

कोलकाता: दुर्गापूजा कोलकाता के लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि कला, संस्कृति, आस्था और सामूहिक उत्सव का अनुभव है। हर साल शहर के पंडाल अपनी थीम, शिल्पकारी, रोशनी और प्रतिमा के जरिए लोगों को आकर्षित करते हैं। लोग घंटों कतार में खड़े रहते हैं, लंबी दूरी तय करते हैं और परिवार के साथ पंडाल-दर्शन की योजना बनाते हैं। लेकिन जब यही उत्साह बेकाबू भीड़ में बदल जाए, रास्ते लोगों से भर जाएं और सुरक्षा व्यवस्था हालात संभालने में नाकाम दिखाई दे, तो उत्सव की चमक एक भयावह तस्वीर में बदल सकती है।
उत्तर कोलकाता के चोरबागान सार्वजनिन दुर्गोत्सव में शनिवार, 17 अक्टूबर की शाम ऐसा ही हुआ। अपनी 91वीं दुर्गापूजा और ‘बियॉन्ड साउंड’ यानी ‘शोर से परे’ की कलात्मक अवधारणा के कारण चर्चा में रहा यह पंडाल अचानक भगदड़ की त्रासदी से जुड़ गया। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, हादसे में 19 लोगों की मौत हुई और 25 लोग घायल हुए। जिन लोगों ने मां दुर्गा के दर्शन और शहर की मशहूर पूजा का अनुभव लेने के लिए घर से कदम निकाला था, उनमें से कई के लिए यह शाम जिंदगी की आखिरी यात्रा बन गई।
इस घटना ने सिर्फ एक पूजा समिति की व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि कोलकाता की पंडाल संस्कृति में बढ़ती भीड़, नागरिक जिम्मेदारी, आयोजकों की तैयारी और प्रशासन की जवाबदेही पर भी गंभीर बहस खड़ी कर दी है।
चोरबागान सार्वजनिन दुर्गोत्सव समिति इस वर्ष अपनी 91वीं पूजा मना रही थी। मध्य कोलकाता के व्यस्त क्षेत्र में स्थित यह पूजा हर साल पंडाल-दर्शन करने वालों का ध्यान खींचती है। राम मंदिर और चित्तरंजन एवेन्यू के आसपास, राधा माधव साहा लेन के इलाके में स्थित इस पंडाल तक पहुंचने के लिए महात्मा गांधी रोड मेट्रो स्टेशन भी नजदीकी विकल्प है।
इस वर्ष पूजा की खासियत थी इसकी थीम ‘बियॉन्ड साउंड’, जिसे कलाकार सुशांत सिबानी पॉल ने परिकल्पित किया। विचार था शहर के लगातार शोर, भागदौड़ और तनाव से अलग एक ऐसा वातावरण तैयार करना, जहां श्रद्धालु कुछ पल ठहरकर शांति, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक अनुभूति से जुड़ सकें। यानी जिस जगह का संदेश था बाहरी शोर से परे जाकर मन की शांति तलाशना, वहीं कुछ ही दिनों बाद अफरा-तफरी और चीख-पुकार की खबरें सामने आईं। यह विरोधाभास इस त्रासदी को और भी बेचैन करने वाला बनाता है।
चोरबागान की इस वर्ष की थीम का उद्देश्य सिर्फ आकर्षक सजावट तैयार करना नहीं था। इसमें ध्वनि, रोशनी, सामग्री और स्थान के संयोजन से एक अलग वातावरण रचने की कोशिश की गई थी। देवी दुर्गा को केंद्र में रखते हुए पंडाल की प्रस्तुति ऐसी रखी गई कि श्रद्धालु रोजमर्रा के शहरी शोर से अलग एक शांत और आध्यात्मिक अनुभव महसूस कर सकें।
कलात्मक दृष्टि से यह विचार समकालीन दुर्गापूजा की उस परंपरा का हिस्सा है, जिसमें पंडाल केवल देवी-दर्शन की जगह नहीं रहता, बल्कि एक अवधारणा को अनुभव कराने वाला कलात्मक परिसर बन जाता है। कलाकारों के लिए चुनौती होती है कि वे सीमित जगह, विभिन्न सामग्रियों और रोशनी के सहारे दर्शकों को एक अलग दुनिया में ले जाएं।
चोरबागान की लोकप्रियता के पीछे भी यही आकर्षण था—एक ओर पारंपरिक धार्मिक आयोजन, दूसरी ओर नई कलात्मक सोच। लेकिन किसी भी थीम की सफलता सिर्फ उसके दृश्य प्रभाव से नहीं मापी जा सकती। हजारों लोगों को आकर्षित करने वाला आयोजन तभी पूरी तरह सफल माना जा सकता है, जब उसकी सुरक्षा व्यवस्था भी उतनी ही सुविचारित हो।
चोरबागान का भौगोलिक स्थान इस घटना को समझने में अहम है। यह पंडाल ऐसे इलाके में स्थित है, जहां संकरी गलियां और सीमित रास्ते आवाजाही को प्रभावित करते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, कई जगह एक समय में केवल तीन से चार लोग ही अगल-बगल चल सकते हैं। ऐसे रास्तों में सामान्य दिनों में भी आवागमन की अपनी चुनौतियां होती हैं; त्योहार के दौरान हजारों लोगों का एक साथ पहुंचना स्थिति को और जटिल बना देता है।
पंडाल की लोकप्रियता के कारण शाम के समय बड़ी संख्या में लोग वहां जमा हुए थे। शनिवार को शाम करीब 7 से 8 बजे के बीच स्थिति बिगड़ने की बात सामने आई। इसी दौरान बारिश शुरू हुई और आशंका जताई गई कि लोग पानी से बचने के लिए एक साथ पंडाल की ओर बढ़ने लगे। पहले से मौजूद भीड़ के बीच अचानक हुई इस हलचल ने दबाव बढ़ा दिया।
जब किसी संकरे रास्ते पर पीछे से लोग आगे बढ़ते रहें और सामने मौजूद लोगों के पास निकलने की जगह न हो, तो कुछ ही क्षणों में स्थिति खतरनाक हो सकती है। भीड़ में एक व्यक्ति के गिरने से उसके पीछे चल रहे कई लोग भी संतुलन खो सकते हैं। ऐसे हालात में बाहर निकलने का रास्ता खोजने की कोशिश खुद भीड़ के दबाव को बढ़ा सकती है।
प्रारंभिक जानकारी में यही आशंका सामने आई कि बारिश, भीड़ का अचानक बढ़ना और रास्तों पर दबाव एक साथ मिलकर हादसे की वजह बने। हालांकि, इन परिस्थितियों में किसकी कितनी जिम्मेदारी थी, इसका निर्धारण जांच के बाद ही हो सकेगा।
हादसे के बाद सामने आई शुरुआती जानकारी में लाउडस्पीकर पर की गई एक घोषणा और निजी सुरक्षा कर्मियों की सीटियों का भी जिक्र हुआ। पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि क्या इनसे लोगों के बीच भ्रम और घबराहट फैली।
रिपोर्टों के अनुसार, पंडाल की स्थिति खराब होने और उसके गिरने की आशंका जताने वाली घोषणा की जांच की जा रही है। यदि पहले से भरी जगह में लोगों को अचानक यह संदेश मिले कि संरचना गिर सकती है, तो वे स्वाभाविक रूप से सुरक्षित जगह की ओर भागने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन जब सभी लोग एक ही दिशा में निकलना चाहें और रास्ता संकरा हो, तो यह कोशिश जानलेवा दबाव पैदा कर सकती है।
यहां सवाल सिर्फ घोषणा करने वाले व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे आपातकालीन संचार तंत्र का है। भीड़ नियंत्रण के दौरान संदेश स्पष्ट, प्रमाणित और समन्वित होना चाहिए। गलत या अस्पष्ट सूचना लोगों को शांत करने के बजाय उन्हें और भयभीत कर सकती है। पुलिस की शुरुआती जांच में यह भी सामने आया कि मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों और निजी सुरक्षा कर्मियों की संख्या पर्याप्त नहीं थी। प्रत्यक्षदर्शियों ने भी भीड़ प्रबंधन, प्रवेश और निकास के रास्तों तथा आपातकालीन व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों की जांच जारी है।
दुर्गापूजा के दौरान पंडाल-दर्शन को लेकर उत्साह स्वाभाविक है। लोकप्रिय पूजा देखने की इच्छा में लोग लंबी कतारों में खड़े रहते हैं और भीड़ के बावजूद आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन त्योहार का आनंद तभी तक सुरक्षित है, जब तक व्यक्तिगत उत्साह दूसरों की सुरक्षा पर भारी न पड़ने लगे।
भीड़ में धक्का देना, कतार तोड़कर आगे बढ़ना, निकास के रास्ते पर रुकना, पुलिस या स्वयंसेवकों के निर्देशों की अनदेखी करना और किसी अफवाह पर बिना सोचे प्रतिक्रिया देना खतरनाक हो सकता है। किसी पंडाल में पहुंच जाना उपलब्धि नहीं है, अगर वहां तक पहुंचने की कोशिश किसी दूसरे व्यक्ति के लिए खतरा बन जाए।
यही वह जगह है, जहां नागरिक समझ की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सार्वजनिक स्थानों पर हमारी जिम्मेदारी केवल अपनी सुविधा तक सीमित नहीं होती। हमें यह भी ध्यान रखना होता है कि हमारे व्यवहार से दूसरे लोगों की आवाजाही और सुरक्षा प्रभावित न हो।
हालांकि, चोरबागान की त्रासदी को केवल आम लोगों की लापरवाही बताकर आयोजकों और प्रशासन की जिम्मेदारी से ध्यान नहीं हटाया जा सकता। जब किसी पूजा की लोकप्रियता और भीड़ का अनुमान पहले से हो, तो केवल दर्शकों से अनुशासन की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं है। प्रवेश नियंत्रित करना, कतारों को व्यवस्थित रखना, निकास खुला रखना और भीड़ बढ़ने पर लोगों को सुरक्षित तरीके से रोकना आयोजकों तथा संबंधित अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है।
नागरिक समझ और प्रशासनिक तैयारी एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं। दोनों की जरूरत है।
कोलकाता की दुर्गापूजा ने वर्षों में कला और सामुदायिक भागीदारी के जरिए वैश्विक पहचान बनाई है। पंडालों में हर साल नए प्रयोग होते हैं। कहीं ऐतिहासिक स्थापत्य की झलक मिलती है, कहीं लोककला को नया रूप दिया जाता है, तो कहीं सामाजिक मुद्दों पर संदेश दिया जाता है।
लेकिन बड़े और लोकप्रिय पंडालों की सफलता के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। किसी थीम की योजना बनाते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि पंडाल कैसा दिखेगा, उसकी रोशनी कैसी होगी या लोग उसे देखने के लिए कितनी दूर से आएंगे। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि एक समय में कितने लोग अंदर रह सकते हैं, प्रवेश और निकास की दिशा क्या होगी, बारिश होने पर लोग कहां जा सकेंगे और आपात स्थिति में बचाव दल किस रास्ते से पहुंचेगा।
चोरबागान की घटना ने इन सवालों को फिर सामने ला दिया है। यदि किसी आयोजन का स्थान संकरी गलियों में है, तो भीड़ की सीमा, कतारों की लंबाई और आपातकालीन निकासी की योजना पहले से तय होनी चाहिए। सुरक्षा कर्मियों और स्वयंसेवकों को भीड़ के व्यवहार, आपात संदेश और निकासी प्रक्रिया का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।
सिर्फ सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी भी पर्याप्त नहीं होती। उन्हें सही जगह पर तैनात करना, उनकी भूमिका स्पष्ट रखना और पुलिस, आयोजकों तथा चिकित्सा दल के बीच समन्वय बनाना जरूरी है। आपात स्थिति में एक गलत निर्देश या देर से लिया गया फैसला हालात बिगाड़ सकता है।
हादसे के बाद पुलिस ने आयोजकों और निजी सुरक्षा एजेंसी से जुड़े लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की। 18 अक्टूबर की रिपोर्टों के मुताबिक, सात लोगों की गिरफ्तारी की खबर सामने आई और पुलिस ने गैर-इरादतन हत्या से संबंधित मामला दर्ज किया। घटना की परिस्थितियों की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किए जाने की भी जानकारी दी गई है।
जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि पंडाल में प्रवेश और निकास के लिए क्या व्यवस्था थी, भीड़ की निगरानी कैसे की जा रही थी, कितने सुरक्षा कर्मी तैनात थे और आपातकालीन चिकित्सा सहायता के क्या इंतजाम थे। साथ ही, कथित घोषणा किसने की, वह किस परिस्थिति में की गई और उससे पहले भीड़ को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए गए—इन सवालों के जवाब जरूरी हैं।
जिम्मेदारी तय करना केवल किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराने का मामला नहीं है। यह समझना भी जरूरी है कि क्या व्यवस्था में ऐसी कमियां थीं, जिन्हें समय रहते दूर किया जा सकता था। यदि सुरक्षा योजना, प्रवेश नियंत्रण या आपातकालीन निकासी में चूक हुई, तो भविष्य के आयोजनों में उसे दोहराने से रोकने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
चोरबागान की त्रासदी ने कोलकाता की पंडाल संस्कृति के सामने एक असहज सवाल रखा है: क्या हम किसी पूजा की सफलता को केवल उसकी लोकप्रियता, भीड़ और दृश्य भव्यता से मापने लगे हैं? दुर्गापूजा की आत्मा सामूहिकता, आस्था और आनंद में है। किसी पंडाल में हजारों लोगों का पहुंचना उसकी लोकप्रियता का संकेत हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में सफलता का प्रमाण नहीं है। यदि उसी भीड़ को सुरक्षित रखना संभव न हो, तो आयोजन की व्यवस्थाओं पर गंभीरता से विचार करना ही होगा।
‘बियॉन्ड साउंड’ का संदेश था शोर से परे जाकर शांति का अनुभव करना। लेकिन चोरबागान में हुई त्रासदी ने दिखाया कि वास्तविक शांति केवल कलात्मक प्रस्तुति से नहीं आती। वह तब आती है, जब लोगों को भरोसा हो कि वे सुरक्षित हैं, रास्ते खुले हैं, निर्देश स्पष्ट हैं और संकट के समय कोई व्यवस्था उन्हें संभालने के लिए तैयार है।
अब सबसे जरूरी है कि हादसे के पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय मिले, जांच तथ्यों के आधार पर पूरी हो और भविष्य के आयोजनों में सुरक्षा को सजावट के बाद की औपचारिकता न माना जाए। क्योंकि मां दुर्गा के दर्शन के लिए निकला कोई भी व्यक्ति घर लौटने की उम्मीद के साथ निकलता है—और उस उम्मीद की रक्षा करना आयोजकों, प्रशासन और समाज, तीनों की जिम्मेदारी है।