दीपावली का उजाला प्रदूषण के अंधकार में न खो जाए

Diwali
दिवाली प्रदूषण
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प्रकाश, उल्लास, आत्मीयता और सामाजिक मेलजोल

दीपावली भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसमें प्रकाश, उल्लास, आत्मीयता और सामाजिक मेलजोल का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। घरों में दीप जलते हैं, आंगन में रंगोली सजती है, मंदिरों में पूजा होती है और लोग अपने मित्रों, रिश्तेदारों तथा बच्चों के बीच मिठाइयां और उपहार बांटकर खुशियां साझा करते हैं। दीपावली केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और नकारात्मकता पर सकारात्मकता की विजय का प्रतीक है। लेकिन इस उत्सव का एक दूसरा पक्ष भी है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस पर्व का समापन प्रकाश और प्रसन्नता के साथ होना चाहिए, उसका एक बड़ा हिस्सा हम अपने पर्यावरण में धुआं, जहरीले कण और कचरा छोड़कर समाप्त करते हैं।

आतिशबाजी का धुआं

दीपावली के अवसर पर कई दिनों तक चलने वाली आतिशबाजी वातावरण की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। पटाखों से निकलने वाला धुआं केवल कुछ समय के लिए दिखाई देने वाला धुआं नहीं होता, बल्कि उसमें मौजूद सूक्ष्म कण और रासायनिक प्रदूषक मानव स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं। पटाखों में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न रासायनिक पदार्थों के जलने से सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और धातुओं के सूक्ष्म कण वातावरण में पहुंचते हैं। इनके साथ पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे प्रदूषक हवा में घुल जाते हैं। पीएम 2.5 के कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि सांस के साथ फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंच सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में रक्तप्रवाह तक में प्रवेश कर सकते हैं।

असर केवल महानगरों तक सीमित नहीं

दीपावली के बाद अनेक शहरों में वायु गुणवत्ता खराब होने और धुंध बढ़ने की समस्या सामने आती है। आतिशबाजी से निकले धुएं और पहले से मौजूद प्रदूषण के मिलने से वातावरण में प्रदूषकों का स्तर बढ़ सकता है। इसका असर केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों में भी महसूस किया जाता है। अन्य शहरी क्षेत्रों में दीपावली के बाद हवा की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। हवा में प्रदूषकों की अधिकता से दृश्यता कम होती है और सांस लेने में परेशानी बढ़ती है।

वायु प्रदूषण और श्वसन संक्रमण

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायु प्रदूषण का संबंध हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और श्वसन संक्रमण जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से है।  दीपावली के दौरान प्रदूषण का तत्काल प्रभाव आंखों में जलन, गले में खराश, खांसी, सांस लेने में कठिनाई और एलर्जी के रूप में दिखाई दे सकता है। दमा और ब्रोंकाइटिस से पीड़ित लोगों के लिए यह स्थिति अधिक गंभीर हो सकती है। पहले से हृदय और फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोगों को भी अतिरिक्त परेशानी का सामना करना पड़ता है।

नवजात, बच्चे और बुजुर्ग

बच्चे, बुजुर्ग और नवजात इस प्रदूषण के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। बच्चों के फेफड़े विकसित होने की प्रक्रिया में होते हैं। ऐसे में प्रदूषित हवा उनके स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है। बुजुर्गों में पहले से मौजूद सांस और हृदय संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसलिए दीपावली के नाम पर होने वाली आतिशबाजी को केवल व्यक्तिगत पसंद या मनोरंजन का विषय मानना उचित नहीं है। इसका असर उन लोगों पर भी पड़ता है, जो स्वयं पटाखे नहीं जलाते।

आतिशबाजी से निकलने वाले रासायनिक पदार्थों में बेरियम, स्ट्रॉन्शियम, तांबा, एल्युमिनियम और अन्य धातुओं के यौगिक इस्तेमाल किए जा सकते हैं। अलग-अलग पटाखों की रासायनिक संरचना अलग होती है। इनके जलने के बाद कुछ पदार्थ हवा में सूक्ष्म कणों के रूप में फैलते हैं और कुछ अवशेष जमीन पर जमा हो जाते हैं। बारिश या पानी के बहाव के साथ ये पदार्थ मिट्टी और जलस्रोतों तक पहुंच सकते हैं। इस तरह आतिशबाजी का असर केवल वायुमंडल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पर्यावरण के दूसरे घटकों को भी प्रभावित कर सकता है।

ध्वनि प्रदूषण भी एक गंभीर समस्या

दीपावली के दौरान ध्वनि प्रदूषण भी एक गंभीर समस्या बन जाता है। तेज आवाज वाले पटाखों के विस्फोट से कानों पर अचानक तीव्र ध्वनि का दबाव पड़ता है। बहुत तेज आवाज से सुनने की क्षमता को स्थायी नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। इसके अलावा तेज आवाज से घबराहट, बेचैनी, नींद में बाधा और तनाव जैसी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। हृदय रोगियों, उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों, छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए लगातार होने वाले धमाके विशेष रूप से कष्टदायक होते हैं।

इसका असर केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है। पशु-पक्षियों के लिए भी आतिशबाजी का शोर भय और तनाव का कारण बनता है। पालतू कुत्ते-बिल्लियां तेज आवाज से घबरा जाते हैं। पक्षियों की सामान्य गतिविधियां बाधित होती हैं। कई बार वे भयभीत होकर अपने ठिकानों से उड़ जाते हैं और दुर्घटनाओं का शिकार हो सकते हैं। प्रकृति के साथ सहअस्तित्व भारतीय संस्कृति के मूल विचारों में शामिल रहा है। ऐसे में हमारे उत्सवों का स्वरूप ऐसा होना चाहिए, जिसमें मनुष्य के साथ दूसरे जीवों की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाए।

कचरा

पटाखों का एक अन्य दुष्परिणाम दीपावली के बाद दिखाई देने वाले कचरे के रूप में सामने आता है। सड़कों, गलियों, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर जले हुए पटाखों के अवशेष, कागज, प्लास्टिक, गत्ते और अन्य सामग्री बिखरी रहती है। कई जगहों पर यह कचरा कई दिनों तक पड़ा रहता है। सफाई कर्मचारियों को इसे हटाने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। जले हुए पटाखों के अवशेषों में मौजूद रासायनिक पदार्थ मिट्टी और पानी को प्रभावित कर सकते हैं। प्लास्टिक और गैर-जैव अपघटनीय सामग्री पर्यावरण में लंबे समय तक बनी रहती है।

दीपावली की सफाई सिर्फ घर तक सीमित न हो

यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठता है कि जिस त्योहार में हम घरों की सफाई करते हैं, उसे मनाने के बाद सार्वजनिक स्थानों को गंदा छोड़ देना कैसी उत्सवधर्मिता है ? अपने घर के आंगन को साफ रखना और सड़क, मोहल्ले तथा सार्वजनिक स्थानों को कचरे से भर देना सामाजिक जिम्मेदारी की भावना के विपरीत है। दीपावली की सफाई तभी सार्थक होगी, जब उसका विस्तार हमारे आसपास के पूरे परिवेश तक हो।

पटाखों से आग लगने की घटनाएं भी चिंता का विषय हैं। असावधानी से पटाखे जलाने पर कपड़ों, दुकानों, वाहनों और घरों में आग लग सकती है। आंखों और हाथों में चोट लगने की घटनाएं भी सामने आती हैं। बच्चों के हाथों में तेज विस्फोट वाले पटाखे देना विशेष रूप से खतरनाक है। दीपावली के उल्लास में सुरक्षा संबंधी सावधानियों की अनदेखी कई बार पूरे परिवार के लिए दुखद अनुभव बन जाती है।

दीपावली की मूल भावना

यह समझना भी जरूरी है कि पर्यावरण संरक्षण का अर्थ परंपराओं और खुशियों का विरोध करना नहीं है। दीपावली की मूल भावना प्रकाश, सद्भाव और खुशियों को साझा करने में है, न कि अधिक से अधिक पटाखे जलाने में। मिट्टी के दीये जलाकर, घरों को प्राकृतिक सजावट से सजाकर, रंगोली बनाकर, जरूरतमंद परिवारों के बीच मिठाइयां और उपहार बांटकर भी इस पर्व को उतने ही उत्साह से मनाया जा सकता है। स्थानीय कारीगरों से मिट्टी के दीये खरीदना परंपरा को जीवित रखने के साथ उनकी आजीविका को भी सहारा देता है। इस तरह दीपावली सामाजिक सरोकार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ सकती है।

त्योहारों की सार्थकता

दरअसल, दीपावली का अर्थ केवल घरों को रोशन करना नहीं, बल्कि जीवन और समाज में प्रकाश फैलाना भी है। यदि हमारी खुशियों के कारण किसी बीमार व्यक्ति की सांसें मुश्किल हो जाएं, किसी बुजुर्ग की नींद छिन जाए, किसी बच्चे के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़े और पशु-पक्षी भयभीत हों, तो हमें अपने उत्सव के तौर-तरीकों पर पुनर्विचार करना चाहिए। त्योहारों की सार्थकता दूसरों को कष्ट पहुंचाने में नहीं, बल्कि सबके साथ खुशियां बांटने में है।

आज जरूरत है कि हम पटाखों के आकर्षण से आगे बढ़कर दीपावली की मूल भावना को समझें। एक ऐसी दीपावली की कल्पना करें, जिसमें मिट्टी के दीयों का प्रकाश हो, घरों में आत्मीयता हो, जरूरतमंदों के चेहरे पर मुस्कान हो और वातावरण में स्वच्छ हवा हो। आतिशबाजी के शोर की जगह बच्चों की हंसी सुनाई दे और सड़कों पर कचरे के ढेर की जगह स्वच्छता दिखाई दे। दीपावली खुशियों और प्रकाश का पर्व है। इसे प्रदूषण, बीमारी और दुर्घटनाओं का कारण बनाने से बचना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। आइए, इस अवसर पर पटाखामुक्त अथवा न्यूनतम आतिशबाजी वाली दीपावली का संकल्प लें। अपने मित्रों, रिश्तेदारों और समाज के दूसरे लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करें। आखिरकार, दीपावली का असली प्रकाश आसमान में कुछ क्षणों के लिए चमकने वाली आतिशबाजी में नहीं, बल्कि उस संवेदना में है, जो मनुष्य को मनुष्य और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार बनाती है। आइए, दीप जलाएं, खुशियां बांटें, प्रदूषण नहीं। दीपावली को सचमुच प्रकाशोत्सव बनाएं। (युवराज)कुमार कृष्णन

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