ और उसे मिलान, मेक्सिको तथा बोस्टन में सर्वश्रेष्ठ कथात्मक फीचर फ़िल्म के पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

फ़िल्म के बारे में अपने विचार साझा करते हुए निर्देशक राजेश गुप्ता कहते हैं:

“यह फ़िल्म कभी भी केवल इतिहास को दोबारा देखने की कोशिश भर नहीं थी। इसका उद्देश्य उन सवालों को उठाना था, जिन्हें पीढ़ियाँ लगातार पूछती आई हैं, और ऐसी कहानी प्रस्तुत करना था, जो दर्शकों को सोचने, आत्ममंथन करने और स्वयं सत्य की पड़ताल करने के लिए प्रेरित करे। हर बाधा को पार करते हुए इस मुकाम तक पहुँचना हम सभी के लिए बेहद भावुक और अर्थपूर्ण क्षण है।”

‘द बोस फाइल्स — सच या साज़िश’ के माध्यम से रियल रील्स प्रोडक्शन नेताजी की असाधारण विरासत, ऐतिहासिक स्मृतियों की जटिलताओं और कठिन सवाल पूछने के महत्त्व पर एक नई राष्ट्रीय चर्चा को जन्म देना चाहता है।

यह फ़िल्म विशेष रूप से युवा पीढ़ी सहित हर उस दर्शक को आमंत्रित करती है, जो इतिहास को केवल सुनी-सुनाई बातों तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि उसके विभिन्न पहलुओं को समझना और उन प्रश्नों से रूबरू होना चाहता है, जो आज भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इस अध्याय को रहस्य, जिज्ञासा और विमर्श के केंद्र में बनाए हुए हैं।

क्योंकि नेताजी केवल इतिहास का एक नाम नहीं हैं। वे एक विचार हैं, एक संकल्प हैं और उस स्वतंत्र भारत के स्वप्न का प्रतीक हैं, जिसके लिए असंख्य देशवासियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

उनकी कहानी आज भी हमें पुकारती है। उनके सवाल आज भी हमारा पीछा करते हैं। और उनकी विरासत आज भी हमें सत्य की तलाश जारी रखने की प्रेरणा देती है।

द बोस फाइल्स — सच या साज़िश

इतिहास की जड़ों में छिपा एक रहस्य।

सत्य की तलाश में निकला एक संकल्प।

एक ऐसी विरासत, जो कभी धुँधली नहीं पड़ती।

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