

भारत का चीनी उद्योग अब गन्ने से सिर्फ चीनी और एथेनॉल बनाने तक सीमित नहीं रह सकता। बदलती नीतियों, उत्पादन की परिस्थितियों और बाजार की जरूरतों के बीच चीनी मिलों को ऐसे विकल्प तलाशने होंगे, जिनसे एक ही कच्चे माल से कई तरह के उपयोगी और अधिक मूल्य वाले उत्पाद तैयार किए जा सकें। राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (एनएसआई), कानपुर के पूर्व निदेशक प्रो. नरेंद्र मोहन ने चीनी उद्योग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ चर्चा में इसी जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मिलों और डिस्टिलरियों को गन्ने के साथ कृषि अपशिष्ट का भी बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए और कंप्रेस्ड बायोगैस, बायोप्लास्टिक, सतत विमानन ईंधन तथा आइसो-ब्यूटेनॉल जैसे उत्पादों की संभावनाएँ तलाशनी चाहिए।
यह बदलाव ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो गया है, जब घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना प्राथमिकता है और एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के रस, सिरप तथा बी-हैवी शीरे के इस्तेमाल पर लगी पाबंदियाँ उद्योग की योजनाओं को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में एक ही उत्पाद या नीति पर निर्भर रहने के बजाय कई तरह के उत्पादों से कमाई करने का मॉडल चीनी मिलों के लिए अहम हो सकता है।
चीनी बनाने की प्रक्रिया में केवल तैयार चीनी ही नहीं मिलती, बल्कि कई ऐसे सह-उत्पाद और अवशेष भी निकलते हैं, जिनका औद्योगिक इस्तेमाल किया जा सकता है। गन्ने के रेशेदार अवशेष, शीरा और प्रेस मड जैसे पदार्थ ऊर्जा, जैव ईंधन, जैविक खाद तथा दूसरे औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में काम आ सकते हैं।
अब तक कई मिलों का कारोबार मुख्य रूप से चीनी, बिजली उत्पादन और एथेनॉल जैसे उत्पादों पर केंद्रित रहा है। लेकिन एकीकृत जैव-रिफाइनरी मॉडल में गन्ने के अलग-अलग हिस्सों और उत्पादन प्रक्रिया से निकलने वाले अवशेषों को अलग-अलग उत्पादों के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसका उद्देश्य अपशिष्ट को बेकार सामग्री मानने के बजाय उसकी उपयोगिता पहचानना है। यदि मिलें तकनीक और बाजार की जरूरत के मुताबिक नए उत्पाद विकसित करती हैं, तो उन्हें अतिरिक्त आय के स्रोत मिल सकते हैं। हालांकि, इसके लिए निवेश, तकनीकी विशेषज्ञता, कच्चे माल की निरंतर उपलब्धता और उत्पादों के लिए भरोसेमंद बाजार भी जरूरी होंगे।
कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) चीनी मिलों के लिए एक संभावित विकल्प है। जैविक अवशेषों को नियंत्रित प्रक्रिया से गैस में बदला जा सकता है। शुद्धिकरण और संपीड़न के बाद इस गैस का इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
चीनी मिलों से निकलने वाले कुछ जैविक अवशेष सीबीजी उत्पादन के लिए कच्चा माल बन सकते हैं। इससे एक ओर अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन का अवसर भी तैयार हो सकता है। हालांकि, हर मिल में सीबीजी संयंत्र की व्यवहार्यता उपलब्ध अवशेषों, तकनीक, लागत और स्थानीय बाजार पर निर्भर करेगी।
बायोप्लास्टिक उन उत्पादों में शामिल है, जिनकी ओर उद्योग की दिलचस्पी बढ़ रही है। पारंपरिक प्लास्टिक के कुछ विकल्प जैविक कच्चे माल से बनाए जा सकते हैं। यदि चीनी उद्योग इस क्षेत्र में निवेश करता है, तो गन्ने से प्राप्त शर्करा का इस्तेमाल औद्योगिक उपयोग के लिए प्लास्टिक बनाने वाले जैव-आधारित पदार्थों के उत्पादन में किया जा सकता है।
एक अन्य संभावित क्षेत्र सतत विमानन ईंधन (एसएएफ) है। विमानन क्षेत्र में उत्सर्जन घटाने के प्रयासों के बीच ऐसे ईंधन पर काम हो रहा है, जिन्हें उपयुक्त टिकाऊ कच्चे माल और तकनीक की मदद से तैयार किया जा सके। गन्ने और उससे जुड़े संसाधनों का इस्तेमाल इस दिशा में संभावनाएँ पैदा कर सकता है, हालांकि वास्तविक उत्पादन के लिए तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन जरूरी होगा।
इसके अलावा, आइसो-ब्यूटेनॉल जैसे रसायन भी चीनी उद्योग के विविधीकरण का हिस्सा बन सकते हैं। इनका उपयोग औद्योगिक रसायनों और ईंधन से जुड़े क्षेत्रों में हो सकता है। इस तरह चीनी मिलों के लिए भविष्य का मॉडल केवल एक कृषि उत्पाद को संसाधित करने के बजाय उससे जुड़े कई उद्योगों को विकसित करने का हो सकता है।
उद्योग के विविधीकरण का अर्थ चीनी उत्पादन को नजरअंदाज करना नहीं है। घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण बना रहेगा। गन्ने की उपलब्धता, चीनी की मांग और सरकारी नीतियों को ध्यान में रखते हुए ही यह तय करना होगा कि कितने संसाधनों का इस्तेमाल चीनी बनाने में किया जाए और कितने का दूसरे उत्पादों के लिए। एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर नीतिगत बदलाव मिलों और डिस्टिलरियों की कमाई तथा संयंत्रों की क्षमता के उपयोग को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में वैकल्पिक उत्पादों का विकास कारोबार को किसी एक बाजार या नीति पर निर्भर होने से बचाने में मदद कर सकता है।
हालांकि, जैव उत्पादों की दिशा में बढ़ना तुरंत मुनाफे की गारंटी नहीं है। नए संयंत्रों के लिए पूंजी, अनुसंधान, तकनीक, कुशल कर्मचारियों और खरीदारों की जरूरत होगी। मिलों को प्रत्येक उत्पाद की लागत और संभावित मांग का आकलन करने के बाद ही निवेश का फैसला लेना होगा। कुल मिलाकर, चीनी उद्योग के सामने चुनौती गन्ने से अधिकतम मूल्य हासिल करने की है। चीनी और एथेनॉल के साथ सीबीजी, बायोप्लास्टिक, सतत विमानन ईंधन और अन्य जैव उत्पादों पर ध्यान देने से उद्योग के लिए कमाई के नए रास्ते खुल सकते हैं। इसके लिए मिलों को पारंपरिक उत्पादन के साथ नवाचार और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बनाना होगा।