कोलकाता की दुर्गा पूजा अब जर्मनी की AI चर्चा में, ThePujaApp बताएगा कैसे बदल रही है आस्था की डिजिटल तस्वीर

2013 में 10 पूजा पंडालों से शुरू हुआ सफर अब जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ एरफर्ट तक पहुंचा, 500 से ज्यादा पूजा की डिजिटल यादें सहेज चुका है ऐप
कोलकाता की दुर्गा पूजा अब जर्मनी की AI चर्चा में, ThePujaApp बताएगा कैसे बदल रही है आस्था की डिजिटल तस्वीर
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कोलकाता: कोलकाता की दुर्गा पूजा को देखने के लिए हर साल लाखों लोग शहर की सड़कों पर उतरते हैं। रोशनी, थीम, मूर्तियां, पंडाल और भीड़, सब मिलकर पूजा को ऐसा अनुभव बनाते हैं जिसे कुछ दिनों के बाद पीछे छोड़ना पड़ता है। पंडाल कुछ दिनों के लिए बनते हैं और फिर खत्म हो जाते हैं। लेकिन अब कोलकाता की इसी अस्थायी दुनिया को डिजिटल रूप में सहेजने वाला एक स्थानीय ऐप जर्मनी में धर्म, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर होने वाली अंतरराष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बनने जा रहा है।

कोलकाता की दुर्गा पूजा को 2013 से डिजिटल रूप में दर्ज कर रहा द पूजा ऐप 28 से 30 सितंबर के बीच जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ एरफर्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल होगा। सम्मेलन का विषय धर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में इंसान और मशीन के बदलते रिश्ते से जुड़ा है। यहां इस ऐप को सिर्फ दुर्गा पूजा के डिजिटल मार्गदर्शक के तौर पर नहीं, बल्कि इस बात के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है कि तकनीक धार्मिक अनुभव को कैसे सहेज और बदल सकती है।

10 पूजा से 500 से ज्यादा पंडालों तक

द पूजा ऐप की शुरुआत एक सरल विचार से हुई थी। ऐसे लोगों को कोलकाता की दुर्गा पूजा से जोड़ना, जो किसी कारण शहर में मौजूद नहीं रह सकते। खासतौर पर विदेशों में रहने वाले बंगाली समुदाय के लिए यह डिजिटल माध्यम एक तरह की वर्चुअल यात्रा बनकर सामने आया।

2013 में ऐप ने सिर्फ 10 पूजा पंडालों को डिजिटल रूप में दर्ज किया था। उस समय तकनीक भी आज जितनी आसान नहीं थी। पंडालों के खाली रहने के दौरान उनकी तस्वीरें और दृश्य रिकॉर्ड किए जाते थे, ताकि बाद में लोग बिना भीड़ के पूरे पंडाल को देख सकें।

समय के साथ तकनीक बेहतर होती गई और ऐप का संग्रह भी बढ़ता गया। अब इसके डिजिटल संग्रह में 500 से ज्यादा पूजा प्रतिष्ठानों की झलक मौजूद है। इनमें से कई ऐसे पंडाल भी हैं, जो अब जमीन पर मौजूद नहीं हैं। यानी जिन थीम, कलाकृतियों और सजावट को कुछ दिनों के बाद हटा दिया गया, उनकी डिजिटल मौजूदगी अब भी बनी हुई है। यही इस ऐप की सबसे खास भूमिका बन गई है। दुर्गा पूजा जहां हर साल बदलती है, वहीं उसका डिजिटल रिकॉर्ड उन बदलावों को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकता है।

महामारी ने बदल दी डिजिटल पूजा की तस्वीर

द पूजा ऐप के लिए बड़ा बदलाव कोरोना महामारी के दौरान आया। उस समय पूजा पंडालों तक लोगों की पहुंच सीमित थी और घर से पूजा देखने का चलन तेजी से बढ़ा। ऐसे में ऐप पर वर्चुअल पूजा देखने वालों की संख्या कई गुना बढ़ गई। ऐप से जुड़े लोगों के मुताबिक, महामारी के दौरान उसकी दर्शक संख्या पांच से छह गुना तक बढ़ी। इसके बाद इसके साथ जुड़ा समुदाय करीब चार लाख उपयोगकर्ताओं तक पहुंच गया।

इस बदलाव ने यह भी दिखाया कि डिजिटल माध्यम सिर्फ उन लोगों के लिए विकल्प नहीं है, जो कोलकाता से बाहर रहते हैं। यह उन लोगों के लिए भी एक रास्ता बन सकता है, जो भीड़ से बचना चाहते हैं, किसी खास पूजा को दोबारा देखना चाहते हैं या बीते वर्षों की पूजा की झलक अपने पास रखना चाहते हैं।

पंडाल समितियों के लिए भी यह एक तरह का डिजिटल अभिलेख बन गया। ऐप से जुड़ी पूजा समितियों को अलग क्यूआर कोड दिए जाते हैं, जिसके जरिए लोग उस पूजा के डिजिटल संग्रह तक पहुंच सकते हैं। इसका मतलब है कि पूजा खत्म होने के बाद भी उसकी कहानी पूरी तरह खत्म नहीं होती।

अब एआई भी जुड़ा, पंडाल सिर्फ देखने की चीज नहीं रहा

तकनीक के साथ द पूजा ऐप का प्रयोग भी आगे बढ़ा है। 2025 में इसमें एआई आधारित सेल्फी सुविधा जोड़ी गई थी। इसके जरिए लोग अपनी तस्वीर ऐप पर डालकर खुद को पसंदीदा पूजा पंडाल के डिजिटल परिवेश में देख सकते हैं।

इस सुविधा के पीछे एक व्यावहारिक समस्या थी। पूजा के दौरान भीड़ और तेज रोशनी के बीच मूर्ति और व्यक्ति की अच्छी तस्वीर लेना हमेशा आसान नहीं होता। ऐप ने इसी अनुभव को तकनीक के जरिए बदलने की कोशिश की। यहीं से द पूजा ऐप की भूमिका सिर्फ पूजा दिखाने वाले मंच से आगे जाती है। एक तरफ यह पुराने पंडालों को सुरक्षित रख रहा है, दूसरी तरफ नई तकनीक के जरिए लोगों को उन पंडालों के साथ अलग तरीके से जोड़ रहा है। यानी तकनीक यहां सिर्फ रिकॉर्ड बनाने का काम नहीं कर रही, बल्कि अनुभव को दोबारा तैयार भी कर रही है।

जर्मनी में उठेगा बड़ा सवाल: जब आस्था डिजिटल हो तो अनुभव कितना बदलता है?

यूनिवर्सिटी ऑफ एरफर्ट में होने वाली अंतरराष्ट्रीय चर्चा का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है। द पूजा ऐप को ‘गॉड, ह्यूमन, मशीन : इमेजेस एंड इमेजिनरीज ऑफ रिलिजन इन द एज ऑफ एआई’ नाम के सम्मेलन में आमंत्रित किया गया है। वहां यह सवाल सिर्फ नहीं होगा कि किसी धार्मिक स्थल या उत्सव को वर्चुअल तरीके से कैसे देखा जा सकता है।

बात इससे आगे जाएगी। जब कोई व्यक्ति असली पंडाल में मौजूद नहीं है, लेकिन अपने फोन या आभासी वास्तविकता के माध्यम से उस जगह को देख रहा है, तो उसका धार्मिक और भावनात्मक अनुभव कितना बदल जाता है? जब एआई किसी व्यक्ति को उसकी तस्वीर के जरिए पूजा के डिजिटल वातावरण में शामिल करता है, तो क्या वह सिर्फ तकनीकी सुविधा है या धार्मिक अनुभव का नया रूप?

यही वे सवाल हैं, जिन पर सम्मेलन में चर्चा होनी है। द पूजा ऐप इस चर्चा में अकेला नहीं होगा। एरफर्ट में इसे धर्म और कला से जुड़े दूसरे डिजिटल प्रोजेक्ट के साथ भी प्रस्तुत किया जाएगा। एक विशेष परिचर्चा में धार्मिक कला और डिजिटल तकनीक पर काम करने वाले लोग शामिल होंगे। इसके अलावा आभासी वास्तविकता से जुड़े प्रदर्शन में भी ऐप को दिखाया जाएगा।

कोलकाता के पंडालों को मिली दूसरी जिंदगी

दुर्गा पूजा की सबसे खूबसूरत चीजों में से एक उसकी अस्थायी प्रकृति है। हर साल नए पंडाल बनते हैं, नई थीम आती है, नई मूर्तियां तैयार होती हैं और कुछ दिनों बाद सब कुछ हटा दिया जाता है। शायद यही वजह है कि द पूजा ऐप की कहानी सिर्फ तकनीक की कहानी नहीं है। यह यादों को बचाने की कहानी भी है।

जो पंडाल आज सड़क पर है, वह कुछ दिनों बाद नहीं होगा। लेकिन उसकी तस्वीर, उसका डिजिटल भ्रमण और उससे जुड़ी जानकारी वर्षों बाद भी देखी जा सकती है। किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जो कोलकाता से हजारों किलोमीटर दूर रहता है, यह सिर्फ एक वेबसाइट या ऐप नहीं, बल्कि शहर और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का एक माध्यम हो सकता है। और अब वही स्थानीय डिजिटल परियोजना जर्मनी में धर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य पर होने वाली वैश्विक चर्चा का हिस्सा बनने जा रही है।

कोलकाता की दुर्गा पूजा ने हमेशा अपनी कला और भव्यता से दुनिया का ध्यान खींचा है। इस बार कहानी थोड़ी अलग है। इस बार पूजा के पंडाल खुद वहां नहीं जाएंगे, लेकिन उनकी डिजिटल दुनिया जर्मनी तक पहुंचेगी। कुछ दिनों में मिट जाने वाले पंडालों को तकनीक ने एक ऐसी जिंदगी दे दी है, जो विसर्जन के बाद भी खत्म नहीं होती।

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