

भारत में दीपावली केवल एक दिन का त्योहार नहीं है। इसकी शुरुआत पांच दिनों तक चलने वाले पर्वों की शृंखला से होती है। इसी शृंखला का पहला दिन धनतेरस कहलाता है। इसे धनत्रयोदशी और धन्वंतरि त्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, धनतेरस कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। 'धनतेरस' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें 'धन' का अर्थ संपत्ति और 'तेरस' का अर्थ तेरहवां दिन है। यानी यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि का पर्व है।
वर्ष 2026 में धनतेरस 6 नवंबर, शुक्रवार को मनाया जा रहा है। इस दिन से दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव की शुरुआत होती है। धनतेरस के बाद नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज मनाई जाती है।
धनतेरस को मुख्य रूप से धन, स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है। घरों में दीपक जलाए जाते हैं और नई वस्तुएं खरीदना शुभ माना जाता है।
धनतेरस का धार्मिक महत्व समझने के लिए समुद्र मंथन की पौराणिक कथा जानना जरूरी है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय देवताओं की शक्ति कमजोर पड़ गई थी। देवता अपनी शक्ति और वैभव वापस पाने के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे। इसके बाद देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने का निर्णय लिया। इस मंथन का उद्देश्य अमृत प्राप्त करना था, जिससे अमरत्व हासिल किया जा सके।
समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकी को रस्सी बनाया गया। देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया। मान्यता है कि इस प्रक्रिया में एक के बाद एक चौदह रत्न प्रकट हुए। इन्हीं रत्नों में माता लक्ष्मी और भगवान धन्वंतरि का भी प्राकट्य हुआ।
कथा के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत से भरा कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए थे। उन्हें देवताओं का वैद्य और आयुर्वेद का अधिष्ठाता माना जाता है। भगवान धन्वंतरि के हाथ में अमृत कलश होने का संबंध स्वास्थ्य, आरोग्य और दीर्घायु से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है। इस दिन लोग केवल धन-संपत्ति ही नहीं, बल्कि अच्छे स्वास्थ्य और निरोगी जीवन की भी कामना करते हैं।
धनतेरस की सबसे लोकप्रिय परंपराओं में सोना, चांदी और नए बर्तन खरीदना शामिल है। इस दिन बाजारों में विशेष रौनक देखने को मिलती है। लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के, पीतल, तांबे और स्टील के बर्तन तथा घर के लिए अन्य उपयोगी सामान खरीदते हैं।
इसके पीछे धार्मिक मान्यता है कि धनतेरस पर खरीदी गई नई वस्तुएं घर में सुख-समृद्धि और सौभाग्य लेकर आती हैं। धातुओं को स्थायित्व और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण इस दिन सोना-चांदी खरीदने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित हुई।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि सोना या चांदी खरीदने की परंपरा धार्मिक आस्था और शुभता से जुड़ी है। इसका अर्थ यह नहीं कि इस दिन खरीदारी करने से निश्चित रूप से धन में वृद्धि होगी।
आज के समय में इस परंपरा का स्वरूप भी बदल गया है। लोग आभूषण और बर्तनों के अलावा वाहन, इलेक्ट्रॉनिक सामान और घर की जरूरत की दूसरी वस्तुएं भी खरीदते हैं। बाजारों में दुकानदार विशेष सजावट करते हैं और ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कई तरह के प्रस्ताव भी देते हैं।
धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि के साथ माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा भी की जाती है। हिंदू मान्यताओं में माता लक्ष्मी को धन, वैभव, सुख और समृद्धि की देवी माना जाता है। वहीं भगवान कुबेर को देवताओं का कोषाध्यक्ष और धन का संरक्षक कहा गया है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता लक्ष्मी की पूजा से घर में सुख-समृद्धि और भगवान कुबेर की आराधना से धन की स्थिरता की कामना की जाती है। इस दिन घरों की साफ-सफाई की जाती है। मुख्य द्वार को फूलों और रंगोली से सजाया जाता है। शाम के समय पूजा के बाद दीपक जलाए जाते हैं। धनतेरस से ही घरों में दीपावली की तैयारियां अपने अंतिम चरण में पहुंचने लगती हैं।
धनतेरस से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा यम दीपदान की है। इस दिन शाम को घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाया जाता है। इसे यम दीपक या यमदीपम कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इससे परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।
इसके पीछे राजा हिम और उनके पुत्र की एक रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार, राजा हिम के पुत्र की कुंडली में भविष्यवाणी की गई थी कि विवाह के चार दिन बाद सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो जाएगी। जब राजकुमार का विवाह हुआ तो उसकी पत्नी को इस भविष्यवाणी के बारे में पता चला। उसने अपने पति की जान बचाने का निश्चय किया।
विवाह के चौथे दिन रात में राजकुमार को नींद न आए, इसके लिए उसकी पत्नी ने उसे जागते रहने के लिए कहा। उसने घर के मुख्य द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण और सिक्कों का ढेर लगा दिया। इसके साथ ही पूरे घर में दीपक जला दिए।
मान्यता के अनुसार, जब यमराज सर्प का रूप धारण करके राजकुमार के प्राण लेने पहुंचे तो दीपकों की रोशनी और सोने-चांदी की चमक से उनकी दृष्टि प्रभावित हुई। वह राजकुमार तक नहीं पहुंच सके। पूरी रात राजकुमार की पत्नी ने उसे कहानियां सुनाकर और गीत गाकर जगाए रखा। सुबह होने पर यमराज वहां से लौट गए और राजकुमार की जान बच गई। इसी कथा के आधार पर धनतेरस की रात यमराज के नाम से दीपदान करने की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। हालांकि, यह धार्मिक लोकमान्यता है, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना नहीं।
धनतेरस का संबंध केवल धन और खरीदारी से नहीं, बल्कि भारतीय चिकित्सा परंपरा आयुर्वेद से भी है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का प्रवर्तक माना जाता है। आयुर्वेदिक परंपरा में उन्हें चिकित्सा और आरोग्य का प्रतीक माना गया है। उनकी पूजा का उद्देश्य अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना करना है।
भारत सरकार ने वर्ष 2016 से धन्वंतरि जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाने की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य आयुर्वेद के महत्व और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देना है। इस तरह धनतेरस का पर्व भारतीय चिकित्सा परंपरा से भी जुड़ता है।
समय के साथ धनतेरस मनाने के तरीके में बदलाव आया है, लेकिन इसकी मूल भावना आज भी कायम है। पहले जहां इस दिन मुख्य रूप से धातुओं के बर्तन और आभूषण खरीदे जाते थे, वहीं अब लोग अपनी जरूरत और आर्थिक क्षमता के अनुसार अलग-अलग वस्तुओं की खरीदारी करते हैं। इस पर्व का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि समृद्धि का अर्थ केवल धन-संपत्ति नहीं है। अच्छा स्वास्थ्य, परिवार की खुशहाली और जीवन में सुख-शांति भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
यही कारण है कि धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, भगवान कुबेर और यमराज से जुड़ी परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं। एक ओर धन और समृद्धि की कामना की जाती है, तो दूसरी ओर अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए प्रार्थना की जाती है। इस तरह धनतेरस केवल खरीदारी का अवसर नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में धन, स्वास्थ्य और जीवन के महत्व को समझने का पर्व भी है।